CrPC की धारा 125 के तहत अंतिम भरण-पोषण आदेश हिंदू विवाह अधिनियम के तहत अंतरिम राहत पर प्रभावी होगा: कर्नाटक हाईकोर्ट

Update: 2026-04-23 06:50 GMT

कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक ही अवधि के लिए पति पर दो अलग-अलग मामलों में भरण-पोषण का बोझ नहीं डाला जा सकता। अदालत ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत दिया गया अंतिम भरण-पोषण आदेश हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) की धारा 24 के तहत दिए गए अंतरिम भरण-पोषण आदेश पर प्राथमिकता रखेगा।

जस्टिस डॉ. के. मनमधा राव की सिंगल बेंच ने कहा कि धारा 125 के तहत पारित आदेश साक्ष्यों के आधार पर अंतिम निर्णय होता है।इसलिए इसे प्रमुखता दी जानी चाहिए।

अदालत ने टिप्पणी की,

“एक ही अवधि के लिए समानांतर भरण-पोषण आदेश जारी रखना कानूनन सही नहीं है। इससे पति पर अनावश्यक दोहरा आर्थिक बोझ पड़ता है।”

मामला उस याचिका से जुड़ा था, जिसमें पति ने परिवार अदालत द्वारा पत्नी को 10,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने के आदेश को चुनौती दी थी। साथ ही उसने अलग से चल रहे वैवाहिक विवाद में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत दिए गए 10,000 रुपये के अंतरिम भरण-पोषण आदेश को भी चुनौती दी थी।

अदालत ने कहा कि CrPC की धारा 125 का उद्देश्य जरूरतमंद व्यक्ति को स्थायी आर्थिक सहायता देना है, जबकि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत दी जाने वाली राशि केवल मुकदमे के दौरान अस्थायी सहायता के रूप में होती है।

हाईकोर्ट ने माना कि दोनों आदेशों को एक साथ लागू रखना डबल मेंटेनेंस की स्थिति पैदा करता है, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है। इसलिए अदालत ने अधिनियम की धारा 24 के तहत दिए गए अंतरिम भरण-पोषण आदेश रद्द की।

हालांकि, अदालत ने पत्नी को दिए गए 20,000 रुपये के मुकदमे खर्च (लिटिगेशन खर्च) को बरकरार रखा और CrPC की धारा 125 के तहत दिए गए 10,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण को ही प्रभावी माना।

अदालत ने पति की पुनर्विचार याचिका खारिज की, जबकि अंतरिम भरण-पोषण के खिलाफ दायर याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार किया।

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