NI Act में 90 दिन से अधिक देरी से दायर अपील स्वीकार नहीं: हाइकोर्ट

Update: 2026-03-16 06:49 GMT

झारखंड हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी कानून 2008 के तहत 90 दिन की अधिकतम समयसीमा के बाद दायर की गई आपराधिक अपील सुनवाई योग्य नहीं होती।

अदालत ने स्पष्ट किया कि विशेष कानून में तय अधिकतम समयसीमा के बाद देरी माफ नहीं की जा सकती। इसके लिए लिमिटेशन कानून, 1963 का सहारा भी नहीं लिया जा सकता।

जस्टिस रोंगोन मुखोपाध्याय और जस्टिस दीपक रोशन की खंडपीठ आपराधिक अपील की सुनवाई कर रही थी।

अदालत के रजिस्ट्रार कार्यालय ने प्रारंभिक आपत्ति उठाई कि अपील एनआईए कानून की धारा 21(5) में निर्धारित 90 दिन की अधिकतम अवधि के बाद दायर की गई, इसलिए उसकी स्वीकार्यता पर प्रश्न है।

अपीलकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि धारा 21(5) में लगाया गया प्रतिबंध अनिवार्य नहीं बल्कि मार्गदर्शक है। उनका कहना था कि अदालत के पास देरी को माफ करने का अधिकार है और लिमिटेशन कानून की धारा 5 लागू करके 90 दिन से अधिक की देरी भी स्वीकार की जा सकती है।

यह भी कहा गया कि धारा 21(5) के पहले प्रावधान में कर सकता है जैसे शब्दों का प्रयोग अदालत को विवेकाधिकार देता है।

राज्य की ओर से इसका विरोध करते हुए कहा गया कि इस मुद्दे पर झारखंड हाइकोर्ट की समन्वय पीठ पहले ही फैसला दे चुकी है कि 90 दिन की अधिकतम अवधि के बाद दायर अपील सुनवाई योग्य नहीं होती।

अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि धारा 21(5) के अनुसार अपील दायर करने की सामान्य समयसीमा 30 दिन है। पहले प्रावधान के तहत पर्याप्त कारण होने पर देरी को सीमित रूप से माफ किया जा सकता है, लेकिन दूसरे प्रावधान में स्पष्ट रूप से कहा गया कि 90 दिन के बाद किसी भी अपील पर विचार नहीं किया जाएगा।

खंडपीठ ने कहा,

“जब किसी विशेष कानून में अपील दायर करने की समयसीमा तय की गई हो और उसी कानून में देरी माफ करने की अधिकतम सीमा भी निर्धारित हो तब अदालत उस सीमा से आगे जाकर देरी को माफ नहीं कर सकती।”

इसी आधार पर हाइकोर्ट ने रजिस्ट्रार कार्यालय की आपत्ति को सही ठहराते हुए कहा कि NI Act की धारा 21(5) के तहत 90 दिन की अधिकतम अवधि के बाद दायर अपील स्वीकार नहीं की जा सकती और इस सीमा को बढ़ाने के लिए लिमिटेशन कानून लागू नहीं होगा।

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