RTI के तहत सरकारी कर्मचारी के वित्तीय मामलों का खुलासा करने की ज़रूरत नहीं, जब तक कि कोई बड़ा जनहित न हो: कर्नाटक हाईकोर्ट

Update: 2026-06-11 15:29 GMT

कर्नाटक हाईकोर्ट ने RTI आवेदक की याचिका खारिज की। आवेदक ने राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) के पूर्व डिप्टी कंट्रोलर (सरकारी कर्मचारी) की संपत्ति और देनदारियों का विवरण सार्वजनिक करने की मांग की। कोर्ट ने कहा कि मांगी गई जानकारी निजी थी और उसका किसी जनहित से कोई लेना-देना नहीं था, इसलिए यह RTI Act की धारा 8(1)(j) के तहत सुरक्षित है।

कोर्ट ने कहा कि आधिकारिक कार्यों, फैसलों, सार्वजनिक संसाधनों के इस्तेमाल और लोक प्रशासन से सीधे जुड़े मामलों की स्थिति अलग होगी।

जस्टिस सुरह गोविंदराज ने कहा,

"हालांकि, निजी संपत्ति, देनदारियों, वित्तीय मामलों, आय के विवरण, टैक्स रिकॉर्ड, पारिवारिक मामलों, मेडिकल रिकॉर्ड और इसी तरह की निजी जानकारी आमतौर पर RTI Act की धारा 8 की उप-धारा (1) के क्लॉज (j) के तहत सुरक्षित निजी जानकारी के दायरे में आएगी, जब तक कि इसका खुलासा किसी बड़े जनहित में उचित न हो।"

इसलिए कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक कर्तव्यों के पालन से जुड़ी जानकारी और सरकारी कर्मचारी के निजी मामलों से जुड़ी जानकारी के बीच स्पष्ट अंतर है। याचिकाकर्ता की इस दलील को खारिज करते हुए कि चूंकि अधिकारी एक सार्वजनिक पद पर था और उसे लागू सेवा नियमों के तहत अपनी संपत्ति और देनदारियों का खुलासा करना था, इसलिए मांगी गई जानकारी सार्वजनिक जानकारी का रूप ले लेती है और धारा 8(1)(j) का हवाला देकर इसे देने से इनकार नहीं किया जा सकता।

अदालत ने कहा:

"इस दलील को उस व्यापक तरीके से स्वीकार नहीं किया जा सकता, जिस तरह से इसे पेश किया गया। केवल इसलिए कि कोई व्यक्ति लोक सेवक है, इसका मतलब यह नहीं है कि उससे जुड़ी हर जानकारी RTI Act के तहत सार्वजनिक रूप से उजागर करने योग्य हो जाती है। यदि इस तरह की व्याख्या को स्वीकार कर लिया जाता है तो RTI Act की धारा 8 की उप-धारा (1) के खंड (j) के तहत स्पष्ट रूप से दी गई सुरक्षा उन लोगों के एक पूरे वर्ग के संबंध में काफी हद तक कम हो जाएगी, जो सार्वजनिक पद पर हैं।

ऐसी व्याख्या RTI Act की धारा 8 की उप-धारा (1) के खंड (j) के पीछे के विधायी इरादे के विपरीत होगी, जो यह मानता है कि लोक सेवक केवल सार्वजनिक सेवा में अपनी नौकरी के कारण निजता के अधिकार नहीं खो देते हैं।"

सिंगल जज बेंच ने याचिकाकर्ता की जमीन के लिए पूर्व लोक सेवक द्वारा कथित रूप से धोखाधड़ी से हासिल किए गए बिक्री विलेख (सेल डीड) के संबंध में 1997-2005 के बीच के वित्तीय विवरणों के अनुरोध को स्वीकार करने से इनकार करते हुए इस बात पर जोर दिया कि RTI Act, 2005 के तहत व्यक्तिगत जानकारी को सार्वजनिक जानकारी में नहीं बदला जा सकता है।

बेंच ने कहा,

"...केवल आरोप, चाहे वे कितने भी गंभीर क्यों न हों, अपने आप में व्यक्तिगत जानकारी को सार्वजनिक जानकारी में नहीं बदल सकते। यदि इस तरह के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जाता है तो खंड (8(1))(j) के तहत दी गई सुरक्षा... किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगाकर और उसके बाद उसके व्यक्तिगत रिकॉर्ड का खुलासा करने की मांग करके बेकार की जा सकती है..."

इसलिए हाईकोर्ट ने PIO और कर्नाटक सूचना आयोग के आदेशों को सही ठहराया और मेरिट न होने के कारण रिट याचिका खारिज की।

Case Title: Smt. S. Savithramma v. The Karnataka Information Commission & Ors.

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