वैवाहिक मामले की सुनवाई के दौरान बेटा बालिग हो जाए तो माँ उसके DNA टेस्ट के लिए सहमति नहीं दे सकती: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि अगर वैवाहिक मामले की सुनवाई के दौरान बच्चा बालिग हो जाता है तो माँ के पास बच्चे की ओर से DNA टेस्ट के लिए सहमति देने का अधिकार नहीं रहता। कोर्ट ने कहा कि एक बालिग बच्चा, जो मामले का पक्षकार नहीं है, उसे DNA टेस्ट कराने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता और अगर बच्चा ऐसा टेस्ट कराने से इनकार करता है तो माँ के खिलाफ कोई प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
जस्टिस अनुभा रावत चौधरी की सिंगल जज बेंच एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका गिरिडीह के प्रिंसिपल जज के उस आदेश को चुनौती देने के लिए दायर की गई, जिसमें पति की उस अर्जी को खारिज कर दिया गया, जिसमें उसने एक बच्चे के DNA टेस्ट की मांग की थी। पति का आरोप था कि यह बच्चा उसकी पत्नी के किसी दूसरे पुरुष के साथ अवैध संबंधों से पैदा हुआ।
याचिकाकर्ता-पति ने कहा कि जुलाई 2000 में शादी के बाद वह जनवरी 2001 में नौकरी के लिए सूरत चले गए और अप्रैल 2002 तक वहीं रहे। उन्होंने दावा किया कि 3 मई 2002 को लौटने पर उन्होंने अपनी पत्नी को गर्भावस्था के अंतिम चरण में पाया। बच्चा 1 जून 2002 को पैदा हुआ। याचिकाकर्ता के अनुसार, उस दौरान उन्होंने प्रतिवादी (पत्नी) के साथ कभी शारीरिक संबंध नहीं बनाए, इसलिए बच्चा उनका नहीं हो सकता। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बच्चे के जन्म के बाद भी प्रतिवादी अवैध संबंधों में रही और बाद में दहेज की मांग का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराया।
बताया गया कि वैवाहिक मामले में चार गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद याचिकाकर्ता ने बच्चे के DNA टेस्ट के लिए अर्जी दी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि ट्रायल कोर्ट ने इंडियन एविडेंस एक्ट की धारा 112 का हवाला देते हुए गलत तरीके से अर्जी खारिज की।
याचिका का विरोध करते हुए प्रतिवादी के वकील ने कहा कि तलाक की अर्जी में ऐसा कोई आधारभूत तर्क नहीं दिया गया कि उस दौरान पति का पत्नी से कोई संपर्क नहीं था। यह भी तर्क दिया गया कि बच्चा, जो अब लगभग 24 साल का है, अपनी पूरी ज़िंदगी याचिकाकर्ता के साथ उनके माने हुए पिता के रूप में रहा है। इस स्तर पर DNA टेस्ट का आदेश देने से उसे गंभीर नुकसान होगा। हाईकोर्ट ने गौर किया कि तलाक का केस बच्चे के जन्म के लगभग छह साल बाद सिर्फ़ व्यभिचार (adultery) के आधार पर दायर किया गया। कोर्ट ने यह भी देखा कि याचिका में ऐसा कोई खास दावा नहीं किया गया कि जनवरी 2001 और अप्रैल 2002 के बीच पति का पत्नी से या पत्नी का पति से कोई संपर्क नहीं था।
सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि जब तलाक की कार्यवाही और DNA टेस्ट की अर्ज़ी दायर की गई, तब बच्चा नाबालिग था, लेकिन केस चलने के दौरान वह बालिग हो गया। बेंच ने कहा कि जब बच्चा नाबालिग होता है, तो DNA टेस्ट के लिए सहमति आम तौर पर प्राकृतिक अभिभावक (natural guardian) देता है, बशर्ते कोर्ट बच्चे की निजता और भलाई का ध्यान रखे। हालांकि, बच्चे के बालिग होने पर कानूनी स्थिति बदल जाती है।
कोर्ट ने कहा:
“जब तलाक का केस दायर किया गया, तब बच्चा 6 साल का नाबालिग था और जब DNA टेस्ट की अर्ज़ी दायर की गई, तब बच्चा लगभग 8 साल का था... हालांकि, अब बच्चा लगभग 24 साल का हो गया और जो बच्चा अब बालिग हो चुका है, उसे DNA टेस्ट करवाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अगर बच्चा DNA टेस्ट के लिए मना करता है तो माँ (प्रतिवादी/जवाब देने वाला) के खिलाफ़ कोई प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।”
बेंच ने यह भी कहा कि बच्चे के बालिग होने पर DNA टेस्ट के लिए सहमति से जुड़े मामलों में उसका प्रतिनिधित्व करने का माँ का अधिकार खत्म हो गया। चूंकि बालिग होने के बाद भी बच्चे को पक्षकार नहीं बनाया गया, इसलिए कोर्ट ने कहा कि DNA जाँच का कोई भी आदेश उस पर बाध्यकारी नहीं होगा।
कोर्ट ने कहा:
“बच्चे के अभिभावक के तौर पर बच्चे का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार माँ के पास नहीं रहा, इसलिए इस चरण में माँ के पास न तो बच्चे के DNA टेस्ट के लिए सहमति देने का कोई अधिकार है और न ही इस कोर्ट द्वारा DNA टेस्ट का आदेश पारित किए जाने पर उसे लागू करवाने का कोई साधन है।”
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि इसके अलावा भी याचिकाकर्ता DNA टेस्ट का आदेश देने के लिए तय कानूनी ज़रूरतों को पूरा करने में नाकाम रहा। इंडियन एविडेंस एक्ट की धारा 112 से जुड़े कानून का हवाला देते हुए कोर्ट ने फिर से कहा कि बेवफाई या व्यभिचार के आरोपों को साबित करने के लिए DNA टेस्ट का आदेश तभी दिया जा सकता है, जब पति कोई मज़बूत शुरुआती मामला (prima facie case) बनाए और बच्चे की वैधता के बारे में कानूनी धारणा को गलत साबित करने के लिए यह दिखाए कि उसका पत्नी से कोई शारीरिक संपर्क नहीं था। बेंच ने पाया कि तलाक की अर्ज़ी में ऐसी कोई बुनियादी दलील नहीं दी गई।
यह मानते हुए कि ट्रायल कोर्ट ने DNA टेस्ट की मांग वाली अर्ज़ी को सही ढंग से खारिज किया, हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज की।
Case Title: Lakhan Kumar Mandal v. Foolmati Devi.