'जॉब्लेस' पति और 'हैंडसम सैलरी' वाली पत्नी: कर्नाटक हाईकोर्ट ने मेंटेनेंस बढ़ाने से किया इनकार
कर्नाटक हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत पत्नी को दी गई भरण-पोषण राशि बढ़ाने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि पत्नी अच्छी आय अर्जित कर रही है, जबकि पति ने स्वयं को बेरोजगार बताया है, ऐसे में भरण-पोषण बढ़ाने का कोई आधार नहीं बनता।
जस्टिस वी श्रीसनंदा की एकल पीठ ने साथ ही पति की उस याचिका को भी खारिज कर दिया, जिसमें उसने 2015 के पारिवारिक न्यायालय के आदेश को रद्द करने की मांग की थी। इस आदेश के तहत पति को पत्नी को ₹9,000 प्रतिमाह (₹5,000 किराया और ₹4,000 भरण-पोषण) तथा ₹40,000 मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था। दोनों पक्षों की पुनरीक्षण याचिकाएं खारिज कर दी गईं।
मामले के अनुसार, दोनों की शादी अप्रैल 2009 में हुई थी। पत्नी ने आरोप लगाया कि उससे अतिरिक्त दहेज की मांग की गई और उसे शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। 2015 में मजिस्ट्रेट अदालत ने घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत उसकी याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए पति को घरेलू हिंसा से रोकने और भरण-पोषण व मुआवजा देने का आदेश दिया था, जिसे 2016 में सत्र न्यायालय ने भी बरकरार रखा।
हाईकोर्ट में पति ने दलील दी कि वह पहले एक स्कूल चलाता था, जो अब बंद हो चुका है, और वह वर्तमान में बेरोजगार है, इसलिए वह भरण-पोषण देने में सक्षम नहीं है। उसने यह भी कहा कि पत्नी की मासिक आय ₹1.5 लाख से अधिक है, इसलिए उसके पक्ष में राहत दी जाए।
वहीं, पत्नी ने तर्क दिया कि पति के पास पैतृक संपत्ति में हिस्सा है और उसके नाम पर भी संपत्तियां हैं, जिन्हें वह अदालत से छिपा रहा है। उसने यह भी कहा कि उसकी आय होना भरण-पोषण पाने के अधिकार को समाप्त नहीं करता।
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करते हुए कहा कि पति के पैतृक संपत्ति में हिस्से का निर्धारण अभी स्पष्ट नहीं है, इसलिए इसे भरण-पोषण बढ़ाने का आधार नहीं बनाया जा सकता। साथ ही, पत्नी के वित्तीय दस्तावेजों से यह स्पष्ट है कि वह पर्याप्त आय अर्जित कर रही है।
हालांकि, अदालत ने यह भी नोट किया कि पति के पास एक एकड़ भूमि है, जिसे उसने 2019 और 2021 में गिरवी रखकर ऋण लिया था। कोर्ट ने कहा कि यदि वह संपत्ति गिरवी रखकर पैसा उधार ले सकता है, लेकिन भरण-पोषण नहीं दे रहा है, तो यह उसके भुगतान न करने की अनिच्छा को दर्शाता है।
इन तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में भरण-पोषण राशि बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं है। परिणामस्वरूप, अदालत ने दोनों पक्षों की याचिकाओं को खारिज कर दिया और किसी को भी राहत देने से इनकार कर दिया।