केवल अपराधियों के संपर्क में आने की आशंका पर नाबालिग को जमानत से वंचित नहीं कर सकते: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि कानून से संघर्षरत नाबालिग को किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (JJ Act) की धारा 12 के तहत जमानत देना सामान्य नियम है। केवल इस आशंका के आधार पर जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता कि रिहा होने पर नाबालिग का संपर्क अपराधियों से हो सकता है। इसके लिए ठोस सामग्री और उचित आधार होना जरूरी है।
जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की सिंगल बेंच नाबालिग सोनू साव की ओर से दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में हजारीबाग के किशोर न्याय बोर्ड (JJB) और एडिशनल सेशन जज-सह-स्पेशल जज, बाल न्यायालय के उन आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिनमें उसे जमानत देने से इनकार किया गया।
मामले के अनुसार कथित घटना के समय सोनू साव की उम्र करीब 17 वर्ष थी। वह 12 जनवरी 2026 से हिरासत में था। उसके खिलाफ लोहरसिंघना थाना कांड संख्या 01/2026 में भारतीय न्याय संहिता (BNS) के विभिन्न प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया था।
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि नाबालिग पर आरोप केवल इतना था कि उसने एक बोलेरो गाड़ी का शीशा तोड़ा था। उसकी सामाजिक जांच रिपोर्ट में भी कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं थी। वह 11वीं कक्षा का छात्र था और उसके पिता उसके आचरण की जिम्मेदारी लेने तथा यह सुनिश्चित करने के लिए तैयार थे कि वह जाने-माने अपराधियों के संपर्क में न आए।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से जमानत का विरोध करते हुए कहा गया कि नाबालिग अन्य आरोपियों के साथ शामिल था। इस घटना में एक व्यक्ति की मौत हुई थी और दो अन्य घायल हुए।
हाईकोर्ट ने पाया कि JJB और अपीलीय अदालत ने इस आशंका के आधार पर जमानत खारिज की थी कि रिहा होने पर नाबालिग अपराधियों के संपर्क में आ सकता है और उसे नैतिक, शारीरिक या मानसिक खतरा हो सकता है।
जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी ने JJ Act की धारा 12 का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रावधान दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) या किसी अन्य कानून में मौजूद जमानत संबंधी प्रावधानों पर प्रभावी होता है। इसके तहत नाबालिग को जमानत देना सामान्य नियम है, जबकि जमानत से इनकार करना अपवाद है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि नाबालिग को जमानत से तभी वंचित किया जा सकता है, जब उचित आधार मौजूद हों कि उसकी रिहाई से उसका संपर्क किसी ज्ञात अपराधी से हो सकता है, उसे नैतिक, शारीरिक या मानसिक खतरा हो सकता है अथवा न्याय के उद्देश्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
पीठ ने कहा कि निचली अदालतों ने अपराधियों के संपर्क में आने की आशंका जताई, लेकिन सामाजिक जांच रिपोर्ट में नाबालिग के खिलाफ कोई प्रतिकूल सामग्री नहीं थी। ऐसे में केवल आशंका के आधार पर जमानत खारिज करना उचित नहीं था।
अदालत ने टिप्पणी की,
“उचित आधारों को साबित करने वाली किसी सामग्री या साक्ष्य के अभाव में यह नहीं कहा जा सकता कि नाबालिग की रिहाई से न्याय के उद्देश्य विफल हो जाएंगे। निचली अदालतें जमानत से इनकार करने के लिए निर्धारित तीनों परिस्थितियों के संबंध में कारण बताने में विफल रही हैं।”
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने एडिशनल सेशन जज-सह-स्पेशल जज, बाल न्यायालय, हजारीबाग के 26 मार्च 2026 और किशोर न्याय बोर्ड के 24 फरवरी 2026 के आदेशों को रद्द किया।
हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि 12 जनवरी 2026 से हिरासत में रह रहे सोनू साव को उसके प्राकृतिक अभिभावक यानी पिता के आश्वासन और जमानत पर रिहा किया जाए। रिहाई किशोर न्याय बोर्ड की ओर से निर्धारित शर्तों के अधीन होगी।