जानिए स्टे ऑर्डर क्या होता है

Update: 2021-12-07 05:14 GMT

स्टे ऑर्डर एक प्रसिद्ध शब्द है जहां कहीं किसी अचल संपत्ति से जुड़े विवाद को लेकर बात होती है वहां स्टे ऑर्डर शब्द भी बातचीत के दौरान इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए कहा गया है कि स्टे ऑर्डर शब्द अत्यंत प्रसिद्ध शब्द है।

इस आलेख के अंतर्गत स्टे ऑर्डर क्या होता है और यह किस कानून के अंतर्गत दिया जाता है तथा इस ऑर्डर का पालन कैसे किया जाता है यह सभी जानकारियां प्रस्तुत की जा रही है।

स्टे ऑर्डर:-

स्टे ऑर्डर एक आम बोलचाल का शब्द है। कानूनी रूप से इसका नाम अस्थाई निषेधाज्ञा या फिर स्थगन आदेश है। यह न्यायालय का दिया हुआ है ऐसा आदेश होता है जो किसी कार्यवाही को त्वरित रूप से रोक देता है और ऐसा आदेश एक अनिश्चित समय के लिए होता है परंतु यदि न्यायाधीश द्वारा ऐसे आदेश को दिए जाते समय अनिश्चित समय का उल्लेख नहीं किया गया है तब यह आदेश 6 माह के लिए होता है।

कभी-कभी अचल संपत्ति के विवाद में ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है जब किसी पक्षकार के हितों पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा हो तब न्यायालय मामले में हस्तक्षेप कर अस्थाई निषेधाज्ञा आदेश पारित कर देता है।

जैसे कि किसी व्यक्ति के खेत पर किसी कानूनी प्रक्रिया को बता कर कब्जा किया जा रहा है तब वह व्यक्ति उस कब्जे के विरुद्ध प्राथमिक स्तर पर न्यायालय में कोई वाद संस्थित करता है, ऐसे वाद को संस्थित किए जाने के बाद यदि संबंधित पक्षकार खेत पर अवैध कब्जा करने आ खड़ा हुआ है तब पीड़ित पक्षकार उच्चतर स्तर के न्यायालय में जहां जिला न्यायालय और उच्च न्यायालय भी शामिल है में एसी अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए परिवाद प्रस्तुत कर सकता है तथा न्यायालय से निवेदन कर सकता है कि उसके मामले में स्थगन आदेश पारित किया जाए।

किस कानून के तहत:-

इस प्रकार का स्टे ऑर्डर सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 39 और नियम 1 और 2 के तहत प्रस्तुत किया जाता है। इस आदेश 39 के अंतर्गत इस बात का उल्लेख किया गया है कि यदि कोई पहले से चल रहे मुकदमे में या फिर नए लाए गए मुकदमे में ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो गई है कि जिस व्यक्ति के पास कब्जा है उस व्यक्ति से कब्जा छीना जा रहा है अवैध कब्जा प्राप्त किया जा रहा है या उसकी भूमि में घुसपैठ की जा रही है तब वह व्यक्ति जिला न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों में ही इस प्रकार के स्टे ऑर्डर के लिए एप्लीकेशन लगा सकता है।

न्यायालय इस एप्लीकेशन के प्राप्त होने पर मामले की गंभीरता को देख कर शीघ्र से शीघ्र सुनवाई करती है। यदि कोई मामला अत्यधिक गंभीर है तो उस मामले में 102 दिन के भीतर ही सुनवाई हो जाती है पर कोई मामला अधिक गंभीर नहीं है तब ऐसी सुनवाई 15 से 20 दिनों के भीतर भी की जाती है।

दोनों ही पक्षकार को न्यायालय में उपस्थित होकर एक दूसरे के तथ्यों से न्यायालय को अवगत करना होता है। कभी-कभी न्यायालय केवल पीड़ित पक्षकार को ही सुनती है और दूसरे पक्ष लकार को एक्स पार्टी कर देती है और इस प्रकार एक्स पार्टी करके मामले में आदेश पारित कर दिया जाता है।

दोनों ही पक्षकार को सुनने के बाद न्यायालय कब्जे से संबंधित सबूतों को देखती है, वाद से संबंधित सबूतों को देखती है उसके बाद अपना आदेश पारित करती है। यह आवश्यक नहीं है कि न्यायालय हर मामले में ही स्टे ऑर्डर प्रदान कर देता है जहां उसे लगता है कि निषेधाज्ञा प्रदान करने की आवश्यकता नहीं है वहां न्यायालय किसी प्रकार का स्टे ऑर्डर प्रदान नहीं करता है।

मिजोरम राज्य व अन्य बनाम मेसर्स पूजा फर्नीचर प्रायवेट लिमिटेड व अन्य के मामले में स्टे ऑर्डर से संबंधित कानून को और अधिक विस्तार पूर्वक समझाते हुए कहा है कि:-

किसी भी कोर्ट को स्टे देते समय तीन पहलुओं पर विचार करना चाहिए, जैसे

(1) सुविधा संतुलन।

(2) अपूरणीय क्षति या चोट।

(3) प्रथम दृष्टया मामला।

जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की बेंच ने मिजोरम सरकार द्वारा हाइकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर विचार कर रही थी, जिसमें यह निर्देश दिया गया था कि चूंकि रिट पिटिशन का अंतिम परिणाम लंबित है, इसलिए दिनांक 04/06/19 को रुचि अभिव्यक्त कर चुके पेपर लॉटरी ड्रॉ के सभी अनुसरणकर्ताओं को स्‍थगित रखा जाए।

स्टे ऑर्डर लेने के लिए भी सबूत प्रस्तुत करना होते हैं और न्यायालय में यह साबित करना होता है कि यदि किसी मकान पर किसी व्यक्ति द्वारा कब्जा किया जा रहा है तो ऐसा कब्जा अवैध है और जिस व्यक्ति ने स्टे ऑर्डर के लिए निवेदन किया है उस व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि उसके पास पूर्व से मकान पर कब्जा है और किस नाते उसका कब्जा वैध है।

जैसे कि किसी व्यक्ति के पास में कब्जा किसी भी प्रकार से हो सकता है, मालिक की तौर पर कब्जा हो सकता है, किराएदार के तौर पर कब्जा हो सकता है, देखरेख के नाते कब्जा हो सकता है, पावर ऑफ अटॉर्नी के वास्ते कब्जा हो सकता है तब उसके कब्जेदार को यह साबित करना होता है कि उसका कब्जा किस नाते हैं और कब से वह उस संपत्ति पर है।

यदि यह दोनों बातें न्यायालय में साबित कर दी जाती है तो तीसरा सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि क्या इस विवाद से संबंधित कोई मुकदमा किसी न्यायालय में चल रहा है या फिर कोई नया मुकदमा लाया गया है। इन दो ही परिस्थितियों में स्टे ऑर्डर पारित किया जाता है जब कोई मुकदमा किसी न्यायालय में चल रहा हो या फिर कोई नया मुकदमा न्यायालय में लाया गया हो।

एक उदाहरण के माध्यम से स्टेट ऑर्डर को यूं समझा जा सकता है:-

जैसे किसी मंदिर की जमीन पर किसी पुजारी का कब्जा है। पुजारी का कब्जा पिछले 75 वर्षों से है उस पुजारी का यह दावा है कि वह जगह मंदिर की नहीं है बल्कि मंदिर की देखरेख करने के बदले किसी समय के शासक द्वारा वह जमीन उस पुजारी के पुरखों को दी गई थी। इस प्रकार से वह जमीन पुजारी के पुरखों का मेहनताना है जो उसे मंदिर की देखरेख करने के बदले में मिला है।

अब यदि सरकार किसी कानून के माध्यम से मंदिर को अपने कब्जे में ले लेती है और उस जगह पर जिस जगह पर मंदिर के पुजारी का कब्जा है यह दावा करती है कि जगह भी मंदिर की है इसलिए हम जगह पर भी कब्जा लेंगे और अपने अधिकारियों को भेज कर मंदिर की उस जगह पर भी कब्जा लेने के लिए खड़ा कर देती है। ऐसी स्थिति में पुजारी को पहले वाद संस्थित करना होग यह वाद पुजारी अपने कब्जे और अपने हक के लिए प्रस्तुत करेगा।

इस वाद को प्रस्तुत करने के बाद वह न्यायालय से स्टे ऑर्डर प्राप्त कर सकता है, यहां ध्यान यह देना होगा कि स्टे ऑर्डर किसी भी ऐसे मामले में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है जो केवल स्टे ऑर्डर के लिए ही प्रस्तुत किया गया है, न्यायालय में जो मुकदमे चल रहे होते हैं उनके भीतर स्टे ऑर्डर प्रदान किया जाता है।

स्टे ऑर्डर का पालन:-

न्यायालय जब कभी किसी मामले में स्टे ऑर्डर देता है तब इस प्रकार के ऑर्डर का पालन करना पक्षकारो पर बाध्यकारी हो जाता है। किसी भी स्थिति में ऐसे ऑर्डर का पालन करना ही होता है। न्यायालय ने यदि किसी मामले में यह स्टर्डर दिया गया है कि भूमि की स्थिति ज्यों की त्यों रहने दी जाए तब भी उसके आदेश का पालन नहीं किया जा रहा है और घुसपैठ की जा रही है बदलाव किया जा रहा है तब सिविल प्रक्रिया संहिता आदेश 39 नियम 1(A) के अंतर्गत न्यायालय आदेश का पालन नहीं करने वाले पक्षकार की संपत्ति को कुर्क भी कर सकता है तथा उसकी संपत्ति को बेच कर पीड़ित पक्षकार को हुई नुकसानी की भरपाई भी करवा सकता है तथा 3 महीने का सिविल कारागार भी दे सकता है।

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