रजिस्टर्ड सेल डीड से भी आदिवासी जमीन का अवैध हस्तांतरण वैध नहीं हो सकता: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 की धारा 46(1) का उल्लंघन कर किया गया आदिवासी जमीन का हस्तांतरण केवल इस आधार पर वैध नहीं हो सकता कि उसके लिए रजिस्टर्ड सेल डीड तैयार की गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून द्वारा प्रतिबंधित लेनदेन को रजिस्टर्ड सेल डीड वैधता प्रदान नहीं कर सकती।
जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी ने यह टिप्पणी हजारीबाग के तत्कालीन उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल के आयुक्त की ओर से 10 मई 2013 को पारित आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए की। आयुक्त ने अतिरिक्त कलेक्टर के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम की धारा 46(4) के तहत जमीन बहाली का आदेश दिया गया था।
विवाद हजारीबाग, वर्तमान रामगढ़ जिले के घुटवा गांव स्थित खाता संख्या 42 और प्लॉट संख्या 1273 की 0.92 एकड़ जमीन से जुड़ा था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि अंतिम सर्वेक्षण के दौरान यह जमीन भीखवा बेदिया और बेपता बेदिया के नाम दर्ज थी। बेपता बेदिया की संतान नहीं थी, जिसके बाद उनके अनुसार पूरी जमीन पर भीखवा बेदिया का कब्जा हो गया और बाद में जमीन उनके पुत्र सुकरा बेदिया के पास चली गई।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार सुकरा बेदिया ने 2 जुलाई 1970 को रजिस्टर्ड सेल डीड संख्या 6111 के जरिए यह जमीन मूल याचिकाकर्ता सादिक मियां को बेच दी थी। उनका दावा था कि इसके बाद से वह जमीन पर शांतिपूर्वक कब्जे में रहे और खेती करते रहे।
मूल याचिकाकर्ता की मृत्यु के बाद उनके कानूनी उत्तराधिकारियों को मामले में शामिल किया गया। याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि उन्होंने राजस्व अभिलेखों में अपना नाम दर्ज कराने के लिए नामांतरण का आवेदन दिया लेकिन अंचल अधिकारी की ओर से आम इश्तेहार जारी किए जाने के बावजूद नामांतरण नहीं किया गया।
दूसरी ओर प्रतिवादी संख्या 7 ने दावा किया कि उसने 13 मई 2003 को सुकरा बेदिया से इसी प्लॉट की 0.67 एकड़ जमीन खरीदी थी। उसका आरोप था कि बाद में मूल याचिकाकर्ता ने उसे जमीन से बेदखल कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि प्रतिवादी कभी जमीन पर कब्जे में रही ही नहीं।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि प्रतिवादी संख्या 7 अनुसूचित जनजाति की सदस्य नहीं है, इसलिए वह छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम की धारा 46(4) के तहत जमीन बहाली की मांग नहीं कर सकती। इसके अलावा उन्होंने बहाली के आवेदन को समय-सीमा से बाहर बताया।
हाईकोर्ट ने हालांकि इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने पाया कि विवादित जमीन आदिवासी जमीन थी और बेदिया समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल किया गया। इसके लिए अदालत ने 6 सितंबर 1950 की राजपत्र अधिसूचना का हवाला दिया।
अदालत ने यह भी पाया कि प्रतिवादी संख्या 7 ने वर्ष 2003 में जमीन खरीदने से पहले 13 जनवरी 2003 को उपायुक्त से अनुमति प्राप्त की थी और बाद में जमीन का नामांतरण भी उसके नाम पर हुआ। हाईकोर्ट के अनुसार, इससे स्पष्ट होता है कि राजस्व अभिलेखों में जमीन का आदिवासी चरित्र कायम था और इसी आधार पर धारा 46(1) के तहत अनुमति ली गई।
धारा 46(3) का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि धारा 46(1) का उल्लंघन करने वाले किसी भी दस्तावेज को दीवानी, आपराधिक या राजस्व अदालत वैध लेनदेन के रूप में मान्यता नहीं दे सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि रजिस्टर्ड सेल डीड के जरिए किया गया लेनदेन भी यदि कानून के प्रतिबंध का उल्लंघन करता है तो वैध नहीं माना जा सकता।
समय-सीमा के सवाल पर हाईकोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी संख्या 7 ने वर्ष 2003 में जमीन खरीदी थी, उसके नाम पर नामांतरण भी हुआ और करीब छह महीने के भीतर उसे जमीन से बेदखल कर दिया गया। इसलिए धारा 46(4-ए)(ए) में निर्धारित समय-सीमा उसके जमीन बहाली के दावे के रास्ते में बाधा नहीं बनती।
अदालत ने पटना हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ के बीना रानी घोष बनाम आयुक्त मामले का भी उल्लेख किया और कहा कि उसमें धारा 46 तथा धोखाधड़ी से जुड़े लेनदेन के संबंध में की गई टिप्पणियां वर्तमान मामले पर भी लागू होती हैं।
हाईकोर्ट ने पुनर्विचार प्राधिकारी के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं पाई और याचिका खारिज की।