केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी और उसके खिलाफ अपराध दर्ज होने की खबर देने के लिए पत्रकार को मानहानि के अपराध के लिए आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। [2026 LiveLaw (Ker) 448]

जस्टिस सी.एस. डायस ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 499 [मानहानि], 501 [मानहानिकारक सामग्री छापना या उत्कीर्ण करना] और 502 [मानहानिकारक सामग्री वाली छपी या उत्कीर्ण वस्तु बेचना] का हवाला देते हुए कहा:

“आधिकारिक कार्यवाही की रिपोर्ट और स्वतंत्र रूप से किए गए मानहानिकारक दावे के बीच का अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। कोई पत्रकार मानहानि के लिए आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं होता, सिर्फ इसलिए कि किसी आधिकारिक कार्रवाई के प्रकाशन से किसी मुकदमेबाज़ की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा हो। ऊपर बताई गई धाराएं सच्ची रिपोर्टिंग को दंडित नहीं करतीं, बल्कि उस तरह के दोषी मानहानिकारक आरोप को दंडित करती हैं, जिसकी कल्पना इस प्रावधान में की गई... कोई प्रतिकूल प्रकाशन, या ऐसा प्रकाशन जिससे संबंधित व्यक्ति को शर्मिंदगी हो, अपने आप में आपराधिक मानहानि नहीं माना जाता है।”

कोर्ट ने कहा कि धारा 499 के चौथे अपवाद के पीछे का तर्क - जिसके अनुसार अदालत की कार्यवाही की काफी हद तक सच्ची रिपोर्ट मानहानि नहीं है - उसे आधिकारिक कार्यवाही की काफी हद तक सच्ची रिपोर्टिंग के मामलों में भी लागू किया जा सकता है।

कोर्ट ने आगे कहा,

“अगर कानून यह मानता है कि न्याय की अदालत के समक्ष कार्यवाही की काफी हद तक सच्ची रिपोर्ट मानहानि नहीं है तो इस तथ्य की रिपोर्टिंग को मानहानिकारक आरोप मानने का कोई औचित्य नहीं है कि किसी सक्षम वैधानिक प्राधिकरण ने अपराध दर्ज किया और आरोपी को गिरफ्तार किया; बशर्ते कि प्रकाशन काफी हद तक आधिकारिक रिकॉर्ड को दर्शाता हो और उसमें कोई स्वतंत्र या दुर्भावनापूर्ण आरोप न जोड़ा गया हो। यह अंतर महत्वपूर्ण है: सुरक्षा केवल इसलिए नहीं मिलती कि जानकारी पुलिस से मिली है। यह इसलिए मिलती है, क्योंकि प्रकाशन एक आधिकारिक कार्य की रिपोर्ट है, जो काफी हद तक रिकॉर्ड पर आधारित है, और जिसमें कोई दोषी मानसिक तत्व शामिल नहीं है।”

कोर्ट 'मलयाला मनोरमा' अखबार के संपादकों और एक रिपोर्टर द्वारा दायर याचिका पर विचार कर रहा था, जिसमें उन पर मानहानि का आरोप लगाने वाली शिकायत रद्द करने की मांग की गई। प्रतिवादी पक्ष द्वारा दायर शिकायत में आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ताओं ने रिपोर्टर की पिछली दुश्मनी के कारण जानबूझकर उसे और उसकी प्रतिष्ठा को बदनाम करने के लिए उसके नाम और तस्वीर के साथ एक झूठी खबर प्रकाशित की थी।

शिकायत के अनुसार, यह बताया गया कि आरोपी को 3 लीटर IMFL (भारतीय निर्मित विदेशी शराब) के साथ पकड़ा गया था, जिसे वह टेलीफोन पर मिले ऑर्डर के आधार पर युवाओं और बाहरी मजदूरों को बेचने वाला था। हालांकि, आधिकारिक रिकॉर्ड में केवल 2.5 लीटर शराब जब्त होने की बात सामने आई, और इसलिए आरोप है कि खबर गलत थी।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि खबर एक्साइज अधिकारियों द्वारा की गई गिरफ्तारी और आधिकारिक कार्रवाई की सही रिपोर्ट थी। यह भी बताया गया कि खबर अपराध दर्ज होने के अगले दिन प्रकाशित हुई थी और इसमें कोई मानहानि करने वाला आरोप नहीं लगाया गया।

आरोपी/शिकायतकर्ता ने बताया कि बाद में उसे अपराध से बरी कर दिया गया और उसके नाम और विवरण के साथ खबर प्रकाशित होने से समाज में उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा। उसने याचिका खारिज करने का अनुरोध करते हुए कहा कि इसमें तथ्यों से जुड़े विवादित सवाल हैं, जिनका फैसला ट्रायल के दौरान किया जाना चाहिए।

दोनों पक्षकारों को सुनने के बाद कोर्ट ने संबंधित प्रावधानों पर गौर किया और कहा कि कानून हर उस प्रकाशन को दंडित नहीं करता, जिससे प्रतिष्ठा पर बुरा असर पड़ सकता है। कोर्ट का मानना ​​था कि कोर्ट की कार्यवाही की काफी हद तक सच्ची रिपोर्टिंग के लिए दी गई छूट का तर्क, पुलिस या अन्य वैधानिक प्राधिकरणों द्वारा अपराध दर्ज करने और जांच प्राधिकरण द्वारा आरोपी की गिरफ्तारी जैसी घटनाओं के मामले में भी लागू होता है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया,

"चौथे अपवाद को यांत्रिक रूप से पुलिस की कार्यवाही पर लागू नहीं किया जा सकता। इसकी स्पष्ट भाषा न्याय की अदालत की कार्यवाही तक ही सीमित है। फिर भी, इसके पीछे का मूल तर्क—कि किसी आधिकारिक कार्यवाही की काफी हद तक सच्ची रिपोर्टिंग, जिसमें कोई स्वतंत्र मानहानिकारक आरोप या दोषी इरादा न हो, उसे आम तौर पर आपराधिक मानहानि में नहीं बदला जाना चाहिए—को धारा 499 के आवश्यक तत्वों की जांच करते समय नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।"

कोर्ट ने कहा कि महत्वपूर्ण बात आपराधिक इरादे या 'मेन्स रिया' (अपराध करने का इरादा) का होना है, न कि यह कि रिपोर्टिंग से किसी को बुरा लगा या कोई अप्रिय स्थिति पैदा हुई।

मामले के तथ्यों को देखते हुए कोर्ट ने पाया कि समाचार रिपोर्ट घटना की रिपोर्ट पर आधारित थी। कोर्ट ने आगे कहा कि भले ही कुछ तथ्यात्मक त्रुटियां थीं, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे यह पता चले कि उन्हें जानबूझकर मानहानि के इरादे से गढ़ा गया।

इस प्रकार, कोर्ट ने अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए आपराधिक शिकायत और उसके आधार पर शुरू की गई सभी आगे की कार्यवाही रद्द की।

Case Title: Mammen Mathew and Ors. v. State of Kerala and Anr.

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