'शराब पीने को लेकर अचानक हुई बहस के दौरान चाकू का एक वार, पूर्व-नियोजित हत्या नहीं': झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि अचानक हुई बहस के दौरान, आवेश में आकर और बिना किसी पूर्व योजना के चाकू से किया गया वार IPC की धारा 300 के 'अपवाद 4' (Exception 4) के दायरे में आ सकता है। ऐसे मामले में अपराध 'हत्या' की श्रेणी में न आकर 'गैर-इरादतन हत्या' (Culpable Homicide not Amounting to Murder) माना जाएगा।
कोर्ट ने 88 वर्षीय एक पिता की हत्या की सजा को बदलकर IPC की धारा 304 (भाग II) के तहत अपराध में बदल दिया। इस पिता ने शराब पीने को लेकर हुई बहस के बाद अपने बेटे को चाकू घोंप दिया था, जिससे उसकी मौत हो गई।
जस्टिस आनंद सेन और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने पाया कि यह हमला अचानक हुआ, जब मृतक ने अपने पिता से 'हरिया' (स्थानीय स्तर पर बनी शराब) पीने को लेकर सवाल किया। परिस्थितियों और अपीलकर्ता की अधिक उम्र को देखते हुए, कोर्ट ने उसकी सजा को घटाकर उतनी ही कर दिया, जितनी वह पहले ही काट चुका है।
कोर्ट 24 अगस्त 2018 के उस फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसे चाईबासा (पश्चिमी सिंहभूम) के एडिशनल सेशंस जज-III ने सुनाया। इस फैसले में गोमा गोप को IPC की धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और 5,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 21 नवंबर 2013 को अपीलकर्ता घर पर 'हरिया' पी रहा था, तभी उसका 20 वर्षीय बेटा प्रताप गोप घर लौटा और उसने पिता से ज्यादा शराब पीने को लेकर सवाल किया। दोनों के बीच बहस हो गई, जिसके दौरान अपीलकर्ता ने कथित तौर पर सब्जी काटने वाला चाकू उठाया और अपने बेटे के पेट में घोंप दिया। इस चोट के कारण मृतक की आंतें बाहर निकल आईं, बहुत ज्यादा खून बह गया और मौके पर ही उसकी मौत हो गई।
इस घटना की जानकारी अपीलकर्ता की पत्नी जेमा गोप ने दी, जो उस समय घर पर ही मौजूद थीं। इसके बाद IPC की धारा 302 के तहत FIR दर्ज की गई। हाईकोर्ट के सामने अपीलकर्ता ने दलील दी कि उसे झूठे मामले में फंसाया गया और उसकी सजा केवल अटकलों और अनुमानों पर आधारित है। उसने अपनी लंबी जेल की सजा का भी जिक्र किया। राज्य ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि अपीलकर्ता ने चाकू से अपने बेटे की हत्या की थी, और घटना स्थल से खून से सनी मिट्टी और हथियार बरामद किए गए।
अभियोजन पक्ष के सबूतों की जांच करते हुए, उच्च न्यायालय ने पाया कि शिकायतकर्ता (पत्नी) के अलावा, अभियोजन पक्ष का कोई भी गवाह घटना का चश्मदीद नहीं था।
खंडपीठ ने इस बात पर विचार किया कि क्या ये परिस्थितियां IPC की धारा 302 के तहत हत्या को साबित करती हैं, या फिर यह मामला IPC की धारा 300 के 'अपवाद 4' (Exception 4) के अंतर्गत आता है। यह अपवाद उन मामलों से संबंधित है, जहां अचानक हुई लड़ाई या आवेश में आकर, बिना किसी पूर्व योजना के कोई ऐसा कृत्य किया जाता है, जिससे किसी की मौत हो जाए। अदालत ने पाया कि मेडिकल सबूतों से यह स्पष्ट होता है कि मृतक पर चाकू से केवल एक वार किया गया।
अदालत ने टिप्पणी की:
“डॉक्टर (P.W.-4) के मेडिकल साक्ष्य और अन्य सबूतों को देखने से यह स्पष्ट है कि मृतक पर चाकू से केवल एक वार किया गया था। यह हमला पहले से सोच-समझकर नहीं किया गया, बल्कि यह अचानक आवेश में आकर हुआ था।”
खंडपीठ ने आगे इस बात पर भी गौर किया कि जब अपीलकर्ता का बेटा अचानक घर लौटा और उसने अपने पिता से उनकी शराब पीने की आदत के बारे में सवाल किया, तब अपीलकर्ता 'हरिया' (स्थानीय शराब) के नशे में था। अदालत ने पाया कि उनके बीच बहस अचानक शुरू हो गई, और अपीलकर्ता ने आवेश में आकर अपने बेटे को जानलेवा चोट पहुंचाई, लेकिन उसका इरादा पहले से अपने बेटे को मारने का नहीं था।
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि अपीलकर्ता ने पहले से कोई योजना बनाई थी। अदालत ने माना कि झगड़ा अचानक तब शुरू हुआ जब मृतक ने अपने पिता के शराब पीने पर सवाल उठाया, और अपीलकर्ता ने आवेश में आकर प्रतिक्रिया दी, यह समझे बिना कि चाकू का वह वार कितना खतरनाक हो सकता है।
मेडिकल सबूतों, हमले की प्रकृति और उन परिस्थितियों पर विचार करने के बाद, जिनमें यह घटना घटी थी, अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि हालांकि यह कृत्य 'गैर-इरादतन हत्या' (Culpable Homicide) की श्रेणी में आता है, लेकिन इसे 'हत्या' (Murder) नहीं माना जा सकता।
खंडपीठ ने कहा:
“मामले के उपरोक्त तथ्यों और परिस्थितियों, मेडिकल रिपोर्ट, और हमले के तुरंत बाद हुई मौत को देखते हुए हमारी राय है कि भले ही यह मामला 'कल्पेबल होमिसाइड' (गैर-इरादतन हत्या) का है, लेकिन इसे 'मर्डर' (हत्या) नहीं कहा जा सकता। इसलिए, अपीलकर्ता का मामला IPC की धारा 300 के 'अपवाद-4' (Exception-4) के अंतर्गत आता है। अतः, हम दोषसिद्धि को IPC की धारा 302 से बदलकर IPC की धारा 304 (भाग-II) में परिवर्तित करते हैं।”
इस प्रकार, हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि को IPC की धारा 302 के तहत 'मर्डर' से बदलकर IPC की धारा 304 (भाग-II) के तहत 'कल्पेबल होमिसाइड' (ऐसा गैर-इरादतन कृत्य जो हत्या की श्रेणी में नहीं आता) में परिवर्तित कर दिया।
सजा के सवाल पर अदालत ने गौर किया कि जब CrPC की धारा 313 के तहत अपीलकर्ता का बयान दर्ज किया गया, तब वह लगभग 80 वर्ष का था, और अब वह लगभग 88 वर्ष का है।
अदालत ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि वह मुकदमे के दौरान हिरासत में रहा है और अभी भी जेल में है, जबकि उसे लगभग 13 वर्षों तक आपराधिक कार्यवाही का सामना करना पड़ा है। उसकी अधिक उम्र और हिरासत में बिताई गई अवधि को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने सजा को घटाकर उतनी ही कर दिया, जितनी अवधि वह पहले ही हिरासत में बिता चुका था।
Case Title : Goma Gope @ Goma v. State of Jharkhand