सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 भाग 37: संहिता में द्वितीय अपील से संबंधित प्रावधान

Update: 2022-05-16 04:33 GMT

सिविल प्रक्रिया संहिता,1908 (Civil Procedure Code,1908) की धारा 100 द्वित्तीय अपील से संबंधित है। मूल डिक्री की अपील के बाद अपील में दिए निर्णय अपील सेकेंड अपील कहलाती है। इस आलेख के अंतर्गत द्वित्तीय अपील पर चर्चा की जा रही है।

धारा 100 द्वितीय अपील के सम्बन्ध में उपबन्ध करती है। ध्यान रहे कि द्वितीय अपील हमेशा उच्च न्यायालय में की जाती है। सिविल प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम, 1976 के माध्यम से धारा 100 में आमूल परिवर्तन कर दिया है, और पुरानी धारा 100 के स्थान पर एक नई धारा ने जन्म ले लिया है। पुरानी धारा 100 के अन्तर्गत वे आधार दिये गये थे जिनके अधीन द्वितीय अपील की जा सकती थी। परन्तु धारा के निर्वचन (interpretation) के द्वारा अपील का क्षेत्र विस्तार अधिक हो गया था और इस प्रकार द्वितीय अपील सम्बन्धी नियमों में अनिश्चितता आ गयी थी। उदाहरण के लिये, अपीलें इस आधार पर भी स्वीकार की जाने लगी कि मामले में विधि और तथ्य का मिश्रित प्रश्न निहित है, या प्रमाणित तथ्यों से विधिक अनुमान निकाला जाना चाहिये या अधीनस्थ न्यायालय ने मामले को उचित तरीके से नहीं निपटाया या उचित दृष्टिकोण से नहीं देखा।

अत: यह आवश्यक था कि धारा के क्षेत्र में विस्तार को सीमित किया जाए अपील सम्बन्धी नियम में निश्चितता लायी जाए। इसी उद्देश्य से भारतीय संसद के दोनों सदनों की संयुक्त समिति, जिसे कि सिविल प्रक्रिया संहिता तथा परिसीमा अधिनियम, 1963 में निदर्शित किया गया था ने अनुभव किया कि दूसरी अपील का क्षेत्र विस्तार सीमित किया जाना चाहिये जिससे मुकदमेबाजी में खिचने वाला समय सम्बा न खिचता चला जाये।

अपील का आधार- किसी भी वाद में दो प्रकार के विवाद्यक (issues) होते हैं:

(1) तथ्य सम्बन्धी विवाद्यक, और

(2) विधि सम्बन्धी विवाद्यक

प्रथम अपील जो धारा 96 के अन्तर्गत को जाती है उसमें डिक्री को (जिसके विरुद्ध अपील की गयी है) दोनों आधारों पर चुनौती दी जा सकती है। दूसरे शब्दों में प्रथम अपील में यह आक्षेप उठाया जा सकता है कि डिक्री में तथ्य सम्बन्धी एवं विधि सम्बन्धी त्रुटियाँ या कमियाँ हैं और अपील न्यायालय दोनों प्रश्नों (तथ्य सम्बन्धी और विधि सम्बन्धी) का निर्धारण कर सकता है। परन्तु द्वितीय अपील में जो इस धारा (धारा 100) के अधीन की जाती है, उच्च न्यायालय तथ्य सम्बन्धी प्रश्नों का निर्धारण नहीं कर सकता। अतः हम यह कह सकते हैं कि प्रथम अपील का क्षेत्र विस्तृत होता है और द्वितीय का सीमित द्वितीय अपील का विस्तार क्षेत्र विधि के प्रश्न तक सीमित है।

द्वितीय अपील में अपीलकर्ता को यह अनुमति नहीं दी जा सकती कि वह दूसरा केस (ममाला) खड़ा कर सके या दूसरा विवाद्यक (issue) उठा सके जिससे सम्बन्धित साक्ष्य मुकदमें के अभिलेख पर नहीं है। दूसरे शब्दों में अपीलकर्ता को इस नये विवाद्यक को उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती जिसके समर्थन में अभिलेख पर साक्ष्य मौजूद नहीं है। इसी प्रकार अपीलकर्ता को अपील में प्रथम बार नया तर्क (वह तर्क जो उसमें निचले न्यायालय में नहीं उठाया है, चाहे विचारण स्तर पर या अपोल स्तर पर) उठाने की अनुमति सामान्यतया नहीं दी जा सकती।

प्राइन्याय के तर्क को प्रथम बार द्वितीय अपील में नहीं उठाया जा सकता।

द्वितीय अपील विधि के प्रश्न पर होती है। प्रतिकूल कब्जे से सम्बन्धित अधीनस्थ न्यायालय का निष्कर्ष, एक तथ्य सम्बन्धी निष्कर्ष है। अतः उच्च न्यायालय को ऐसे निष्कर्ष पर हस्तक्षेप करने की कोई अधिकारिता प्राप्त नहीं है। तथ्य और विधि सम्बन्धी मिश्रित प्रश्नों को प्रथम बार अपील में उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

दुर्गा चौधरानी बनाम जवाहर सिंह के वाद में प्रिवी कौन्सिल ने निर्णय दिया कि तथ्य सम्बन्धी निर्णय चाहे वह निर्णय घोर गलत ही क्यों न हो के आधार पर द्वितीय अपील ग्रहण करने की अधिकारिता नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने भी प्रिवो कौन्सिल के निर्णय की पुष्टि की है:

वसीयतकर्ता की मानसिक स्थिति, वसीयत करते समय, क्या थी का प्रश्न तथ्य का प्रश्न है और इसे अपोल में प्रथम बार नहीं उठाया जा सकता। इसी प्रकार, सम्पत्ति का स्वामी, वास्तविक स्वामी है या बेनामी, तथ्य का प्रश्न है, द्वितोय अपील में इसे प्रथम बार नहीं उठाया जा सकता। परन्तु इस सर्वमान्य नियम के कुछ अपवाद भी हैं। दूसरे शब्दों में तथ्य सम्बन्धी निर्णय को भी द्वितीय अपील में चुनौती दी जा सकती है। निम्न तथ्य सम्बन्धी निर्णयों को द्वितीय अपील में चुनौती दी जा सकती जहाँ प्रश्न यह है कि क्या-

(1) संव्यवहार बेनामी है या

(2) संव्यवहार बनावटी है? या

(3) संव्यवहार वास्तविक है? या

(4) संव्यवहार अनुचित प्रभाव से दूषित है? या

(5) क्या अभियोजन के लिये युक्तियुक्त और सम्भाव्य कारण है, या

(6) क्या वहाँ उपेक्षा की गयी थी? या

(7) क्या वहाँ विभाजन हुआ था।

जहाँ प्रश्न यह है कि क्या मोचन का वाद बन्धक रखे हुये सभी भूखण्डों के बारे में संस्थित किया गया है या उसके एक अंश के बारे में, वहाँ उच्चतम न्यायालय ने गुरुचरन कोइरी बनाम बीबी समसुन्निशां नमक वाद में अभिनिर्धारित किया कि ऐसा प्रश्न तथ्य एवं विधि का मिश्रित प्रश्न है। जहाँ तक कि तथ्य सम्बन्धी निष्कर्ष गलत हो, वहाँ वह अपने आप विधि का प्रश्न नहीं हो जायेगा।

गलत निष्कर्ष को व्यवस्थित किया जाए या साक्ष्य को गलत तरीके से पढ़ लिया जाय या यह अनुमानों और अटकलों पर आधारित हो।

उच्चतम न्यायालय ने मधुसूदन दास बनाम नारायनी बाई नामक वाद में यह अभिनिर्धारित किया कि जहाँ विचारण न्यायालयों ने साक्ष्य के आंकने में (appraisal of evidence) तात्विक अनियमितता बरती है, या निष्कर्ष अग्राह्य साक्ष्य पर आधारित है या साक्ष्य की गलत व्याख्या पर आधारित है या अनुमानों या अटकलों पर आधारित है, वहाँ अपीलीय न्यायालय को तथ्य सम्बन्धी निर्णयों में हस्तक्षेप करने का अधिकार है। इसी प्रकार जहाँ तथ्यों का निष्कर्ष तर्क विरुद्ध है और साक्ष्य के इकट्ठा करने और मूल्यांकन में अवचार (misconduct) किया गया है, वहीं दूसरी अपील दाखिल की जा सकती है।

जहां निचले न्यायालय के निष्कर्ष तर्क विरुद्ध हैं, साक्ष्य पर आधारित नहीं है, या साक्ष्य के गलत बोध पर आधारित है। उच्च न्यायालय को उसमें हस्तक्षेप की शक्ति प्राप्त है। साक्ष्य के आधार पर दूसरा विचार सम्भव है, वहां उच्च न्यायालय को धारा 100 के अन्तर्गत अपनी अधिकारिता के प्रयोग का अधिकार नहीं है।

इसी प्रकार जहां अधीनस्थ न्यायालय ने (1) तात्विक साक्ष्य को अवज्ञा की है या बिना साक्ष्य के निर्णय दिया है, (1) न्यायालय ने गलत तरीके से विधि का प्रयोग करते हुये प्रमाणित तथ्यों से गलत अनुमान लगाया है। न्यायालय ने साक्ष्य का पार गलत तरीके से एक पक्ष पर डाल दिया है वहां उच्च न्यायालय को निचले न्यायालयों के एक ही निष्कर्ष (concurrent findings) की स्थित में भी हस्तक्षेप का अधिकार है।

धारा 100 के अन्तर्गत द्वितीय अपील में उच्च न्यायालय को यह अधिकरिता नहीं प्राप्त है कि वह ऐसे विवायक पर विनिश्चय दे जिस पर विचारण न्यायालय में जोर नहीं दिया गया है हीरालाल बनाम गज्जन नामक वाद में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि यदि तथ्य के प्रश्न को निपटाते समय निचले अपोलोय न्यायालय ने साबित करने का भार गलत व्यक्ति पर रख दिया है और तथ्य का निष्कर्ष सारभूत रूप से इसके गलत दृष्टिकोण का परिणाम हो, तो इसे प्रक्रिया के दुरुपयोग के रूप में माना जा सकेगा और उच्च न्यायालय अपने स्वतन्त्र निर्णय पर पहुँचने के लिये इसे द्वितीय अपील में स्वीकार कर सकता है।

इसी प्रकार उच्चतम न्यायालय ने नसीरुलहक बनाम जितेन्द्र नाथ डे' नामक वाद में यह निर्णय दिया कि अगर विचारण न्यायालय के तथ्य सम्बन्धी निर्णय की पुष्टि अपीलीय न्यायालय द्वारा नहीं की गयी है तो ऐसे तथ्य सम्बन्धी निर्णय की जाँच-पड़ताल द्वितीय अपोल में की जा सकती है और अगर कर दी गयो है तो उच्च न्यायालय उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

इसी प्रकार के तथ्य जो विचारण न्यायालय ने अभिलिखित किया है, अपीलीय न्यायालय ने उसको पुष्टि कर दिया है तो उसे द्वितीय अपील में उलटा नहीं जा सकता।

जहाँ दोनों निचली अदालतों ने समान रूप से मौखिक और दस्तावेजो साक्ष्य को समुचित रूप से समझाने या महत्व देने में गलती किया, वहाँ उच्चतम न्यायालय ने रामलाल बनाम फगुआ में अभिनिर्धारित किया कि ऐसी स्थिति में उच्च न्यायालय साक्ष्य को पुर्नमहत्व (re appreciate) देने के लिये स्वतंत्र है।

भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 14 के अन्तर्गत अर्जित पूर्णस्वामित्व का प्रश्न तथ्य सम्बन्धी प्रश्न है। अत: इसे द्वितीय अपील में नहीं उठाया जा सकता है यह एक सुस्थापित विधि है कि उच्च न्यायालय प्रथम अपीलीय न्यायालय के तथ्य सम्बन्धी निष्कर्ष में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

अगर कोई विदेशी विधि है, तो यह तथ्य का प्रश्न है और उसका अभिवचन किया जाना चाहिये और साबित किया जाना चाहिये।

पुरानी धारा 100 में अपील के आधार (संशोधन के पहले)-

1976 के संशोधन से पहले उच्च न्यायालय में द्वितीय अपील के लिये निम्न आधार दिये गये थे-

(1) जहाँ अधीनस्थ न्यायालय द्वारा अपील में पारित डिक्री या विनिश्चय विधि के या विधि को शक्ति रखने वाले किसी रूदि (usage) के प्रतिकूल हैं,

(2) जहाँ अधीनस्थ न्यायालय की डिक्री या विनिश्चय विधि का या विधि की शक्ति रखने वाले रूढ़ि से सम्बन्धित तात्विक विवाद्यक (material issue) को निर्धारित करने में असफल रही है,

(3) जहाँ अधीनस्थ न्यायालय द्वारा पारित डिक्री या विनिश्चय में सिविल प्रक्रिया संहिता में उपबन्धित प्रक्रिया सम्बन्धित सारवान् गलती या त्रुटि घटित हुयी हो जिससे कि पूरी सम्भावना रही है गुणावगुण के आधार पर बाद में निर्णय किये जाने में गलतो या त्रुटि अवश्य हुयी होगी।

उपरोक वर्णित आधार पर यद्यपि विधि सम्बन्धी आधार है किन्तु यह अत्यन्त विस्तृत थे एवं भ्रामक भी थे। इसलिये जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, आधारों को सीमित करने के लिये धारा 100 में आमूल परिवर्तन कर दिया गया।

संशोधित धारा 100 के अधीन अपीले-धारा 100 में उपबन्धित प्रावधानों के अनुसार उच्च न्यायालय के अधीनस्थ किसी न्यायालय द्वारा अपील में पारित प्रत्येक डिक्री की उच्च न्यायालय में अपील हो सकेगी, यदि उच्च न्यायालय को यह समाधान हो जाता है कि उस मामले में विधि का कोई सारवान प्रश्न अन्तर्वलित (निहित) है।

साधारण भाषा में अब उच्च न्यायालय में यहीं द्वितीय अपील होगी जहाँ उच्च न्यायालय की राय में उस मामले में विधि का सारवान् प्रश्न (substantial question of law) निहित है। विधि का सारवान् प्रश्न द्वितीय अपील की एक अनिवार्य शर्त है। द्वित्तीय अपील के विरुद्ध प्रत्याक्षेप (cross objection) किया जाना है, वहाँ ऐसे प्रत्याक्षेप की अनुमति तभी दो जायेगी जब उसमें विधि का सारवान् प्रश्न अन्तर्वलित हो।

धारा 100 के अर्थों में उच्च न्यायालय की अधिकारिता सीमित है। वह न्यायालयों के समवर्ती निष्कर्ष में तभी हस्तक्षेप कर सकती है जब अपील में विधि का सारवान् प्रश्न अन्तर्वलित हो। यह प्रश्न कि क्या प्रत्यर्थी इस बात के होते हुये भी कि वह अपीलार्थों का भाई है, प्रभुत्वकारों स्थित (dominating situation) में था? यह तथ्य का प्रश्न है। स्वयंमेव इससे कोई विधि का सारवान् प्रश्न नहीं उठता इस धारा के अधीन एकपक्षीय (ex-parte) पारित डिक्री को भी अपील उच्च न्यायालय को हो सकेगी।

अतः धारा 100 की विवेचना से यह स्पष्ट है कि द्वित्तीय अपील केवल वहीं हो सकेगी जहाँ इस मामले में विधि का सारवान् प्रश्न अन्तर्वलित हो। इस तरह अब धारा 100 के अन्तर्गत केवल एक आधार दिया गया है। अब प्रक्रिया के आधार पर घटित त्रुटि के लिये दूसरी अपील का किया जाना प्रतिबन्धित कर दिया गया है।

इस तरह अब द्वितीय अपील में उच्च न्यायालय को अधिकारिता केवल उन्हों अपीलों तक सीमित है जिसमें विधि का सारवान् प्रश्न अन्तर्वलित है जहाँ बहुत ही महत्वपूर्ण विवाद्यक (core issue) का प्रथम अपीलीय न्यायालय ने न्यायनिर्णयन नहीं किया है, वहाँ धारा 100 के अन्तर्गत विधि का सारवान् प्रश्न उठता है। ऐसी स्थिति में उच्च न्यायालय द्वारा संहिता की धारा 103 का अवलम्ब लेना उचित है।

उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय उमेर खान बनाम बिसमिल्ला बाई' में कहा कि उच्च न्यायालय को धारा 100 के अधीन अपोल की सुनवाई की अधिकारिता का आधार हो है कि वह विधि के सारवान् प्रश्नों का सूत्रीकरण करे। उच्च न्यायालय का निर्णय स्पष्टतः अवैध है यदि एक द्वितीय अपील की सुनवाई में डिक्री और निर्णय जिसके विरुद्ध अपील की गयी है, उसे उलट दिया गया, बिना सारवान प्रश्नों का सूत्रीकरण किये। उच्च न्यायालय को धारा 100 के अन्तर्गत अधिकारिता धारा 96 के अन्तर्गत अपील की भांति नहीं है, अपितु विधि के सारवान् प्रश्नों या विधि के उन प्रश्नों तक सीमित है जो उस डिक्रो या निर्णय से जिसके विरुद्ध अपील की गयी है उत्पन्न होंगे।

न्यायालय की एक पूर्णपीठ के रतनलाल वंशीलाल बनाम किशोरीलाल गोयंका वाद में द्वितीय अपील से सम्बन्धित कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर प्रकाश डाला है जो निम्न प्रकार है-

(1) जहाँ अधीनस्थ न्यायालय के मुख्य सम्बन्धी निष्कर्ष तर्क विरुद्ध है या साक्ष्य के संकलन (collection) एवं मूल्यांकन करने में अवचार (misconduct) किया गया है, वहाँ द्वितीय अपील ग्रहणीय या पोषणीय है।

(2) जहाँ विधि को प्रयुक्ति (application of law) गलत हुयी है, वहाँ विधि का सारवान् प्रश्न उठता है, और द्वितीय अपील ग्रहणीय या पोषणीय है।

(3) इसी प्रकार जहाँ तथ्य सम्बन्धी निष्कर्ष साक्ष्य पर आधारित नहीं है, वहीं द्वितीय अपील हो सकती है।

(4) विधि का ऐसा प्रश्न जो वाद के (जिसमें ऐसा प्रश्न उठता है) पक्षकारों के अधिकारों को अनन्य रूप में प्रभावित करता है विधि का सारवान् प्रश्न होता है। दूसरे शब्दों में विधि के प्रश्न को विधि का सारवान् प्रश्न होने के लिये आवश्यक नहीं है कि वह सामान्य महत्व का हो।

(5) जहाँ विधि एवं तथ्य का मिश्रित प्रश्न अन्तर्वलित है, वहाँ विधि का सारवान् प्रश्न उठता क्योंकि यह पक्षकारों के अधिकार को सारभूत रूप में प्रभावित करता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को द्वितीय अपील से नहीं रोका जा सकता।

(6) जहाँ अधीनस्थ न्यायालय के तथ्य सम्बन्धी निष्कर्ष दूषित है, वहाँ विधि का सारवान् प्रश्न उठता है। अतः यहाँ भी द्वितीय अपील हो सकती है।

(7) उच्चतम न्यायालय ने शान्ता कुमारी बनाम लक्ष्मी अम्मा जानकी अम्मा में यह अभिनिर्धारित किया कि जहाँ दस्तावेजों के अर्थान्वयन का प्रश्न है, वहाँ विधि का सारवान् प्रश्न उठता है।

(8) जहाँ अधीनस्थ न्यायालय का तथ्य सम्बन्धी विनिश्चय तर्क विरुद्ध (perverse) है, वहाँ विधि का सारवान् प्रश्न उठता है क्योंकि 'तर्क विरुद्धता' का 'मुद्दा विधि के सारवान् प्रश्न' को परिधि में आता है।

द्वितीय अपील के साक्ष्य को छानवीन पूर्णरूप से प्रतिबन्धित नहीं है, फिर भी श्रेष्ठ न्यायालयों को यह अधिकार नहीं देता कि वे किसी और हर मामले में हस्तक्षेप करे। केवल अपवाद स्वरूप मामलों और नितान्त तर्क विरुद्धता पर ही साक्ष्य का परीक्षण पूरी तरह से अनुज्ञेय है। दूसरे शब्दों में यद्यपि साक्ष्य की छानबीन प्रतिबन्धित नहीं है, फिर भी यह शक्ति केवल अपवादस्वरूप परिस्थितियों और समुचित सावधानों पर हो उपलब्ध है।

परिसीमा सम्बन्धी तर्क, तथ्य एवं विधि का मिश्रित प्रश्न है। प्रथम बार इसे द्वितीय अपील में नहीं उठाया जाना चाहिये जब तक इसके लिये तथ्यगत आधार (जिसमें अभिवचन भी सम्मिलित है) न हो।

इसी प्रकार संविदा के भागिक पालन का तर्क, तथ्य एवं विधि का मिश्रित प्रश्न है। प्रथम बार इसे द्वितीय अपील में नहीं उठाया जा सकता। संविदा के पालन की तत्परता और चाह से सम्बन्धित प्रश्न पर विनिश्चय विधि एवं तथ्य का मिश्रित प्रश्न है, हक पूर्वाधिकारी बन्धकदार के उत्तराधिकारी है कि नहीं, यह शुद्ध रूप से तथ्य का प्रश्न है।

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