बिल्डर ने प्रोजेक्ट बंद कर फ्लैट तीसरे पक्ष को बेच दिया तो कर्जदार के खिलाफ FIR दर्ज नहीं करा सकता बैंक: कर्नाटक हाईकोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट ने अहम फैसले में होम लोन लेने वाले व्यक्ति के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला रद्द किया। इस मामले में बिल्डर ने आवासीय परियोजना अधूरी छोड़ दी और संबंधित फ्लैट किसी तीसरे व्यक्ति को बेच दिया था, जबकि बैंक का कर्ज बकाया रह गया। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल कर्ज बकाया रहने या मूल लेन-देन विफल हो जाने से अपने आप कोई आपराधिक अपराध नहीं बन जाता।
जस्टिस सूरज गोविंदराज ने कहा कि वित्तीय संस्थानों, विशेषकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को किसी ग्राहक के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू करने से पहले सावधानी और विवेक से काम लेना चाहिए। अदालत ने कहा कि इस मामले में याचिकाकर्ता को न तो वह फ्लैट मिला, जिसके लिए उसे कर्ज दिया गया, और न ही उसे बाद में फ्लैट बेचे जाने से कोई लाभ हुआ। इसके बावजूद बैंक उसी रकम की वसूली के लिए उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई कर रहा था, जिसे तीन पक्षों के बीच हुए समझौते के अनुसार संबंधित परिस्थितियों में बिल्डर से वसूल किया जाना था।
हाईकोर्ट बैंक के उस कर्जदार की याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसने अपने खिलाफ धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और जालसाजी समेत कई अपराधों के तहत दर्ज FIR रद्द करने की मांग की।
तीन पक्षों के समझौते में बिल्डर पर थी रकम चुकाने की जिम्मेदारी
अदालत ने पाया कि कर्जदार, भारतीय स्टेट बैंक (SBI) और बिल्डर के बीच हुए त्रिपक्षीय समझौते में स्पष्ट प्रावधान है कि कुछ परिस्थितियों में बैंक को रकम लौटाने की जिम्मेदारी बिल्डर की होगी। इनमें कर्जदार की ओर से चूक के कारण बिल्डर द्वारा बुकिंग रद्द करना, बिल्डर द्वारा परियोजना बंद कर देना या परियोजना पूरी करने में विफल रहना शामिल है।
हाईकोर्ट ने कहा कि इन शर्तों और परिस्थितियों की जानकारी होने के बावजूद SBI ने कर्जदार के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू की जो अनुचित थी और जिसकी निंदा की जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि बैंक स्वयं त्रिपक्षीय समझौते का पक्षकार है और बिल्डर की जिम्मेदारियों से पूरी तरह अवगत है। इसके बावजूद उसने कर्ज खाता बकाया रहने के आधार पर कर्जदार के खिलाफ आपराधिक कानून का सहारा लिया।
पीठ ने कहा कि यदि बैंक को बिल्डर के कृत्यों या त्रिपक्षीय समझौते के दायित्वों का पालन नहीं किए जाने से शिकायत थी, तो वह कानून के अनुसार जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है। लेकिन मूल लेन-देन विफल होने की परिस्थितियों की अनदेखी करते हुए केवल कर्ज बकाया होने के कारण कर्जदार के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करना उचित नहीं है।
अदालत ने मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए कहा कि कर्जदार के पक्ष में कभी बिक्री विलेख निष्पादित नहीं हुआ और बिल्डर ने बाद में वही फ्लैट किसी तीसरे पक्ष को बेच दिया। ऐसे में कर्जदार को उस लेन-देन से कोई लाभ नहीं मिला। अदालत को ऐसा कोई ठोस आधार भी नहीं मिला, जिसके आधार पर उस पर आपराधिक जिम्मेदारी तय की जा सके।
जस्टिस गोविंदराज ने स्पष्ट किया कि केवल कर्ज अकाउंट में किसी व्यक्ति का नाम उधारकर्ता के रूप में दर्ज होने से उसे बिल्डर के उन कार्यों के लिए आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, जो त्रिपक्षीय समझौते की शर्तों के विपरीत किए गए हों।
अदालत ने यह भी कहा कि किसी वित्तीय या संविदात्मक देनदारी को आपराधिक अभियोजन का रूप तभी दिया जा सकता है, जब संबंधित अपराध के आवश्यक कानूनी तत्व प्रथम दृष्टया मौजूद हों। केवल रकम की वसूली के लिए आपराधिक मुकदमे का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
इन टिप्पणियों के साथ कर्नाटक हाईकोर्ट ने कर्जदार के खिलाफ दर्ज FIR और उससे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही रद्द की।