लापता लोगों की तलाश में आधार जानकारी तक पहुंच में दिक्कत: झारखंड हाइकोर्ट ने गृह मंत्रालय से मांगे सुझाव
झारखंड हाइकोर्ट ने लापता व्यक्तियों की तलाश के मामलों में जांच एजेंसियों को आधार संबंधी जानकारी प्राप्त करने में आ रही व्यावहारिक कठिनाइयों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
अदालत ने इस संबंध में केंद्रीय गृह मंत्रालय से उपयुक्त व्यवस्था विकसित करने के लिए सुझाव मांगे हैं।
यह टिप्पणी जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई के दौरान की। याचिका एक मां की ओर से दायर की गई, जिसकी बेटी पिछले पांच वर्षों से लापता है।
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि युवती की तलाश के लिए विशेष जांच दल का गठन किया गया। जांच के क्रम में भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण के अतिरिक्त महानिदेशक को पत्र लिखकर आधार से जुड़ी जानकारी मांगी गई ताकि बैंक खातों या अन्य संबद्ध सूचनाओं के माध्यम से सुराग मिल सके।
हालांकि अदालत ने आधार अधिनियम 2016 की धारा 33 का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की आधार संबंधी जानकारी केवल हाइकोर्ट के निर्देश पर ही उपलब्ध कराई जा सकती है।
खंडपीठ ने कहा कि तस्करी जैसे मामलों में आधार कार्ड एक महत्वपूर्ण सुराग हो सकता है लेकिन कानून के तहत अभियोजन एजेंसी द्वारा आवेदन किए बिना और हाइकोर्ट की अनुमति के बगैर ऐसी जानकारी साझा नहीं की जा सकती।
अदालत ने आदेश में कहा,
“बहस के दौरान यह मुद्दा उठा कि मानव तस्करी के मामलों में सुराग पाने का एक महत्वपूर्ण स्रोत आधार कार्ड है लेकिन आधार अधिनियम 2016 के प्रावधानों के अनुसार किसी व्यक्ति, यहां पीड़िता की आधार जानकारी केवल हाइकोर्ट के निर्देश पर ही उपलब्ध कराई जा सकती है यदि अभियोजन एजेंसी इस आशय का आवेदन करे।”
खंडपीठ ने झारखंड में मानव तस्करी की गंभीर स्थिति पर भी चिंता जताई।
अदालत ने कहा कि राज्य में तस्करी के अधिकांश शिकार दूरस्थ आदिवासी और वंचित क्षेत्रों से आते हैं, जहां सामाजिक और आर्थिक अभाव के कारण लोग अत्यंत कमजोर स्थिति में रहते हैं। अशिक्षा और संसाधनों की कमी के कारण वे स्थानीय थाना तक भी नहीं पहुंच पाते जिसका लाभ संगठित गिरोह उठाते हैं।
अदालत ने टिप्पणी की,
“जब पीड़ित मुख्य रूप से राज्य के वंचित समुदायों से आते हैं और अशिक्षा सहित अनेक कारणों से स्थानीय थाना तक पहुंच नहीं बना पाते तब ऐसी परिस्थिति में आधार कार्ड जो पीड़ित तक पहुंचने का एक प्रमुख स्रोत हो सकता है, उसकी आपूर्ति की स्थिति को कैसे संभाला जाए यह एक गंभीर प्रश्न है।”
कानूनी सीमाओं को ध्यान में रखते हुए खंडपीठ ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को निर्देश दिया कि वह कानून के दायरे में रहते हुए लापता व्यक्तियों और तस्करी के मामलों में उत्पन्न व्यावहारिक कठिनाइयों के समाधान के लिए सुझाव प्रस्तुत करे।
मामले की अगली सुनवाई 25 फरवरी, 2026 को निर्धारित की गई।