2012 कोर्ट हिंसा मामला: कर्नाटक हाईकोर्ट ने TV9 के खिलाफ केस किया रद्द, कहा—केबल टीवी एक्ट का डिक्रिमिनलाइजेशन पिछली तारीख से लागू
कर्नाटक हाईकोर्ट ने TV9 कर्नाटक प्राइवेट लिमिटेड और उसके पूर्व संवाददाताओं के खिलाफ 2012 सिटी सिविल कोर्ट परिसर हिंसा मामले में चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा कि केबल टेलीविजन नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम, 1995 के तहत अपराध को 2023 के संशोधन द्वारा डिक्रिमिनलाइज कर दिया गया है और इसका लाभ लंबित मामलों पर भी लागू होगा।
जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने TV9 न्यूज चैनल और उसके संवाददाताओं द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए 2025 में CBI स्पेशल कोर्ट में दर्ज आपराधिक कार्यवाही को खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि जिस कृत्य को पहले आपराधिक माना जाता था, उसे अब विधायी संशोधन के जरिए नागरिक उल्लंघन (civil transgression) के रूप में बदल दिया गया है। ऐसे में आपराधिक मुकदमा जारी रखना न केवल संशोधित कानून के विरुद्ध होगा, बल्कि आपराधिक न्यायशास्त्र की निष्पक्षता की भावना के भी खिलाफ होगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केबल टेलीविजन नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम, 1995 की धारा 16 में 2023 के संशोधन के बाद अब केवल नियामकीय दंड—जैसे चेतावनी, फटकार या जुर्माना—का प्रावधान है, न कि आपराधिक सजा।
यह मामला मार्च 2012 की उस घटना से जुड़ा है, जब पूर्व मंत्री गाली जनार्दन रेड्डी को सिटी सिविल कोर्ट परिसर में पेश किए जाने के दौरान वकीलों और मीडिया कर्मियों के बीच झड़प हुई थी। इस घटना में कई लोग घायल हुए थे और 191 FIR दर्ज की गई थीं। बाद में जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी।
हाईकोर्ट ने पहले 2019 में भी कार्यवाही रद्द करते हुए CBI को उचित अनुमति लेकर नई शिकायत दर्ज करने की छूट दी थी। इसके बाद 2023 में नई शिकायत दर्ज की गई, लेकिन उसी वर्ष जन विश्वास (संशोधन) अधिनियम, 2023 के लागू होने से धारा 16 को डिक्रिमिनलाइज कर दिया गया।
अदालत ने T. Barai v. Henry Ah Hoe (1982) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई संशोधन आरोपी को लाभ पहुंचाता है, तो उसे लंबित मामलों पर भी लागू किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि 2023 में जब नई शिकायत दर्ज की गई, उस समय धारा 16 के तहत कोई आपराधिक अपराध अस्तित्व में ही नहीं था, इसलिए अभियोजन का आधार ही समाप्त हो चुका था।
इसके अलावा, अदालत ने करीब 8 साल की देरी को भी गंभीर माना और Manoj Kumar Sharma v. State of Chhattisgarh (2016) का हवाला देते हुए कहा कि इतनी लंबी देरी अपने आप में कार्यवाही रद्द करने का आधार है।
अदालत ने टिप्पणी की कि राज्य ने लंबे समय तक निष्क्रिय रहने के बाद बिना किसी नए तथ्य के उसी मामले को फिर से शुरू करने की कोशिश की, जो कानून के दायरे का सही उपयोग नहीं बल्कि उसका दुरुपयोग है।
इन सभी कारणों से हाईकोर्ट ने बेंगलुरु की ट्रायल कोर्ट में लंबित सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया और याचिका को स्वीकार कर लिया।