झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि स्कूल के सभागार में अंबेडकर जयंती मनाने के लिए बैठक आयोजित करना अपने आप में चुनाव में अनुचित प्रभाव डालने का अपराध नहीं है।

अदालत ने 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान स्कूल में आयोजित ऐसी ही एक बैठक को लेकर दो लोगों के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द की।

जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की एकल पीठ ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 171एफ, 171एच और 188 के तहत दर्ज मामले में आरोप पत्र, संज्ञान आदेश और आरोपमुक्ति आवेदन खारिज करने के आदेश समेत पूरी कार्यवाही रद्द की।

मामला सरस्वती शिशु विद्या मंदिर में 14 अप्रैल 2024 को आयोजित अंबेडकर जयंती की बैठक से जुड़ा था। पहले याचिकाकर्ता स्कूल के प्रधानाचार्य थे। आरोप था कि उन्होंने सक्षम प्राधिकारी से अनुमति लिए बिना स्कूल के सभागार में बैठक आयोजित की और आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन किया। दूसरे याचिकाकर्ता पर बैठक से संबंधित जानकारी अपने सामाजिक माध्यम खाते पर साझा करने का आरोप था।

सहायक अभियंता सह उड़नदस्ता अधिकारी की लिखित शिकायत के आधार पर FIR दर्ज की गई। जांच के बाद पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल किया और मजिस्ट्रेट ने IPC की धारा 171एफ, 171एच और 188 के साथ धारा 34 के तहत संज्ञान लिया। बाद में याचिकाकर्ताओं की आरोपमुक्ति की अर्जी भी खारिज की गई।

हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि यदि FIR में लगाए गए सभी आरोपों को सही मान भी लिया जाए तो क्या उनसे इन धाराओं के तहत अपराध बनता है।

धारा 171एफ पर अदालत ने कहा कि चुनाव में अनुचित प्रभाव डालने की स्थिति IPC की धारा 171सी के तहत निर्धारित है। मामले में ऐसा कोई आरोप नहीं था कि दोनों याचिकाकर्ताओं ने किसी व्यक्ति के चुनावी अधिकार के स्वतंत्र इस्तेमाल में हस्तक्षेप किया या ऐसा करने का प्रयास किया।

अदालत ने कहा,

“केवल स्कूल के सभागार में अंबेडकर जयंती मनाने के लिए बैठक आयोजित करना, अपने आप में धारा 171एफ के तहत दंडनीय अपराध नहीं हो सकता।"

अदालत ने धारा 188 के तहत अपराध भी नहीं पाया। हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में किसी ऐसे आदेश का उल्लेख नहीं है, जिसे किसी लोक सेवक ने जारी किया हो और जिसका याचिकाकर्ताओं ने उल्लंघन किया हो। FIR में मुख्य आरोप केवल यह था कि बैठक के लिए अनुमति नहीं ली गई।

पीठ ने यह भी कहा कि ऐसा कोई आरोप नहीं था कि याचिकाकर्ताओं को किसी जारी आदेश की जानकारी थी और उन्होंने जानबूझकर उसका उल्लंघन किया। FIR दर्ज करने वाले सहायक अभियंता सह उड़नदस्ता अधिकारी के बारे में भी यह आरोप नहीं था कि उन्होंने ऐसा कोई आदेश जारी किया।

धारा 171एच के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा कि इस अपराध के आवश्यक तत्वों से संबंधित बिल्कुल कोई आरोप नहीं लगाया गया।

इन परिस्थितियों में अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि जिन अपराधों के तहत मजिस्ट्रेट ने संज्ञान लिया, उनमें से कोई भी अपराध याचिकाकर्ताओं के खिलाफ नहीं बनता।

इसके बाद हाईकोर्ट ने दोनों के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही, पुलिस द्वारा दाखिल आरोप पत्र, संज्ञान आदेश और आरोपमुक्ति की अर्जी खारिज करने वाला आदेश रद्द किया।

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