पैसे लेकर नौकरी का भरोसा देना धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बुधवार (18 मार्च) को एक व्यक्ति के खिलाफ धोखाधड़ी (IPC की धारा 420) के आरोप में दी गई सज़ा बरकरार रखी। इस व्यक्ति ने नीमच के पूर्व कलेक्टर होने का ढोंग किया और नौकरी के इच्छुक लोगों को सरकारी नौकरी दिलाने का झूठा भरोसा देकर उनसे धोखे से 2 लाख रुपये प्रति व्यक्ति ऐंठ लिए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि उसका यह कृत्य धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है, न कि आपराधिक विश्वासघात की।
जस्टिस गजेंद्र सिंह की बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा,
"सरकारी दफ्तरों में नौकरी दिलाने का भरोसा देकर स्टूडेंट्स के साथ धोखाधड़ी करना एक गंभीर अपराध है। मौजूदा मामले में कोई नरमी नहीं बरती जा सकती। IPC की धारा 420 के तहत दी गई सज़ा उचित है। इसलिए IPC की धारा 420 के तहत दी गई सज़ा या दोषसिद्धि में किसी भी तरह के दखल की ज़रूरत नहीं है। नतीजतन, इस पुनर्विचार याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार किया जाता है और याचिकाकर्ता/आरोपी रमेशचंद्र को IPC की धारा 406 के तहत लगाए गए आरोपों से बरी किया जाता है। IPC की धारा 420 के तहत उसकी दोषसिद्धि और सज़ा को बरकरार रखा जाता है।"
सेशन कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए आपराधिक पुनर्विचार याचिका दायर की गई थी। इस फैसले में याचिकाकर्ता को धोखाधड़ी (धारा 420) और आपराधिक विश्वासघात (धारा 406) के लिए दोषी ठहराया गया और उसे 3 साल के कठोर कारावास के साथ-साथ जुर्माना भरने की सज़ा सुनाई गई; जुर्माना न भरने पर उसे 3 महीने की अतिरिक्त सज़ा काटनी पड़ती।
तथ्यों के अनुसार, याचिकाकर्ता ने नीमच के पूर्व कलेक्टर होने का ढोंग किया और भोपाल के कर्मचारी चयन बोर्ड द्वारा आयोजित 'सहायक संपरीक्षक, पटवारी और अन्य पदों के लिए संयुक्त भर्ती परीक्षा-2022' के उम्मीदवारों को अपने झांसे में लिया। उसने उम्मीदवारों को यह भरोसा दिलाकर कि उन्हें पक्की नौकरी मिल जाएगी, उनसे प्रति उम्मीदवार 2 लाख रुपये की मांग की।
याचिकाकर्ता ने 5 उम्मीदवारों से 2 लाख रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से कुल रकम वसूल की। इसके बाद 22 अक्टूबर, 2023 को एक FIR दर्ज की गई और जांच पूरी होने के बाद फाइनल रिपोर्ट (चार्जशीट) दाखिल की गई। सुनवाई के दौरान, अभियोजन पक्ष ने कुल 10 गवाहों के बयान दर्ज करवाए, जिनमें 6 पीड़ित भी शामिल हैं।
याचिकाकर्ता के वकील ने यह दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने गवाहों के बयानों और जांच के दौरान जुटाए गए दस्तावेज़ों में मौजूद विरोधाभासों को नज़रअंदाज़ किया। बेंच ने यह पाया कि याचिकाकर्ता के कार्य पूरी तरह से IPC की धारा 420 के दायरे में आते हैं। अदालत ने दोहराया कि 'आपराधिक विश्वास भंग' (Criminal Breach of Trust) और 'धोखाधड़ी' (Cheating) के अपराध एक साथ नहीं हो सकते। इसलिए दोनों आरोप एक साथ कायम नहीं रखे जा सकते।
अतः, बेंच ने याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उसे धारा 406 के आरोपों से बरी कर दिया, लेकिन IPC की धारा 420 के तहत उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखी।
Case Title: Rameshchandra v State of Madhya Pradesh [CRR 4644 of 2025]