नौकरी के कारण अलग रहना HMA की धारा 9 के तहत 'उचित कारण': झारखंड हाईकोर्ट ने पति की अपील खारिज की
झारखंड हाईकोर्ट ने कहा है कि पत्नी से यह अपेक्षा कि वह अपने जीवन और करियर को पति की इच्छा के अधीन कर दे—अब एक पुरानी और रूढ़िवादी सोच है, जिसमें क्रांतिकारी बदलाव आ चुका है। अदालत ने स्पष्ट किया कि विवाहित महिला को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रहने, अपने पेशेवर लक्ष्यों को साधने और समाज में एक पेशेवर के रूप में योगदान देने का अधिकार है।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने परिवार न्यायालय अधिनियम की धारा 19 के तहत दायर उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के अंतर्गत दांपत्य अधिकारों की बहाली (Restitution of Conjugal Rights) की मांग खारिज किए जाने को चुनौती दी थी।
मामले की पृष्ठभूमि
पति–पत्नी का विवाह 12 मार्च 2018 को हुआ था। विवाह के समय पत्नी एक निजी स्कूल में शिक्षिका थीं, जबकि पति एक अस्पताल में दैनिक वेतन पर मेडिकल स्टाफ के रूप में कार्यरत थे। दोनों विवाह के बाद केवल 2–3 दिन साथ रहे और फिर अलग-अलग शहरों में कार्यस्थल होने के कारण अलग रहने लगे।
बाद में मतभेद उभरे। पति का आरोप था कि पत्नी बिना बताए मायके चली गई, अपने गहने व सामान ले गई, उससे “घर जमाई” बनने की मांग की और तलाक के कागजात तैयार करने को कहा। इन आरोपों के आधार पर पति ने धारा 9 के तहत याचिका दायर की।
वहीं पत्नी ने कहा कि वह वैवाहिक जीवन जारी रखने को तैयार है, लेकिन नौकरी छोड़ने को तैयार नहीं। उसने आरोप लगाया कि पति और उसके परिवार ने ₹10 लाख की मांग की थी ताकि स्कॉर्पियो वाहन खरीदकर साइड बिज़नेस किया जा सके; मांग न मानने पर विवाद बढ़ा। रिकॉर्ड में यह भी आया कि पति की आय लगभग ₹10,000/माह (ठेका/दैनिक आधार) थी, जबकि पत्नी सरकारी शिक्षिका के रूप में लगभग ₹60,000/माह कमा रही थीं।
कानून की कसौटी और अदालत की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने धारा 9 के दायरे को दोहराते हुए कहा कि दांपत्य अधिकारों की बहाली का आदेश तभी दिया जा सकता है जब—
(i) प्रतिवादी ने याचिकाकर्ता के साथ रहना छोड़ा हो;
(ii) यह वापसी बिना उचित कारण हो;
(iii) राहत से इंकार करने का कोई अन्य कानूनी आधार न हो; और
(iv) अदालत याचिका के कथनों की सत्यता से संतुष्ट हो।
तथ्यों पर इन कसौटियों को लागू करते हुए अदालत ने पाया कि सहवास न होने का मुख्य कारण दोनों का अलग-अलग शहरों में कार्यरत होना था।
अदालत ने कहा कि पत्नी का आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रहने और पेशेवर लक्ष्य साधने का अधिकार है। पीठ ने रूढ़िवादी धारणा पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा—
“यह सच है कि पारंपरिक रूप से हिंदू पत्नी को धर्मपत्नी, अर्धांगिनी, भार्या या अनुगामिनी माना गया—अर्थात् पति का अनुसरण करना। लेकिन शिक्षा, महिलाओं की बढ़ती साक्षरता, संविधान में समान अधिकारों की मान्यता और लैंगिक भेद के उन्मूलन के साथ यह सोच क्रांतिकारी रूप से बदल चुकी है। विवाह में पत्नी बराबर की साझेदार है, समान दर्जा और समान अधिकारों के साथ।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि विवाह में कोई भी साथी दूसरे पर श्रेष्ठ अधिकार का दावा नहीं कर सकता। जहाँ दोनों पति–पत्नी नौकरी/पेशा करते हों, वहाँ वैवाहिक जीवन का स्वरूप उनकी-उनकी पेशेवर आवश्यकताओं से तय होगा।
'क्या पति को पूर्ण अधिकार है?'—अदालत का उत्तर
पीठ ने सवाल उठाया कि—
“क्या पति को यह पूर्ण अधिकार है कि वह पत्नी से नौकरी छोड़कर केवल उस पर निर्भर रहने और वैवाहिक दायित्व निभाने की अपेक्षा करे?”
इसका उत्तर नकारात्मक देते हुए अदालत ने कहा कि आधुनिक शिक्षित दंपतियों में ऐसे विवाद स्वाभाविक रूप से बढ़े हैं, क्योंकि दोनों अपने करियर के साथ विवाह निभाना चाहते हैं।
अदालत ने कहा कि दांपत्य अधिकारों की बहाली के मामलों में 'युक्तिसंगतता (reasonableness)' की कसौटी लागू होती है—यानी किस पक्ष ने संयुक्त जीवन को लेकर अयुक्तिसंगत रवैया अपनाया।
निष्कर्ष
पीठ ने पाया कि दोनों ही अलग-अलग शहरों में कार्यरत थे और किसी के लिए भी नौकरी छोड़ना व्यावहारिक नहीं था। ऐसे में पत्नी का नौकरी जारी रखने पर जोर देना और साथ ही वैवाहिक जीवन को समायोजित करने का प्रयास करना अयुक्तिसंगत नहीं कहा जा सकता।
वाहन व धन की मांग से जुड़े साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने माना कि पत्नी ने स्वेच्छा से नहीं, बल्कि परिस्थितियों के दबाव में अलग रहने का निर्णय लिया। अदालत ने रेखांकित किया कि दांपत्य अधिकारों की बहाली का अर्थ यह नहीं कि केवल पत्नी ही चुपचाप पति का अनुसरण करे; बल्कि यह दोनों की संयुक्त जिम्मेदारी है कि वे संबंध निभाने का व्यावहारिक रास्ता निकालें।
इन कारणों से हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय के निष्कर्षों से सहमति जताते हुए दांपत्य अधिकारों की बहाली से इनकार कर दिया।