पत्नी ने पति पर HIV/AIDS होने का आरोप लगाया - बिना सबूत के यह दावा तलाक़ के लिए काफ़ी नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि अगर कोई व्यक्ति यह दावा करता है कि उसके जीवनसाथी ने उस पर HIV/AIDS जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित होने का आरोप लगाया तो यह तलाक़ लेने के लिए 'मानसिक क्रूरता' नहीं मानी जाएगी, जब तक कि इस दावे के समर्थन में पर्याप्त सबूत न हों।
जस्टिस सूरज गोविंदराज और डॉ. जस्टिस चिल्लाकुरे सुमालता की डिवीज़न बेंच ने तलाक़ का आदेश रद्द करते हुए कहा कि फ़ैमिली कोर्ट ने पति की उस गवाही को आँख मूँदकर मानकर गलती की, जिसमें उसने दावा किया कि उसकी पत्नी ने उस पर HIV/AIDS से पीड़ित होने का आरोप लगाया; जबकि इस गवाही के समर्थन में कोई और सबूत नहीं है।
"पति का कहना है कि पत्नी और उसके माता-पिता ने उसके साथ बुरा बर्ताव किया, गाली-गलौज और अश्लील भाषा का इस्तेमाल किया। साथ ही उस पर HIV/AIDS से पीड़ित होने का आरोप लगाया। अगर ये आरोप साबित हो जाते हैं तो वे निस्संदेह 'हिंदू विवाह अधिनियम, 1955' की धारा 13(1)(ia) के तहत 'मानसिक क्रूरता' के दायरे में आएँगे, खासकर इन आरोपों की गंभीरता और उनसे जुड़े सामाजिक कलंक को देखते हुए। हालांकि, अहम सवाल यह नहीं है कि आरोप किस तरह का है, बल्कि यह है कि क्या वह आरोप क़ानून के मुताबिक़ साबित हुआ है। अपने मामले के समर्थन में, पति ने ख़ुद को ही गवाह (PW.1) के तौर पर पेश किया है। कोई दस्तावेज़ी सबूत पेश नहीं किया गया। किसी भी स्वतंत्र गवाह की गवाही नहीं ली गई। पति के बयान की पुष्टि करने के लिए कोई समकालीन सामग्री (जैसे शिकायतें, पत्र-व्यवहार, या कथित दुर्व्यवहार को देखने वाले लोगों की गवाही) मौजूद नहीं है। इसलिए 'क्रूरता' का यह निष्कर्ष पूरी तरह से पति की उस गवाही पर आधारित है, जिसके समर्थन में कोई और सबूत नहीं है और जो उसके अपने हित में दी गई।"
कोर्ट ने कहा कि जब आरोप गंभीर प्रकृति का हो, जैसे कि किसी पर गंभीर बीमारी होने का आरोप लगाना तो 'क्रूरता' का निष्कर्ष देने से पहले कोर्ट को कुछ हद तक पुष्टि या सहायक परिस्थितियों की तलाश ज़रूर करनी चाहिए।
बेंच ने कहा,
"बिना किसी सहायक सामग्री के ऐसे आरोपों को स्वीकार करने से न्याय-निर्णयन की प्रक्रिया 'वस्तुनिष्ठ न्यायिक निर्धारण' के बजाय 'व्यक्तिपरक संतुष्टि' पर निर्भर हो जाएगी।"
बेंच ने आगे कहा कि सबूतों से जुड़ी प्रक्रियाओं में 'अलग-अलग मापदंड' नहीं हो सकते। कोर्ट ने कहा कि पति द्वारा पत्नी पर लगाए गए आरोप कि उसने पति की बीमारी के बारे में झूठी बातें कही हैं, अगर सच साबित हो जाते तो वे 'हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) के दायरे में' आते; खासकर इन आरोपों की 'गंभीर और कलंक लगाने वाली प्रकृति' को देखते हुए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अपील पत्नी ने बीदर की फैमिली कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर की थी, जिसमें शादी खत्म करने का फैसला सुनाया गया। दोनों पक्षों की शादी 2002 में हुई, जिससे उन्हें दो बेटे हुए।
पति ने फैमिली कोर्ट में तलाक की मांग इस आधार पर की थी कि पत्नी ने अन्य कारणों के अलावा, उस पर झूठा आरोप लगाया कि वह HIV/AIDS का मरीज़ है। पति (प्रतिवादी) ने यह भी दलील दी थी कि पत्नी ने उस पर गलत तरीके से आरोप लगाया कि उसका किसी दूसरी महिला के साथ नाजायज़ संबंध है। पति ने पत्नी द्वारा की गई कथित तौर पर बदनामी करने वाली टिप्पणियों और आरोपों को 'मानसिक क्रूरता' [हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia)] के दायरे में लाने की कोशिश की थी।
इसके विपरीत पत्नी ने फैमिली कोर्ट में यह दलील दी कि उसके पति के नाजायज़ संबंधों ने उसे अपना वैवाहिक घर छोड़ने और अलग रहने पर मजबूर किया। उसके अनुसार, उसके पति और उसके परिवार वालों ने उसके साथ बुरा बर्ताव किया।
फैमिली कोर्ट ने पत्नी द्वारा लगाए गए HIV/AIDS के आरोप के बारे में पति की दलीलों को मान लिया और पत्नी द्वारा की गई मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक दे दिया। फैमिली कोर्ट ने यह निष्कर्ष भी निकाला कि पत्नी ने अपना वैवाहिक घर छोड़ दिया, जो शादी खत्म करने का एक और आधार था।
इस आदेश से दुखी होकर पत्नी ने अपील में हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
निष्कर्ष
पत्नी द्वारा दी गई दलीलों को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने इस विसंगति की ओर इशारा किया कि पत्नी के नाजायज़ संबंधों के बारे में मौखिक दावों को नज़रअंदाज़ किया गया, जबकि पति की गवाही, जिसमें पत्नी द्वारा की गई कथित क्रूरता के कार्य शामिल थे, को आसानी से स्वीकार कर लिया गया।
कलबुर्गी में बैठी बेंच ने आगे स्पष्ट किया,
"न्यायिक प्रक्रिया यह अनिवार्य करती है कि दोनों पक्षों पर सबूतों के मानक एक समान रूप से लागू हों। कोई भी निष्कर्ष तब तक सही नहीं माना जा सकता, जब एक पक्ष की बिना किसी पुष्टि के दी गई गवाही को स्वीकार कर लिया जाए, जबकि दूसरे पक्ष की गवाही को पुष्टि की कमी के कारण अस्वीकार कर दिया जाए। इस तरह के अंतर का कोई तर्कसंगत आधार न हो।"
पत्नी के वकील ने भी उसके पति और किसी अन्य महिला के बीच हुए अवैध संबंध से जन्मे एक और बेटे से संबंधित दस्तावेज़ पेश करने की इच्छा व्यक्त की।
अदालत ने दूसरे बेटे के होने के बारे में अर्जी और उसके साथ दायर हलफनामे पर गौर करते हुए यह पाया कि पति का यह आरोप कि पत्नी ने उसे छोड़ दिया, भरोसे लायक नहीं लगता; यह टिप्पणी अदालत ने पत्नी के उस आरोप और दस्तावेजी सबूतों के आधार पर की, जिसमें उसने दावा किया कि वह यह साबित कर सकती है कि पति का किसी दूसरी महिला के साथ कथित तौर पर अवैध संबंध था, जिससे एक और बच्चा पैदा हुआ था।
अदालत ने अपने आदेश में यह बात कही,
“पत्नी ने लगातार यह दलील दी है कि उसका अलग रहना उसकी अपनी मर्जी से नहीं था, बल्कि पति के बर्ताव—जिसमें उसका दूसरी महिला के साथ कथित संबंध भी शामिल है—की वजह से उसे ऐसा करने पर मजबूर होना पड़ा। अगर यह दलील सही साबित हो जाती है, तो इसका कानूनी नतीजा बहुत अहम होगा: अलगाव को 'छोड़ देना' (Desertion) नहीं माना जाएगा, बल्कि इसे साथ रहने से 'जायज़ तौर पर अलग होना' माना जाएगा। कानून किसी भी जीवनसाथी को तब तक शादी के बंधन में बंधे रहने के लिए मजबूर नहीं करता, जब दूसरे जीवनसाथी का बर्ताव साथ रहना मुश्किल, असुरक्षित या अपमानजनक बना दे।”
अदालत ने आगे कहा कि अगर पति किसी दूसरी महिला के साथ अवैध संबंध में रह रहा है तो पत्नी के लिए अलग रहना एक जायज़ वजह मानी जाएगी, और पत्नी के इस कदम को 'छोड़ देना' नहीं माना जाएगा।
तदनुसार, हाईकोर्ट ने तलाक का आदेश रद्द किया और बीदर फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि वह तलाक की अर्जी पर फिर से विचार करे। इसके लिए अदालत दोनों पक्षों को सबूत पेश करने, क्रॉस एग्जामिनेशन करने आदि का मौका दे और 6 महीने के भीतर इस मामले पर अपना फैसला सुनाए।
Case Title: S v. R & Anr.