Google और MeitY ने कर्नाटक हाईकोर्ट में श्रीलंकाई सुप्रीम कोर्ट के जज की रिट याचिका की सुनवाई योग्यता पर उठाया सवाल
Google और इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने कर्नाटक हाईकोर्ट में श्रीलंकाई सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अहमद नवाज़ द्वारा दायर रिट याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाया। इस याचिका में उन्होंने अपने खिलाफ प्रकाशित कुछ ऑनलाइन लेखों को हटाने की मांग की थी।
उन्होंने क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र (Territorial Jurisdiction) के आधार पर याचिका पर सवाल उठाया।
Google LLC की ओर से पेश वकील एडवोकेट मनु पी कुलकर्णी ने दलील दी:
“यह याचिका यहां क्यों दायर की गई, योर लॉर्डशिप? यह स्वीकार्य नहीं है। याचिकाकर्ता श्रीलंका के जज हैं। जो सामग्री प्रसारित हुई, वह श्रीलंका से आई। Google अमेरिका में निगमित (Incorporated) है। यदि इस तरह की याचिका की अनुमति दी जाती है तो ऐसी याचिकाओं की बाढ़ आ जाएगी। मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि याचिकाकर्ता इस अदालत के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र का सहारा कैसे ले सकते हैं।”
इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय के वकील एडवोकेट मधुकर एम देशपांडे ने भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ता अभी तक कर्नाटक हाई कोर्ट के समक्ष इस याचिका की स्वीकार्यता के बारे में आश्वस्त करने में सफल नहीं हुए हैं।
याचिकाकर्ताओं के वकील ने जवाब दिया,
“यह अनुच्छेद 14 की जाँच का प्रश्न है, जो नागरिकों और गैर-नागरिकों, दोनों पर समान रूप से लागू होता है...”
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि दुनिया में कहीं भी किसी भी जज को मानहानिकारक सामग्री से डराया-धमकाया नहीं जाना चाहिए। Google एक मध्यस्थ (Intermediary) रहा है, जिसने भारत, श्रीलंका और अन्य क्षेत्रों में याचिकाकर्ता-जज के खिलाफ मानहानिकारक सामग्री सहित जानकारी प्रसारित की है। इसके बजाय जब मानहानिकारक सामग्री को हटाने की बात आती है, तो उन्होंने एक संकीर्ण और तकनीकी दृष्टिकोण अपनाना चुना है।
याचिकाकर्ता के वकील ने ऑस्ट्रेलियाई फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें यह माना गया कि एक द्वितीयक प्रकाशक (Secondary Publisher) के रूप में Google प्रकाशन के लिए स्वयं जिम्मेदार नहीं हो सकता है। हालांकि, एक मध्यस्थ के रूप में यदि शिकायत पहले ही की जा चुकी है और ऐसी सूचना मिलने के बावजूद एक उचित समय बीत चुका है, तो यदि वे उस सामग्री को नहीं हटाते हैं, तो वे उत्तरदायी होंगे।
वकील ने अदालत के संज्ञान में Meta (पूर्व में Facebook) की कुछ पोस्ट लाने का भी प्रयास किया। आरोप है कि ये पोस्ट उस पत्रकार द्वारा की गईं, जिसने 2015 और 2020 में Colombo Telegraph और LankaENews में जज के बारे में विवादित सामग्री लिखी थी। वकील ने दलील दी कि जब मामला विचाराधीन (Sub Judice) है तो इसकी भड़काऊ प्रकृति को देखते हुए इस पर संज्ञान लिया जाना चाहिए।
वकील ने दलील दी,
“...यहां आप देख सकते हैं कि एक पत्रकार ने ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए अदालत की अवमानना की। आज अगर कोई Google के बारे में कोई अपमानजनक टिप्पणी लिखता है तो क्या वे उस माध्यम को जारी रहने देंगे? वे दखल देंगे और उसे हटा देंगे। हालांकि, Google ने इस (श्रीलंकाई जज के बारे में सामग्री) को सार्वजनिक डोमेन में डाल दिया है; माई लॉर्ड को एक आदेश जारी करना होगा, यह अपनी तरह का पहला मामला होगा...”
जज के वकील ने अदालत को यह भी बताया कि जिन पत्रकारों ने कथित तौर पर मानहानिकारक सामग्री लिखी है, उन्होंने अपना ठिकाना श्रीलंका से बदलकर इंग्लैंड जैसे दूसरे देशों में कर लिया है।
वकील ने आगे कहा,
“किसी एक जज का अपमान पूरी न्यायपालिका का अपमान है... न्यायपालिका की गरिमा की रक्षा की जानी चाहिए। जैसे ही ऐसी सामग्री Google के संज्ञान में आती है, उन्हें उसे हटाना ज़रूरी होता है...”
मामले की अगली सुनवाई के लिए इसे स्थगित करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील को निर्देश दिया कि वे Google LLC को समन भेजने के पते को ठीक करें, जिसे गलती से Google INC लिख दिया गया।
जस्टिस सचिन शंकर मगदुम की सिंगल बेंच ने वकील को यह भी निर्देश दिया कि वे दूसरे प्रतिवादी, Google India को हटा दें, जिसका नाम गलती से पक्षकारों की सूची में शामिल कर दिया गया। मामले को अब 06.04.2026 को प्रारंभिक सुनवाई के लिए फिर से सूचीबद्ध किया गया।
Case title: JUSTICE A.H.M.D NAWAZ v/s MINISTRY OF ELECTRONICS AND INFORMATION TECHNOLOGY & Ors.