जमशेदपुर में अवैध निर्माण गिराने के आदेश में बदलाव से झारखंड हाईकोर्ट का इनकार, 'बुलडोजर जस्टिस' वाला सुप्रीम कोर्ट फैसला लागू नहीं
झारखंड हाईकोर्ट ने जमशेदपुर में अवैध निर्माणों को गिराने के अपने पूर्व आदेश में संशोधन से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला In Re: Directions in Matter of Demolition of Structures वर्तमान मामले में आवेदकों की मदद नहीं करता, क्योंकि वह निर्णय “बुलडोजर जस्टिस” के संदर्भ में दिया गया था, न कि ऐसे मामलों में जहां कानून और टाउन प्लानिंग मानकों की खुली अवहेलना कर अवैध निर्माण किए गए हों।
जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ 14 जनवरी 2026 के आदेश में संशोधन की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। उक्त आदेश में झारखंड नोटिफाइड एरिया कमेटी (JNAC), जमशेदपुर को निजी प्रतिवादियों द्वारा किए गए अवैध निर्माणों को एक माह के भीतर ध्वस्त करने का निर्देश दिया गया था।
पृष्ठभूमि
हाईकोर्ट ने अपने पूर्व आदेश में यह दर्ज किया था कि JNAC ने स्वयं निर्माणों को अवैध स्वीकार किया था और उन्हें गिराने का आश्वासन दिया था। अदालत ने तीन अधिवक्ताओं की समिति की रिपोर्ट पर भी भरोसा किया था, जिसमें पाया गया कि संबंधित भवनों ने बिल्डिंग बायलॉज का उल्लंघन किया, स्वीकृत सीमा से अधिक निर्माण किया गया और यह सब नगर निकायों की प्रभावी निगरानी के अभाव में हुआ।
आवेदकों की दलील
आवेदकों ने तर्क दिया कि—
ध्वस्तीकरण का आदेश नहीं दिया जाना चाहिए था;
JNAC के बयान को अदालत के प्रति उपक्रम (undertaking) नहीं माना जाना चाहिए;
सुप्रीम कोर्ट के Demolition of Structures फैसले के अनुसार बिना प्रक्रिया अपनाए ध्वस्तीकरण नहीं हो सकता;
अनुमेय सीमा के भीतर हुए विचलनों (deviations) को नियमित (regularise) किया जा सकता है;
उन्हें नियमितीकरण के लिए आवेदन करने और ध्वस्तीकरण आदेश के खिलाफ अपील का अवसर मिलना चाहिए था।
इसी आधार पर उन्होंने 14 जनवरी 2026 के आदेश में संशोधन, ध्वस्तीकरण पर रोक और JNAC को कानून के अनुसार प्रक्रिया अपनाने का निर्देश देने की मांग की।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
अदालत ने इन दलीलों से असहमति जताते हुए कहा कि आवेदक प्रथम दृष्टया भी यह दिखाने में विफल रहे कि उनके निर्माण वैध हैं या यह कि विचलन अनुमेय/क्षम्य सीमा के भीतर हैं। अदालत ने नोट किया कि—
किसी भी आवेदक ने कम्प्लीशन सर्टिफिकेट प्रस्तुत नहीं किया, जो अनिवार्य है;
बिना ठोस याचिकाओं और विश्वसनीय सामग्री के केवल मौखिक दलीलें दी गईं।
अदालत ने कहा—
“यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अनुमति लेकर बाद में उसकी शर्तों से घोर विचलन करते हुए निर्माण करना आम बात बन गई है। यदि विचलन वास्तव में अनुमेय सीमा में हैं, तो निर्माणकर्ता का दायित्व है कि वह उन्हें प्रकट कर कम्प्लीशन सर्टिफिकेट के लिए आवेदन करे। कम्प्लीशन सर्टिफिकेट का अभाव यह दर्शाता है कि विचलन अनुमेय/क्षम्य सीमा से परे हैं।”
नगर निकायों की भूमिका पर कड़ी टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि यह स्थिति केवल आवेदकों द्वारा बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण करने के कारण नहीं, बल्कि JNAC और नगर प्राधिकरणों की घोर लापरवाही के कारण भी उत्पन्न हुई है। अदालत ने कहा—
“ऐसे निर्माण या तो प्राधिकरणों की सक्रिय मिलीभगत से संभव हुए या फिर उनके घोर निष्क्रिय रवैये के कारण। यही रवैया ऐसे आवेदकों को प्रोत्साहित करता है, जो स्वयं कानून की अवहेलना करने के बाद 'कानून के शासन' की दुहाई देते हैं।”
'बुलडोजर जस्टिस' का तर्क खारिज
अदालत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के Demolition of Structures संबंधी निर्देश पूरी तरह अलग संदर्भ में, यानी “बुलडोजर जस्टिस” के मामलों में दिए गए थे, और वर्तमान मामले की परिस्थितियां उनसे तुलनीय नहीं हैं। यहां आवेदकों को—
अनुमतियों और लाइसेंस प्रस्तुत करने का पूरा अवसर था;
कम्प्लीशन सर्टिफिकेट के लिए आवेदन करने का अवसर था;
ऐसे में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का अस्वाभाविक विस्तार नहीं किया जा सकता।
नियमितीकरण अधिकार नहीं
हाईकोर्ट ने दोहराया कि अवैध निर्माणों के नियमितीकरण का कानून स्थापित सिद्धांत यह है कि नियमितीकरण एक अपवाद है, नियम नहीं। सुप्रीम कोर्ट बार-बार कह चुका है कि—
नियमितीकरण को अधिकार के रूप में दावा नहीं किया जा सकता;
जो लोग कानून और पर्यावरणीय नियमों का खुलेआम उल्लंघन करते हैं, उन्हें इसका लाभ नहीं दिया जा सकता।
आदेश
इन सभी कारणों से हाईकोर्ट ने अंतरिम याचिकाओं को खारिज करते हुए 14 जनवरी 2026 के अपने पूर्व आदेश को बरकरार रखा और अवैध निर्माणों के ध्वस्तीकरण के निर्देशों को कायम रखा।