अंतरिम कस्टडी की मुख्य मांग पर फैसला दिए बिना केवल मुलाकात का अधिकार नहीं दिया जा सकता : झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी अभिभावक ने अदालत में अंतरिम अभिरक्षा (कस्टडी) की मुख्य मांग की और उसके विकल्प के रूप में मुलाकात के अधिकार की मांग की है तो फैमिली कोर्ट मुख्य मांग पर कारण सहित फैसला दिए बिना सीधे वैकल्पिक राहत नहीं दे सकता।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने रांची की एडिशनल प्रिंसिपल फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए नाबालिग बच्ची की अंतरिम अभिरक्षा उसकी मां को सौंपने का निर्देश दिया।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था केवल अस्थायी होगी और अंतिम निर्णय लंबित संरक्षकता वाद के निस्तारण के अधीन रहेगा।
मामला 20 नवंबर 2025 के उस आदेश से जुड़ा था, जिसमें फैमिली कोर्ट ने संरक्षक एवं वार्ड अधिनियम, 1890 की धारा 12 के तहत मां की याचिका का निस्तारण करते हुए उसे केवल प्रत्येक दो महीने में एक बार दो से तीन घंटे बच्ची से मिलने की अनुमति दी थी।
इसके अलावा, सप्ताहांत में अधिमानतः आधे घंटे तक ऑनलाइन बातचीत की भी अनुमति दी गई। मुलाकात का स्थान पति द्वारा तय किया जाना था।
मामले के अनुसार, पक्षकारों का विवाह जनवरी 2017 में हुआ था और जुलाई 2021 में उनकी बेटी का जन्म हुआ। मां का कहना था कि जन्म से ही बच्ची उसकी देखभाल में थी। अगस्त 2024 में शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना के कारण वह अपने मायके, बिहार के सारण जिले में रहने लगी।
उसका आरोप है कि बाद में पति बच्ची को दो दिन के लिए ले जाने की बात कहकर अपने साथ ले गया, लेकिन फिर उसे वापस नहीं लौटाया।
मां ने पहले छपरा की फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी, लेकिन क्षेत्राधिकार के अभाव में वह खारिज हो गई। इसके बाद उसने रांची की फैमिली कोर्ट में संरक्षकता वाद दायर करते हुए धारा 12 के तहत अंतरिम कस्टडी की मांग की।
हाईकोर्ट ने कहा कि यद्यपि कानून में पिता को प्राकृतिक संरक्षक माना गया, लेकिन बच्चों की अभिरक्षा से जुड़े मामलों में सबसे महत्वपूर्ण कसौटी बच्चे का कल्याण है, न कि माता-पिता के कानूनी अधिकार।
कोर्ट ने कहा,
"बच्चों की अभिरक्षा से जुड़े मामलों में निर्णय का आधार बच्चों का कल्याण होता है, न कि पक्षकारों के अधिकार।"
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों का फैसला केवल कानूनी अधिकारों के आधार पर नहीं किया जा सकता। बच्चे की खुशी, स्वास्थ्य, शिक्षा, बौद्धिक विकास, नैतिक मूल्यों और समग्र हित को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने लगभग 45 मिनट तक दोनों पक्षों से बातचीत की और बच्ची के व्यवहार का भी अवलोकन किया।
कोर्ट ने पाया कि मां को देखते ही बच्ची पिता की गोद से उतरकर मां की गोद में चली गई। साथ ही वह दोनों अभिभावकों के बीच सहज रूप से आती-जाती रही और दोनों के प्रति समान स्नेह और अपनापन प्रदर्शित करती रही।
मां ने अदालत से छुट्टियों के दौरान बच्ची की अंतरिम कस्टडी देने का अनुरोध करते हुए कहा कि वह लगभग दो वर्षों से अपनी बेटी के साथ सामान्य रूप से समय नहीं बिता सकी है। हाईकोर्ट ने इस मांग को वास्तविक और सद्भावनापूर्ण माना।
कोर्ट ने कहा कि संरक्षक एवं वार्ड अधिनियम की धारा 12 फैमिली कोर्ट को अंतरिम अभिरक्षा देने का स्पष्ट अधिकार प्रदान करती है। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने अंतरिम अभिरक्षा की मुख्य मांग पर कोई निर्णय नहीं दिया और सीधे मुलाकात के वैकल्पिक अनुरोध पर आदेश पारित कर दिया।
हाईकोर्ट ने कहा,
"यदि किसी आवेदन में मुख्य और वैकल्पिक दोनों प्रकार की प्रार्थनाएं हों, तो अदालत का दायित्व है कि वह पहले मुख्य प्रार्थना पर ठोस कारणों सहित निर्णय दे। उसे अस्वीकार करने के बाद ही वैकल्पिक प्रार्थना पर विचार किया जा सकता है।"
कोर्ट ने आगे कहा,
"मुख्य प्रार्थना पर कोई कारण दर्ज किए बिना सीधे वैकल्पिक प्रार्थना पर चले जाना न्यायसंगत नहीं है।"
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई मुलाकात की शर्तें अत्यधिक कठोर और अव्यावहारिक थीं। मां को लगभग 400 से 500 किलोमीटर की यात्रा कर केवल दो महीने में एक बार दो से तीन घंटे के लिए बच्ची से मिलने की अनुमति दी गई, वह भी पति द्वारा तय किए गए स्थान पर और पूर्व सूचना देने की शर्त के साथ।
कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने मां की सुविधा, बच्ची के साथ उसके भावनात्मक संबंध और मुलाकात की व्यावहारिक कठिनाइयों पर विचार नहीं किया। इसलिए ऐसी शर्तें अनुचित थीं।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को मनमाना और बिना उचित विचार के पारित किया गया बताते हुए रद्द कर दिया। साथ ही मां की अंतरिम अभिरक्षा संबंधी याचिका स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि बच्ची की अस्थायी कस्टडी उसे सौंपी जाए।
अदालत ने फैमिली कोर्ट को लंबित संरक्षकता वाद का शीघ्र निस्तारण करने और अनावश्यक स्थगन न देने का भी निर्देश दिया।