अगर पहली शादी कायम है तो स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत मुस्लिम व्यक्ति की दूसरी शादी मान्य नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 के तहत की गई शादी, अगर पहले से कोई शादी कायम है तो वह शुरू से ही अमान्य (void ab initio) होती है, भले ही संबंधित पक्ष ऐसे पर्सनल लॉ (व्यक्तिगत कानून) के दायरे में आते हों, जो एक से ज़्यादा शादियों की इजाज़त देता हो। [2026 LiveLaw (Kar) 265]
जस्टिस सचिन शंकर मगदुम की सिंगल जज बेंच ने कहा कि ऐसी शादी दूसरी पत्नी को कानूनी रूप से विवाहित पत्नी का दर्जा नहीं देती है।
इस बात को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने एक महिला द्वारा दायर रिट याचिका पर विचार करने से इनकार किया, जिसमें उसने संपत्ति के बंटवारे के मुकदमे (पार्टीशन सूट) में अपने दिवंगत पति की कानूनी प्रतिनिधि के तौर पर शामिल होने की मांग की थी।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता और दिवंगत व्यक्ति के बीच हुई शादी स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 4(a) का उल्लंघन थी, जिसके तहत यह ज़रूरी है कि शादी के समय किसी भी पक्ष का कोई जीवनसाथी जीवित न हो।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा,
"...एक बार जब पक्ष स्वेच्छा से इस एक्ट के तहत शादी करने का फैसला करते हैं तो वे इसमें बताई गई अनिवार्य शर्तों से बंध जाते हैं। कानूनी ज़रूरत कि किसी भी पक्ष का कोई जीवनसाथी जीवित न हो, उसे पर्सनल लॉ या किसी भी न्यायपूर्ण विचार का सहारा लेकर कम नहीं किया जा सकता... यह सच है कि मोहम्मडन पर्सनल लॉ, उसमें बताई गई शर्तों और सीमाओं के अधीन, एक मुस्लिम पुरुष को एक से ज़्यादा शादियां करने की इजाज़त देता है। हालांकि, ऐसी इजाज़त केवल उस पर्सनल लॉ के दायरे में ही लागू होती है जो उसके तहत की गई शादियों को नियंत्रित करता है..."
दिवंगत व्यक्ति की दूसरी पत्नी होने का दावा करने वाली याचिकाकर्ता ने बल्लारी के प्रिंसिपल सीनियर सिविल जज के सामने संपत्ति के बंटवारे के मुकदमे में अपनी बेटी के साथ कानूनी प्रतिनिधि के तौर पर शामिल होने के लिए आवेदन किया। उसने दावा किया कि उसने 24 अप्रैल, 2008 को स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 के तहत दिवंगत व्यक्ति से शादी की थी और शादी का सर्टिफिकेट भी हासिल किया।
हालांकि, शुरू में 11 सितंबर, 2024 को आवेदनों को मंज़ूरी दी गई, लेकिन इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। कोर्ट ने आदेश रद्द किया और मामले को ट्रायल कोर्ट के पास वापस भेज दिया ताकि आवेदकों की स्थिति की जांच की जा सके।
जांच के बाद ट्रायल कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता की शादी शुरू से ही अमान्य थी। कोर्ट ने तर्क दिया कि कथित शादी की तारीख पर पहली शादी कायम थी, इसलिए याचिकाकर्ता की पक्षकार बनने की अर्जी खारिज कर दी गई, जबकि बेटी को रिकॉर्ड पर लाने की इजाज़त दी गई।
हाईकोर्ट ने गौर किया कि याचिकाकर्ता ने खुद अपने हलफनामे में माना था कि वह मृतक की दूसरी पत्नी थी और उसकी पहली पत्नी जीवित थी।
कोर्ट ने कहा,
"...एक बार जब ये बुनियादी तथ्य मान लिए जाते हैं तो इसका नतीजा यह होता है कि 24.04.2008 की कथित शादी, भले ही उसे एक्ट के तहत संपन्न बताया गया हो, एक्ट की धारा 4(a) का सीधा उल्लंघन थी..."
कोर्ट ने एमडी अख़िल आलम बनाम तुम्पा चक्रवर्ती मामले का हवाला देते हुए यह भी कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ, स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 4(a) के तहत कानूनी अनिवार्यता को दरकिनार नहीं कर सकता।
कोर्ट ने कहा,
"...जब कोई पक्ष स्वेच्छा से एक्ट के प्रावधानों के तहत शादी करने का फैसला करता है तो कानूनी स्थिति में बुनियादी बदलाव आ जाता है। यह एक्ट एक धर्मनिरपेक्ष और अपने आप में पूर्ण कानून है जो इसके प्रावधानों के तहत की गई शादियों की शर्तों, संपन्न होने की प्रक्रिया और नतीजों को नियंत्रित करता है। एक बार जब पक्ष अपने पर्सनल लॉ के बजाय एक्ट के प्रावधानों को जानबूझकर अपनाते हैं, तो वे संसद द्वारा बनाए गए अनिवार्य कानूनी नियमों के दायरे में आ जाते हैं। इसलिए ऐसी शादी से जुड़े अधिकार और दायित्व पर्सनल लॉ से नहीं, बल्कि पूरी तरह से एक्ट के प्रावधानों से तय होते हैं..."
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि पक्ष स्पेशल मैरिज एक्ट के फायदों का चुनिंदा तरीके से इस्तेमाल नहीं कर सकते और साथ ही अपने पर्सनल लॉ के तहत छूट का दावा भी नहीं कर सकते।
कोर्ट ने आगे कहा,
"...जहां किसी पहले से मौजूद वैध शादी के दौरान एक्ट के तहत शादी संपन्न हुई हो, वहां उसकी वैधता की जांच सिर्फ़ एक्ट के प्रावधानों के आधार पर ही की जानी चाहिए। अगर कानूनी शर्तों का उल्लंघन पाया जाता है तो वह शादी शुरू से ही अमान्य (शून्य) होती है और इसमें शामिल पक्षों को पति या पत्नी का कानूनी दर्जा नहीं देती है..."
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अमान्य शादी से पैदा हुआ बच्चा उचित कानूनी कार्यवाही में अपने कानूनी अधिकारों का दावा कर सकता है।
कोर्ट ने आगे कहा,
“…अमान्य शादी से पैदा हुए बच्चों को कानूनी सुरक्षा पाने का अधिकार है और वे उचित कार्यवाही में अपने कानूनी अधिकारों का प्रतिनिधित्व करने के लिए सक्षम हैं। इस स्थापित कानूनी स्थिति को ध्यान में रखते हुए ट्रायल कोर्ट ने प्रस्तावित प्रतिवादी नंबर 2(f), यानी बेटी को रिकॉर्ड पर आने की अनुमति दी है।”
इसलिए कोर्ट ने रिट याचिका खारिज की और जांच के बाद ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रखा।
Case Title: K v. M