झारखंड हाईकोर्ट ने UAPA के एक आरोपी की पत्नी की स्कूटी की कुर्की रद्द करते हुए कहा कि केवल किसी आरोपी से पारिवारिक संबंध होने के आधार पर उसकी संपत्ति को आतंकवाद से हुई कमाई से अर्जित संपत्ति नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि जब महिला की अपनी आय का स्वतंत्र स्रोत हो और संपत्ति उसके नाम पर दर्ज हो, तो उसकी खरीद के स्रोत की जांच तथ्यों के आधार पर की जानी चाहिए।

जस्टिस रोंगोन मुखोपाध्याय और जस्टिस अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने पाया कि महिला सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड में कार्यरत है और उसकी नियमित आय है। स्कूटी भी उसके नाम पर रजिस्टर्ड है। इसलिए केवल यह तथ्य कि वह UAPA के आरोपी बिनोद कुमार गंझू की पत्नी है, स्कूटी को आतंकवाद की कमाई से खरीदी गई संपत्ति मानने के लिए पर्याप्त नहीं है।

मामला टंडवा के अमरपाली-मगध कोयला क्षेत्र में कोयला कारोबारियों और DO धारकों से प्रतिबंधित संगठन तृतीय प्रस्तुति समिति के नाम पर कथित लेवी वसूली से जुड़े राष्ट्रीय जांच एजेंसी के मामले से संबंधित था। पुलिस ने जनवरी 2016 में छापेमारी के बाद मामला दर्ज किया। बिनोद कुमार गंझू के घर से करीब 91.75 लाख रुपये नकद बरामद होने का दावा किया गया। पुलिस के अनुसार गंझू मगध संचालन समिति का अध्यक्ष था और लेवी के रूप में जुटाई गई रकम तृतीय प्रस्तुति समिति के सदस्यों तक पहुंचाई जाती थी।

जांच के दौरान गंझू के परिवार के सदस्यों के नाम पर दर्ज कई चल और अचल संपत्तियां जब्त की गईं। इनमें उसकी पत्नी सुशीला देवी के नाम पर दर्ज टीवीएस स्कूटी, उसके भाई के नाम पर जेसीबी मशीन और उसकी मां के नाम पर खरीदी गई जमीन पर बना दो मंजिला मकान शामिल है।

UAPA के तहत गठित प्राधिकरण ने मार्च 2019 में इन संपत्तियों को कुर्क कर लिया था। बाद में रांची की विशेष राष्ट्रीय जांच एजेंसी अदालत ने भी कुर्की बरकरार रखी।

हाईकोर्ट में सुशीला देवी की ओर से दलील दी गई कि वह सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड की कर्मचारी हैं और करीब 82 हजार रुपये मासिक वेतन प्राप्त करती हैं। उन्होंने कहा कि स्कूटी उनकी अपनी आय से खरीदी गई। यह भी बताया गया कि स्कूटी दिसंबर 2018 में खरीदी गई थी, यानी जनवरी 2016 की छापेमारी के करीब दो साल बाद।

हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार करते हुए कहा कि महिला के पास स्कूटी खरीदने की पर्याप्त आर्थिक क्षमता थी और उसने वाहन के स्वामित्व से संबंधित दस्तावेज भी पेश किए।

अदालत ने कहा,

“सिर्फ इसलिए कि अपीलकर्ता बिनोद गंझू की पत्नी है, यह मानना उचित नहीं होगा कि स्कूटी आतंकवाद की कमाई से खरीदी गई।”

पीठ ने यह भी कहा कि केवल इसलिए महिला के दावे को खारिज नहीं किया जा सकता कि उसने स्कूटी खरीदने के लेन-देन का तरीका स्पष्ट रूप से नहीं बताया। अदालत ने स्कूटी से संबंधित कुर्की का आदेश रद्द कर दिया।

हालांकि JCB मशीन और दो मंजिला मकान के मामले में हाईकोर्ट ने अलग निष्कर्ष निकाला। जेसीबी के संबंध में अदालत ने पाया कि संबंधित व्यक्ति ने वित्त कंपनी को 82 हजार रुपये की एक किस्त जमा करने का दस्तावेज तो पेश किया, लेकिन इतनी महंगी मशीन खरीदने की आर्थिक क्षमता या उसके लिए रकम के स्रोत को साबित करने वाली पर्याप्त सामग्री नहीं दी गई। इसलिए जेसीबी की कुर्की बरकरार रखी गई।

दो मंजिला मकान की कुर्की में भी अदालत ने हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। अदालत को ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि मकान का निर्माण वैध आय के स्रोत से किया गया था। केवल यह कहना कि संपत्ति मां के नाम पर दर्ज संयुक्त पारिवारिक संपत्ति है, उसके वैध स्रोत को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना गया।

इस तरह हाईकोर्ट ने सुशीला देवी की स्कूटी को कुर्की से मुक्त कर दिया, जबकि जेसीबी मशीन और दो मंजिला मकान की कुर्की को बरकरार रखा।

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