निजी पक्षों के भूमि विवाद का फैसला नहीं कर सकते राज्य दिव्यांग आयुक्त, यह अधिकार केवल सिविल कोर्ट का: झारखंड हाईकोर्ट

Update: 2026-07-01 11:27 GMT

झारखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य दिव्यांग आयुक्त को निजी पक्षों के बीच अचल संपत्ति के स्वामित्व या भूमि विवाद का फैसला करने का अधिकार नहीं है।

अदालत ने कहा कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत आयुक्त को जांच के सीमित उद्देश्य से सिविल अदालत जैसी कुछ शक्तियां दी गई हैं, लेकिन इससे उन्हें भूमि स्वामित्व से जुड़े विवादों का निपटारा करने का अधिकार नहीं मिल जाता।

जस्टिस श्री आनंद सेन की एकल पीठ दो संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। पहली याचिका में राज्य दिव्यांग आयुक्त के 28 जून 2019 के आदेश को चुनौती दी गई, जबकि दूसरी याचिका एक दिव्यांग व्यक्ति ने आयुक्त के आदेश को लागू कराने और कथित रूप से उसकी संपत्ति में हस्तक्षेप करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए दायर की।

पहली याचिका के याचिकाकर्ताओं का कहना था कि विवादित भूमि उनके पूर्वजों की और वे कई दशकों से उस पर शांतिपूर्ण कब्जे में हैं। उनका आरोप था कि राज्य दिव्यांग आयुक्त ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर भूमि के स्वामित्व का फैसला कर दिया और राजस्व अधिकारियों को उसके अनुरूप कार्रवाई करने का निर्देश दे दिया।

वहीं, दूसरी याचिका दायर करने वाले दिव्यांग व्यक्ति का कहना था कि उसकी दिव्यांगता का लाभ उठाकर कुछ लोग उसकी जमीन पर कब्जा करना चाहते थे। इसी कारण उसने सुरक्षा की मांग करते हुए राज्य दिव्यांग आयुक्त का दरवाजा खटखटाया था।

रिकॉर्ड का अवलोकन करने पर हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य दिव्यांग आयुक्त ने भूमि के स्वामित्व का प्रश्न तय करते हुए राजस्व अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया था।

इसके आधार पर अपर समाहर्ता ने अनुमंडल पदाधिकारी को जांच कर अनुपालन रिपोर्ट देने के निर्देश भी दिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम की धारा 82 के तहत राज्य दिव्यांग आयुक्त को केवल अधिनियम के तहत जांच और पूछताछ के सीमित उद्देश्य से सिविल अदालत का दर्जा प्राप्त है। इन प्रक्रियात्मक शक्तियों का अर्थ यह नहीं है कि आयुक्त भूमि स्वामित्व से जुड़े विवादों का फैसला कर सकते हैं।

अदालत ने कहा,

"रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि केवल इसलिए कि नरेंद्र प्रसाद सिंह दिव्यांग हैं, उन्होंने राज्य दिव्यांग आयुक्त का दरवाजा खटखटाया। इस विवाद का उनकी दिव्यांगता से कोई संबंध नहीं है। यह दो व्यक्तियों के बीच भूमि विवाद है। ऐसा मामला नहीं है कि उन्हें न्याय पाने से वंचित किया गया हो। वे आसानी से सिविल कोर्ट जा सकते थे, लेकिन उन्होंने गलत मंच का चयन किया।"

हाईकोर्ट ने आगे कहा,

"राज्य दिव्यांग आयुक्त को पक्षकारों के बीच भूमि विवाद का फैसला करने का अधिकार प्राप्त नहीं है। यह विषय पूरी तरह सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है।"

अदालत ने माना कि राज्य दिव्यांग आयुक्त ने भूमि स्वामित्व का निर्णय देकर अपने वैधानिक अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने 28 जून 2019 को जारी राज्य दिव्यांग आयुक्त का आदेश रद्द किया।

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