भारत का संविधान (Constitution of India) भाग 3: भारत के संविधान में मूल अधिकार क्या होतें हैं

Update: 2021-01-18 05:30 GMT

पिछले आलेख में भारत का राज्य क्षेत्र तथा भारत की नागरिकता के संबंध में सारगर्भित उल्लेख किया गया था, इस आलेख में भारत के संविधान के भाग-3 में दिए गए मूल अधिकारों पर एक संक्षिप्त चर्चा के माध्यम से जानकारी प्रेषित की जा रही है।

मूल अधिकार

भारत के संविधान के भाग-3 के अंतर्गत अनुच्छेद 12 से लेकर अनुच्छेद 35 तक मूल अधिकारों का उल्लेख किया गया है। इन मूल अधिकारों को मनुष्य के नैसर्गिक अधिकार भी कहे जाते हैं। ऐसे अधिकार जो किसी मनुष्य को जन्मजात प्राप्त होते हैं, कोई भी स्वतंत्रता किसी भी मनुष्य को दी नहीं जाती अपितु वह स्वतंत्रता उस मनुष्य को जन्मजात ही प्राप्त होती है, जैसे कि किसी मनुष्य को जीवन का अधिकार उसके जन्म के साथ प्रारंभ हो जाता है परंतु इस जीवन के अधिकार में मृत्यु का अधिकार नहीं है।

ऐसे नैसर्गिक अधिकार जिनकी लड़ाइयां सदियों से लड़ी जा रही थी तथा भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी इन्हीं अधिकारों पर अधिक बल दिया गया। यदि भारत के स्वतंत्रता संग्राम का अध्ययन किया जाए तथा उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझा जाए तो वहां भी यह बात समझ में आती है कि भारत का स्वतंत्रता संग्राम इन्हीं मूल अधिकारों के लिए लड़ा गया था।

स्वतंत्रता संग्राम का प्रमुख उद्देश्य भारत के संविधान के भाग-3 उल्लेखित किए गए मूल अधिकारों को प्राप्त करना ही था। इन अधिकारों के माध्यम से भारत को एक उदार तथा प्रगतिशील देश के रूप में उल्लेखित किया गया है।

भारत के नागरिकों को तथा अन्य व्यक्तियों को भारत के संविधान के भाग 3 के अंतर्गत उल्लेखित किए गए मूल अधिकार निर्बाध रूप से प्राप्त है। कुछ मूल अधिकार ऐसे हैं जिन्हें केवल नागरिकों को दिया गया है तथा कुछ मूल अधिकार ऐसे हैं जिन्हें सभी व्यक्तियों को समान रूप से दिया गया है। व्यक्तियों का अर्थ इस धरती का कोई भी मनुष्य जो भारत के भू भाग में विचरण कर रहा है।

जो भारत की धरती पर उपस्थित है उसे मूल अधिकार दिए गए हैं। भारत के संविधान के अंतर्गत भाग 3 में दिए गए मूल अधिकार ग्यारंटी के रूप से भारत के नागरिकों तथा अन्य व्यक्तियों को प्राप्त होते हैं। ग्यारंटी के रूप में प्राप्त होने वाले मूल अधिकारों का अर्थ होता है ऐसे मूल अधिकार जिनका प्राप्त होना नागरिकों को तथा अन्य व्यक्तियों को मिलना निश्चित ही होता है, किसी भी परिस्थिति में इन मूल अधिकारों पर बगैर औचित्य के निर्बंधन नहीं लगाए जा सकते, निर्बंध भी होते हैं तो उस निर्बंध के पीछे कोई औचित्य होता है, कोई एक विशेष कारण होता है जिस पर ही विचार करके इन मूल अधिकारों पर कोई न कोई कहीं न कहीं रोक लगाई जा सकती है।

ग्यारंटी का एक रूप यह है कि इन मूल अधिकारों में उल्लेखित की गई बातें राज्य द्वारा किसी भी परिस्थिति में अतिक्रमण नहीं की जाएंगी। यदि राज्य द्वारा इन मूल अधिकारों का अतिक्रमण किया जाता है तो इन मूल अधिकारों को बहाल कराने के लिए न्यायपालिका की सहायता ली जा सकती है क्योंकि भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय को ऐसी परिस्थितियों में रिट जारी करने की अधिकारिता प्राप्त है।

जिनमें कहीं पर भी नागरिकों तथा अन्य व्यक्तियों के मूल अधिकार का हनन हो रहा हो भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत भी उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय दोनों को इस प्रकार से हनन होने वाले मूल अधिकारों के संबंध में संज्ञान लेने तथा उन पर रिट जारी करने की अधिकारिता प्राप्त है, अर्थात भारत के संविधान में उल्लेखित किए गए मूल अधिकारों को प्रवर्तन कराया जा सकता है।

भारत के संविधान में जितना अधिक बल मूल अधिकारों पर दिया गया है इतना बल विश्व के किसी भी संविधान में मूल अधिकारों पर नहीं दिया गया है। मूल अधिकारों से संबंधित उपबंधों का समावेश आधुनिक लोकतांत्रिक विचारों की प्रवृत्ति के अनुकूल ही है। सभी आधुनिक संविधान में मूल अधिकारों का उल्लेख किया गया है, भारत को एक आधुनिक राज्य बनाने के उद्देश्य से इस के संविधान में भी मूल अधिकारों का उल्लेख किया गया है।

भारत के संविधान में दिए गए मूल अधिकारों को मनुष्य के पवित्र अधिकारों के रूप में भी माना जाता है। भारत के संविधान में प्राप्त होने वाले यह मूल अधिकार एक दस्तावेज के रूप में है जो भारत में हुए कठोर संघर्ष के परिणाम स्वरुप है।

संविधान में मूल अधिकारों से संबंधित उपबंधों को समाविष्ट करने का उद्देश्य एक विधि शासित सरकार की स्थापना करना है न कि मनुष्य द्वारा संचालित सरकार की। ऐसी शासन व्यवस्था जिसमें बहुसंख्यक अल्पसंख्यकों का शोषण न कर सके पुरुष स्त्रियों का शोषण न कर सके। 

प्रोफेसर डायसी ने विधि शासन से संबंधित सिद्धांत की परिकल्पना देते हुए कुछ ऐसे ही विचारों को रखा था।

एम नागराज बनाम भारत संघ के मामले में भारत के सुप्रीम कोर्ट में मूल अधिकारों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि मूल अधिकार नागरिकों को राज्य द्वारा दिए गए दान की तरह नहीं है।

मूल अधिकार भाग-3 प्रदान नहीं करता है वह तो इस बात की पुष्टि करता है कि उसका अस्तित्व है और उन्हें संरक्षण प्रदान करता है। किसी संविधान के बिना भी व्यक्तियों को आधारभूत मानव अधिकार केवल इस कारण से प्राप्त है कि वे मनुष्य हैं तथा मनुष्यता के सदस्य हैं।

मूल अधिकारों पर निर्बंधन है

भारत के संविधान में दिए गए मूल अधिकारों की समीक्षा करते हुए यह प्राप्त होता है कि संविधान में दिए गए यह मूल अधिकार आत्यंतिक मूल अधिकार नहीं है। किसी भी समाज में व्यक्तियों को अधिकार असीमित नहीं होते हैं और विशेष रूप से आधुनिक शासन व्यवस्था में अत्यंत आवश्यक होता है जिसमें एक लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना का आदर्श निहित होता है कि नागरिकों के मूल अधिकार पर अंकुश लगाया जाए।

भारतीय संविधान द्वारा प्रदत अधिकार अप्रतिबंधित नहीं है अर्थात समय-समय पर प्रतिबंध हो सकता है। संविधान में इस बात का ध्यान रखा गया है कि व्यक्ति को ऐसी स्वतंत्रता न प्रदान की जाए जिससे कि समाज में अराजकता और अव्यवस्था उत्पन्न हो जाए।

असीमित स्वतंत्रता एक लाइसेंस हो जाती है दूसरे व्यक्तियों के अधिकारों के उपयोग में बाधा पहुंचाती है। संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का उपयोग व्यक्ति समाज में रहकर कर सकता है और इसके लिए समाज में शांति व्यवस्था का होना आवश्यक।

भारतीय संविधान व्यक्तिगत हित और सामाजिक हित में सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास करता है। संविधान जहां मूल अधिकारों का उल्लेख करता है वहीं उसने इन अधिकारों के प्रयोग की सीमाएं भी निर्धारित कर दी है।

संविधान अधिकारों को भी स्पष्ट उल्लेखित कर रहा है जिनके आधार पर राज्य द्वारा मूल अधिकारों प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। संविधान राज्य में नागरिकों के मूल अधिकारों प्रतिबंध लगाने की शक्ति प्रदान करता है।

ए के गोपालन बनाम मद्रास राज्य 1952 के मामले में कहां गया है कि ऐसी कोई चीज नहीं हो सकती जिसे हम पूरा असीमित स्वतंत्रता कह सकें जिस पर सभी प्रकार के अवरोध हटा दिया जाए क्योंकि इसका परिणाम अराजकता और अव्यवस्था होगी।

नागरिकों के अधिकारों के प्रयोग पर देश और विदेश की सरकारें ऐसे युक्तियुक्त निर्बंधन लगा सकती हैं जिसे वे समाज की सुरक्षा स्वास्थ्य शांति व्यवस्था और नैतिकता के लिए उचित समझे किंतु जहां व्यक्तियों के अधिकारों पर सामाजिक हित की दृष्टि से निर्बंधन लगाए जा सकते हैं वहीं राज्य की सामाजिक नियंत्रण की शक्ति की भी उचित सीमा निर्धारित होनी चाहिए ताकि राज्य अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर के नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रता का हनन नहीं करें।

मेनका गांधी के एक प्रकरण में भारत के उच्चतम न्यायालय ने मूल अधिकारों की विस्तृत विवेचना करते हुए कहा है कि भाग-3 द्वारा प्रदत मूल अधिकार परस्पर अनन्य अधिकार नहीं है जिनकी पृथक पृथक अनुच्छेदों में ग्यारंटी दी गई है कि सभी संविधान में सु संबंध युक्ति सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक भाग हैं।

इनको एक दूसरे से पृथक नहीं देखा जा सकता यह सब बातें जो मनुष्य को एक पूर्ण मनुष्य बनाने के लिए आवश्यक है इनमें शामिल है भले ही इनका स्पष्ट रूप से उल्लेख न किया गया हो या अलग-अलग अनुच्छेद में उल्लेख किया गया हो मूल अधिकारों का निर्वचन करके इन सभी पर विचार करके निष्कर्ष निकालना चाहिए।

उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 32 द्वारा प्रदत अधिकारिता के क्षेत्र का बहुत विस्तार कर दिया है और यह निर्धारित किया गया है कि उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता का प्रयोग उन क्षेत्रों में परिस्थितियों में किया जा सकता है जहां कहीं भी लोक प्राधिकारी द्वारा अन्याय अथवा मानवीय व्यवहार किया जाता है।

बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट का प्रयोग किसी व्यक्ति को अवैध निरोध से विमुक्ति के लिए ही नहीं बल्कि उनके साथ कारागार में किए गए सभी प्रकार के आमानवीय व्यवहारों के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करने के लिए भी किया जा सकता है।

अनुच्छेद 32 के अधीन उपचार के लिए कोई भी संघ चाहे वह पंजीकृत हो या अपंजीकृत आवेदन दे सकता है।

पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ के मामले में न्यायालय ने अपना निर्णय देते हुए कहा है कि देश के श्रमिक चाहे वह किसी भी क्षेत्र में हो स्वयं या किसी के माध्यम से न्यायालय में अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए अनुच्छेद 32 और 226 के अधीन आवेदन दे सकते हैं।

इस प्रकरण में उक्त संघ ने एशियाड योजना में काम करने वाले श्रमिकों को न्यूनतम वेतन न दिए जाने सूचना पत्र द्वारा उच्चतम न्यायालय को संज्ञान लिया था। न्यायालय ने संबंधित अधिकारियों को आदेश दिया कि श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी दें।

अपने आधुनिकतम निर्णयों में उच्चतम न्यायालय ने मानव अधिकारों को बहुत अधिक महत्व दिया है और अनेक अधिकारों को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत सम्मिलित कर दिया है जो मानव जीवन को पूर्ण बनाने के लिए गरिमा से जीने के लिए आवश्यक हैं और राज्य पर उन्हें पर्याप्त संरक्षण प्रदान करने का दायित्व आरोपित किया है।

सुनील बत्रा के एक मामले में न्यायाधीश श्री कृष्ण अय्यर ने घोषणा की है कि आज मानव अधिकार विधिशास्त्र भारतीय संविधान का आवश्यक अंग बन गया है तथा इन्हें बाहर किया ही जाना चाहिए किसी भी परिस्थिति में किसी प्रकार का अतिक्रमण नहीं होना चाहिए।

गोपालन के मामले में न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया कि किसी मामले में किसी विधि द्वारा मूल अधिकारों का उल्लंघन हुआ है या नहीं इसका निर्धारण करने के लिए विधि के सार तत्व पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उसके प्रत्यक्ष प्रभाव पर नहीं।

भारत के संविधान की तरह अमेरिका के संविधान में मूल अधिकारों का कोई उल्लेख नहीं किया गया था। बाद में संविधान के प्रथम 10 संशोधन द्वारा संविधान में अधिकार घोषणा पत्र जोड़ा गया इस घोषणा पत्र द्वारा अमेरिका के नागरिकों को अनेक मूल अधिकार प्रदान किए गए किंतु संविधान में अधिकारों पर निर्बंधन लगाने की कोई व्यवस्था नहीं की गई थी इसके परिणामस्वरूप मूल अधिकारों का असीमित प्रयोग किया गया।

अनेक कठिनाइयों का जन्म हुआ। अनुभव किया जाने लगा कि समाज हित में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के ऊपर निर्बंधन लगाना आवश्यक है। अमेरिका के संविधान में भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर निर्बंधन लगाए गए।

कब मूल अधिकारों का निलंबन हो सकता है

भारत के संविधान में मूल अधिकारों को प्रस्तुत भी किया है तथा मूल अधिकारों पर कब निलंबन हो सकता है इसके संबंध में भी घोषणा की है। यह इस आलेख में कहा जा चुका है कि भारत के संविधान में प्राप्त मूल अधिकार आत्यंतिक अधिकार नहीं है अपितु समाज हित में इन पर निर्बंधन हो सकते हैं।

कुछ दशा ऐसी हैं जिनमें मूल अधिकारों पर निलंबन हो जाता है, जैसे-

1)- सीमा के सदस्यों के संबंध में (अनुच्छेद 33)

2)- जब सेना विधि लागू हो (अनुच्छेद 34)

3)- संविधान में संशोधन द्वारा (अनुच्छेद 368)

4)- आपात उद्घोषणा के अधीन (अनुच्छेद 352)

यह संविधान में दी गई ऐसी परिस्थितियां है जिनमें संविधान के भाग 3 के अंतर्गत उल्लेखित किए गए मूल अधिकारों पर निर्बंधन हो सकते हैं तथा इन मूल अधिकारों को पूर्ण रूप से निलंबित किया जा सकता है।

मूल अधिकार राज्य के विरुद्ध उपलब्ध है

भारत के संविधान में उल्लेखित किए गए यह मूल अधिकार आम नागरिकों के लिए आम नागरिकों के विरुद्ध उपलब्ध नहीं होते हैं अपितु राज्य के विरुद्ध उपलब्ध होते हैं। राज्य क्या है! इस संबंध में लेखक द्वारा पूर्व में आलेख लिखा जा चुका है जिसमें विस्तारपूर्वक भारत के संविधान के अनुच्छेद 12 के अनुसार राज्य की परिभाषा और उससे संबंधित निर्णय को परिभाषित किया गया है।

इस आलेख में सारगर्भित उल्लेख किया जा रहा है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 12 के अनुसार राज्य के अंतर्गत

भारत की सरकार और भारत की संसद-

राज्य सरकार और राज्य सरकारों के विधान मंडल-

सभी स्थानीय प्राधिकारी और अन्य प्राधिकारी-

राज्य में वह सभी सरकारी अधिकारी सम्मिलित हो जाते हैं जिनकी नियुक्ति किसी सरकार या किसी शासन द्वारा की गई है तथा जिन्हें वेतन किसी सरकार द्वारा दिया जा रहा है।

जैसे कि एक सरकारी बैंक भी राज्य कहलाएगा तथा इस बैंक के विरुद्ध वह सभी मूल अधिकार भारतीय नागरिकों को तथा गैर नागरिकों को उपलब्ध होंगे जिनका उल्लेख भारत के संविधान के भाग 3 के अंतर्गत किया गया है।

पाठकगण, भाग तीन में उल्लेखित किए गए मूल अधिकारों के संबंध में मूल अधिकारों पर विस्तृत विवेचना के लिए अगले आलेखों का अध्ययन करते रहें।

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