लोन की रकम 'सौंपी गई संपत्ति' नहीं; सिर्फ़ लोन न चुका पाना 'क्रिमिनल ब्रीच ऑफ़ ट्रस्ट' नहीं: झारखंड हाईकोर्ट

Update: 2026-08-06 05:20 GMT

झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि लोन के तौर पर दी गई रकम को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 406 के तहत 'क्रिमिनल ब्रीच ऑफ़ ट्रस्ट' (भरोसा तोड़ने का अपराध) के मकसद से उधार लेने वाले को 'सौंपी गई संपत्ति' नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि लोन लेने वाला लोन की रकम का इस्तेमाल करने के लिए आज़ाद होता है, जबकि किसी को सौंपी गई संपत्ति पाने वाले व्यक्ति को मालिक के निर्देशों के अनुसार ही उसका इस्तेमाल करना होता है।

जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की सिंगल जज बेंच ने बकाया लोन की रकम न चुकाने के आरोप में धोखाधड़ी और 'क्रिमिनल ब्रीच ऑफ़ ट्रस्ट' के लिए लोन लेने वाले के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द की।

याचिकाकर्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के तहत हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और आपराधिक कार्यवाही तथा देवघर के सब-डिविजनल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट द्वारा 31 दिसंबर, 2023 को पारित आदेश को रद्द करने की मांग की। मजिस्ट्रेट ने IPC की धारा 34 के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 406 और 420 के तहत उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला पाया।

शिकायत के अनुसार, याचिकाकर्ता ने बैंक ऑफ़ इंडिया की देवघर शाखा में काम करते हुए देवघर ज़िला (शहरी क्षेत्र) राष्ट्रीयकृत बैंक कर्मचारी बचत एवं साख स्वावलंबी सहकारी समिति लिमिटेड से ₹9.30 लाख का लोन लिया था। आरोप था कि हालांकि उन्होंने ₹7.50 लाख चुका दिए थे, लेकिन ₹4.85 लाख की रकम बकाया थी और चुकानी बाकी थी।

याचिकाकर्ता ने कहा कि हर कॉन्ट्रैक्ट का उल्लंघन धोखाधड़ी नहीं होता। यह तर्क दिया गया कि IPC की धारा 420 के तहत अपराध तभी हो सकता है, जब लेन-देन की शुरुआत से ही धोखाधड़ी या बेईमानी का इरादा हो। शुरुआती धोखे के आरोप के बिना, बाद में लोन न चुका पाने या असमर्थता को धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने दोहराया कि सिर्फ़ लोन न चुका पाने की असमर्थता धोखाधड़ी के लिए आपराधिक मुकदमा नहीं चला सकती, जब तक कि लेन-देन की शुरुआत में ही धोखाधड़ी या बेईमानी का इरादा न दिखाया गया हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि सिर्फ़ किसी वादे, समझौते या कॉन्ट्रैक्ट को तोड़ने से ही 'भरोसा तोड़ने का आपराधिक मामला' (Criminal Breach of Trust) नहीं बन जाता, जब तक कि कोई चीज़ किसी को भरोसे के साथ सौंपी न गई हो।

लोन और भरोसे के साथ चीज़ सौंपने (Entrustment) के बीच फ़र्क बताते हुए कोर्ट ने कहा:

“लोन लेने वाले व्यक्ति को लोन की रकम 'भरोसे के साथ सौंपी गई' (Entrusted) नहीं माना जा सकता, जैसा कि इंडियन पीनल कोड की धारा 405 में 'Entrusted' शब्द का इस्तेमाल किया गया; क्योंकि लोन लेने वाला व्यक्ति अपनी मर्ज़ी से उस रकम का इस्तेमाल करने के लिए आज़ाद होता है, जबकि 'Entrustment' के मामले में, जिसे प्रॉपर्टी सौंपी जाती है, वह उस प्रॉपर्टी के मालिक की मंज़ूरी के बिना उस प्रॉपर्टी का इस्तेमाल या लेन-देन नहीं कर सकता।”

बेंच ने देखा कि याचिकाकर्ता पर सिर्फ़ यह आरोप था कि उसने लोन लिया, उसका कुछ हिस्सा चुका दिया था और बाकी रकम नहीं चुकाई। ऐसा कोई आरोप नहीं था कि उसने लेन-देन की शुरुआत से ही धोखा दिया हो या उसे सौंपी गई किसी प्रॉपर्टी का बेईमानी से ग़लत इस्तेमाल किया हो।

कोर्ट ने कहा:

“ऐसे आरोपों के न होने पर इस कोर्ट को यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि अगर याचिकाकर्ता पर लगाए गए सभी आरोपों को पूरी तरह सच भी मान लिया जाए, तब भी I.P.C. की धारा 406 या धारा 420 के तहत सज़ा वाला कोई अपराध नहीं बनता है।”

यह मानते हुए कि मुक़दमा जारी रखना क़ानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा, कोर्ट ने याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ पूरी आपराधिक कार्यवाही और मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द किया।

Case Title: Bimlendu Shekhar Jha v. State of Jharkhand and Anr.

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