2014 के चुनावी भाषण मामले में हेमंत सोरेन को राहत: हाईकोर्ट ने रद्द की आपराधिक कार्यवाही

Update: 2026-07-06 07:11 GMT

झारखंड हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए भाषण से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने माना कि छोटानागपुर टेनेंसी (CNT) एक्ट, संथाल परगना टेनेंसी (SPT) एक्ट और श्रम कानूनों में प्रस्तावित बदलावों के बारे में उनकी टिप्पणियां 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951' की धारा 125 के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आती हैं।

जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की सिंगल जज बेंच उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आपराधिक कार्यवाही, 16 अगस्त 2017 के संज्ञान लेने वाले आदेश और 8 जुलाई 2019 के आरोप तय करने वाला आदेश रद्द करने की मांग की गई थी। कोर्ट ने यह भी माना कि 'भारतीय दंड संहिता' (IPC) की धारा 188 के तहत अपराध का संज्ञान लेना तब तक वर्जित था, जब तक कि 'दंड प्रक्रिया संहिता' (CrPC) की धारा 195 के तहत जरूरी सक्षम सरकारी अधिकारी की ओर से लिखित शिकायत न की गई हो।

यह मामला विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान 24 नवंबर 2014 को आदित्यपुर में सोरेन द्वारा संबोधित एक जनसभा से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, सोरेन ने SPT Act, CNT Act, भूमि अधिग्रहण अधिनियम और श्रम कानूनों में बदलाव की कथित साजिश को लेकर विपक्षी दलों पर तंज कसा था और कहा था कि अगर ऐसे बदलाव किए गए तो राज्य में "खून की नदी बहने से कोई नहीं रोक सकता"। आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए फ्लाइंग स्क्वाड के ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर-सह-मजिस्ट्रेट ने FIR दर्ज कराई थी, जिसके बाद IPC की धारा 188 और 506 तथा जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125 के तहत मामला दर्ज किया गया।

हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि CrPC की धारा 195 के तहत अनिवार्य रोक को देखते हुए IPC की धारा 188 के तहत अपराध का संज्ञान लेना गैर-कानूनी था, क्योंकि सक्षम सरकारी अधिकारी की ओर से कोई लिखित शिकायत दर्ज नहीं कराई गई। आगे यह तर्क दिया गया कि अगर आरोपों को पूरी तरह से मान भी लिया जाए तो भी उनसे IPC की धारा 506 के तहत आपराधिक धमकी या 'जनप्रतिनिधित्व अधिनियम' की धारा 125 के तहत अपराध के तत्व साबित नहीं होते। धारा 125 के लिए धर्म, नस्ल, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर नागरिकों के अलग-अलग वर्गों के बीच दुश्मनी या नफरत को बढ़ावा देना ज़रूरी है।

रिकॉर्ड की जांच करने पर हाईकोर्ट ने पाया कि न तो FIR में और न ही किसी अन्य सामग्री में ऐसे किसी आदेश के जारी होने का ज़िक्र था जिसका याचिकाकर्ता ने कथित तौर पर उल्लंघन किया हो। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि CrPC की धारा 195 के तहत किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई।

'सी. मुनियाप्पन बनाम तमिलनाडु राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए बेंच ने कहा कि CrPC की धारा 195 का पालन करना अनिवार्य है और इसका पालन न करने से अभियोजन की कार्यवाही अमान्य हो जाती है। कोर्ट ने माना कि मजिस्ट्रेट ने IPC की धारा 188 के तहत संज्ञान लेकर गंभीर कानूनी गलती की है, खासकर तब जब अपराध के ज़रूरी तत्वों को पूरा करने वाला कोई आरोप ही नहीं था।

हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि आरोप 'जनप्रतिनिधित्व अधिनियम' की धारा 125 के दायरे में नहीं आते। बेंच ने देखा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ एकमात्र आरोप यह था कि उसने CNT Act, SPT Act और श्रम कानूनों में संशोधन की कथित साजिश पर नाराज़गी जताई। कोर्ट ने माना कि अगर उन आरोपों को पूरी तरह से मान भी लिया जाए तो भी वे अधिनियम की धारा 125 में बताए गए आधारों पर नागरिकों के अलग-अलग वर्गों के बीच नफरत या दुश्मनी को बढ़ावा देने के बराबर नहीं थे।

यह मानते हुए कि जिन अपराधों का संज्ञान लिया गया, उनमें से कोई भी अपराध साबित नहीं होता, कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसलिए हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता से संबंधित आपराधिक कार्यवाही, संज्ञान लेने के आदेश और आरोप तय करने का आदेश रद्द किया।

Case Title: Hemant Soren v. State of Jharkhand

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