कर्नाटक हाईकोर्ट ने हाल ही में एक पति की अपील खारिज की। पति ने फैमिली कोर्ट द्वारा मानसिक क्रूरता के आधार पर दिए गए तलाक के आदेश और पत्नी को दिए गए स्थायी गुजारे-भत्ते (एलिमनी) को चुनौती दी थी। ऐसा करते हुए कोर्ट ने एक अहम बात कही कि एक ही घर में अलग-अलग कमरों में रहना, अपने आप में क्रूरता नहीं माना जा सकता। [2026 LiveLaw (Kar) 318]

कोर्ट ने आदेश में कहा,

"...अकेले इस आधार पर ऐसी व्यवस्था [अलग-अलग कमरे] को क्रूरता नहीं माना जा सकता। सिर्फ़ इस बात से कि पति-पत्नी अलग-अलग कमरों में रहते हैं, क्रूरता का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। महत्वपूर्ण बात यह है कि किन हालात में ऐसा अलगाव हुआ और वैवाहिक रिश्ते कैसे आगे बढ़े..."

जस्टिस डी.के. सिंह और जस्टिस एच. शांति भूषण की डिवीजन बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि एक ही घर में अलग-अलग कमरों में रहने से, बिना किसी अन्य कारण के, क्रूरता का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

कोर्ट ने आगे कहा,

"...एक महत्वपूर्ण बात यह है कि काफी समय तक दोनों पक्ष एक ही घर में रहते हुए भी अलग-अलग कमरों में रहे और काफी हद तक अलग-अलग जीवन जिया। अपीलकर्ता [पति] ने खुद माना है कि दोनों पक्ष एक ही घर में अलग-अलग रह रहे थे, जिसमें अपीलकर्ता एक कमरे में और प्रतिवादी (पत्नी) दूसरे कमरे में बच्चों में से एक के साथ रह रही थी..."

हालांकि, कोर्ट ने माना कि जब ऐसा अलगाव लंबे समय से चल रहे वैवाहिक इतिहास का एक हिस्सा होता है, जिसमें बार-बार झगड़े हुए हों तो इसका कुल असर हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता साबित करता है।

कोर्ट ने इस नतीजे पर पहुंचते हुए कहा,

"...मौजूदा मामले में इस स्थिति को अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता। यह लंबे समय से चल रहे वैवाहिक इतिहास का हिस्सा है जिसमें बार-बार झगड़े, दुर्व्यवहार के आरोप, अलगाव, पहले की वैवाहिक कार्यवाही, सुलह की कोशिश और आखिरकार रिश्ते का टूटना शामिल है..."

कोर्ट ने यह भी बताया कि फैमिली कोर्ट ने इस मामले में तलाक 'छोड़ देने' (डेज़र्शन) या शादी के 'ना-सुधरने लायक टूटने' (इरट्रिवेबल ब्रेकडाउन) के स्वतंत्र आधारों पर नहीं, बल्कि क्रूरता के आधार पर दिया।

कोर्ट ने कहा,

“दोनों पक्षकारों का अलग-अलग रहना सिर्फ़ इस बात के संदर्भ में अहम है कि इससे उनके वैवाहिक व्यवहार की प्रकृति, निरंतरता और असर पर क्या फ़र्क पड़ा। इसी तरह इस बात को शादी खत्म करने का कोई अलग आधार नहीं माना जा रहा है कि असल में उनका वैवाहिक रिश्ता काम नहीं कर रहा था। यह उन परिस्थितियों में से एक है, जिन पर रिकॉर्ड में साबित हुए व्यवहार के कुल असर का आकलन करते समय विचार किया गया...”

बता दें, अपील करने वाले पति ने बेंगलुरु फ़ैमिली कोर्ट के 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत क्रूरता के आधार पर तलाक की डिक्री के ज़रिए दोनों पक्षों की शादी खत्म कर दी गई। फ़ैमिली कोर्ट ने अपील करने वाले को प्रतिवादी पत्नी को हर महीने 25,000 रुपये का स्थायी गुज़ारा भत्ता देने का भी निर्देश दिया था।

अपील करने वाले ने क्रूरता के आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि वे झूठे और बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए, और रिश्ता खराब होने के लिए खुद प्रतिवादी ही ज़िम्मेदार थी। उसने यह भी तर्क दिया कि उसकी पूर्व पत्नी अपने परिवार के सदस्यों के प्रभाव में थी। उसने धमकी दी थी और असल में धारा 498-A के तहत शिकायत भी दर्ज कराई थी।

तलाक को सही ठहराने से पहले कोर्ट ने रिकॉर्ड में मौजूद सबूतों से सामने आई आठ परिस्थितियों का ज़िक्र किया:

“(i) दोनों पक्षों के बीच बार-बार और गंभीर वैवाहिक विवाद होते रहे थे; (ii) प्रतिवादी ने लगातार मौखिक और भावनात्मक दुर्व्यवहार और उपेक्षा की बात कही है; (iii) दोनों पक्ष एक ही घर में रहते हुए भी काफी समय से अलग-अलग रह रहे थे; (iv) अपीलकर्ता ने शराब पीने, गुटखा/तंबाकू चबाने और धूम्रपान करने की अपनी आदतों को स्वीकार किया है; (v) अपीलकर्ता ने खुद ही पहले वैवाहिक कार्यवाही शुरू की थी; (vi) सुलह की कोशिश के बावजूद, वैवाहिक संबंध फिर से खराब हो गए; (vii) इसके बाद दोनों पक्ष लंबे समय तक अलग-अलग रहे; और (viii) सुलह के मौकों के बावजूद वैवाहिक संबंध फिर से ठीक नहीं हो पाए।”

इसलिए अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि किसी जीवनसाथी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अनिश्चित काल तक ऐसा व्यवहार सहन करे जिससे लगातार मानसिक पीड़ा हो और साथ रहने व वैवाहिक सुरक्षा के बुनियादी तत्व खत्म हो जाएं।

अदालत ने कहा,

“इन परिस्थितियों का कुल असर हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत मानसिक क्रूरता साबित करने के लिए काफी है।”

इसके अलावा, अदालत ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने दोनों की आय, परिस्थितियों और बच्चों की शिक्षा व मेडिकल संबंधी जरूरतों पर ठीक से विचार किया, और 25,000 रुपये प्रति माह की राशि को बहुत ज़्यादा या मनमाना नहीं कहा जा सकता।

तदनुसार, अदालत ने अपीलकर्ता-पति और प्रतिवादी-पत्नी के बीच विवाह को खत्म करने के आदेश (डिक्री) और दी गई स्थायी गुजारा-भत्ते (एलिमनी) की राशि बरकरार रखी।

Case No: Miscellaneous First Appeal No. 8362/2025(FC)

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