अनुबंध के आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर बताना और शिकायत करना कि टैक्स अधिकारियों ने ऐसे आंकड़ों के आधार पर अपना निर्णय लिया, राज्य के साथ धोखाधड़ी: कर्नाटक हाईकोर्ट

Update: 2025-04-01 06:09 GMT
अनुबंध के आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर बताना और शिकायत करना कि टैक्स अधिकारियों ने ऐसे आंकड़ों के आधार पर अपना निर्णय लिया, राज्य के साथ धोखाधड़ी: कर्नाटक हाईकोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि अनुबंध के आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर बताना और शिकायत करना कि कर अधिकारियों ने ऐसे आंकड़ों के आधार पर अपना निर्णय लिया है, राज्य के साथ धोखाधड़ी है।

जस्टिस कृष्ण एस दीक्षित और जस्टिस रामचंद्र डी. हुद्दार की खंडपीठ ने कहा,

"बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए आंकड़ों के आधार पर अनुबंध की उच्च राशि का दावा करना और उसके बाद शिकायत करना कि कर अधिकारियों ने ऐसे आंकड़ों के आधार पर अपना निर्णय लिया है, वस्तुतः राज्य के साथ दो तरह से धोखाधड़ी है। ऐसे करदाता को इस न्यायालय से किसी तरह की राहत नहीं मिलनी चाहिए।"

इस मामले में करदाता के अनुसार उसके कर सलाहकार ने फर्जी फॉर्म वैट 156 जमा करके रिफंड का दावा करने के इरादे से बढ़ा-चढ़ाकर टर्नओवर घोषित किया। उसने उक्त कर सलाहकार के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी, जो अब जीवित नहीं है।

करदाता ने दलील दी कि कर सलाहकार द्वारा की गई धोखाधड़ी के लिए करदाता को दंडित नहीं किया जाना चाहिए। यह एक बहुत व्यापक प्रस्ताव है, जिसे स्वीकार करना मुश्किल है। विवादित आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का घोर उल्लंघन करते हुए पारित किया गया, क्योंकि उसे अपना पक्ष प्रभावी ढंग से रखने का कोई अवसर नहीं दिया गया।

राजस्व ने दलील दी कि अवसर दिए जाने के बावजूद करदाता ने अपनी खाता बही या कोई प्रासंगिक साक्ष्य सामग्री प्रस्तुत नहीं की। कर सलाहकार करदाता का एजेंट है और उसी के रूप में कार्य करता है। यदि उसने बढ़ा-चढ़ाकर आंकड़े पेश किए हैं तो यह अपील में राहत देने का कोई आधार नहीं है।

खंडपीठ ने राजस्व के साथ सहमति व्यक्त की कि कर सलाहकार करदाता का एजेंट है, भले ही अधिनियम में पेशेवर तत्व शामिल हों। ऐसा नहीं है कि करदाता ने राजस्व के समक्ष दाखिल रिटर्न और अभिलेखों पर मानक तरीके से अपने हस्ताक्षर नहीं किए। ऐसा भी नहीं है कि कर सलाहकार को रिटर्न में बताए गए बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए आंकड़ों से कोई लाभ हुआ होगा; जाहिर है, करदाता ही लाभार्थी था।

खंडपीठ ने कहा कि करदाता का यह तर्क कि राजस्व विभाग ने मामले को पक्षपातपूर्ण तरीके से लिया है, बहुत दूर की बात है। खंडपीठ ने आगे कहा कि राज्य का उच्च अधिकारी जो करदाता की कर देयता तय करने में अर्ध-न्यायिक रूप से कार्य करता है, उसे पक्षपातपूर्ण क्यों माना जाना चाहिए, इसका उत्तर नहीं दिया गया।

इस तरह के तर्क को आधारभूत आधार बनाए बिना समर्थन नहीं दिया जा सकता। खंडपीठ ने कहा कि राजस्व विभाग ने करदाता के सभी तर्कों पर विवेकपूर्ण तरीके से विचार किया है, जैसा कि विवादित आदेश में दर्शाया गया है। उपरोक्त के मद्देनजर पीठ ने अपील खारिज कर दी।

टाइटल: येल्ललिंगा इलेक्ट्रिकल्स बनाम वाणिज्यिक कर के अतिरिक्त आयुक्त

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