Drugs & Cosmetics Act | 28 दिन में दोबारा जांच की मांग नहीं की तो सरकारी रिपोर्ट अंतिम मानी जाएगी: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा कि अगर किसी दवा के निर्माता या संबंधित व्यक्ति ने सरकारी विश्लेषक की जांच रिपोर्ट को चुनौती देने और नमूने की दोबारा जांच कराने का अधिकार तय 28 दिन के भीतर नहीं इस्तेमाल किया तो उस रिपोर्ट को अंतिम और निर्णायक साक्ष्य माना जाएगा। कोर्ट ने दवा निर्माता, स्टॉकिस्ट, वितरक और थोक विक्रेताओं की ओर से दायर तीन याचिकाएं खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
जस्टिस संजय परिहार की पीठ मैकनिम प्लस टैबलेट से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी। इस दवा के एक नमूने को जांच में 'मानक गुणवत्ता के अनुरूप नहीं' पाया गया। दवा निर्धारित समय में घुलने की जांच में विफल रही थी। इसके बाद आरोपियों के खिलाफ ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 की धारा 18(ए)(i) के साथ धारा 27(डी) के तहत आपराधिक कार्यवाही शुरू की गई।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि उन्हें दवा के नमूने की दोबारा जांच कराने के अपने वैधानिक अधिकार का उचित अवसर नहीं मिला। उन्होंने इसी आधार पर आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की।
हाईकोर्ट ने ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट की धारा 25(3) का हवाला देते हुए कहा कि सरकारी विश्लेषक की रिपोर्ट तब तक अंतिम साक्ष्य नहीं बनती, जब तक संबंधित व्यक्ति निर्धारित 28 दिन की अवधि के भीतर यह नहीं बताता कि वह रिपोर्ट को चुनौती देने के लिए सबूत पेश करना चाहता है। अगर वह इस अवधि में ऐसी मंशा जाहिर नहीं करता है तो रिपोर्ट निर्णायक साक्ष्य का दर्जा हासिल कर लेती है।
कोर्ट ने कहा,
"28 दिन की तय अवधि में रिपोर्ट को चुनौती देने की मंशा जाहिर नहीं करने पर सरकारी विश्लेषक की रिपोर्ट निर्णायक साक्ष्य बन जाती है।"
मामला वर्ष 2014 का है। शिकायतकर्ता ड्रग इंस्पेक्टर ने डोडा स्थित मेडिकल दुकान से अलग-अलग दवाओं के सैंपल लिए थे। इनमें 'मैकनिम प्लस टैबलेट', बैच नंबर 13329 भी शामिल थी। इसका निर्माण मई 2013 में हुआ था और इसकी अंतिम उपयोग तिथि अप्रैल 2015 थी। जांच के बाद सरकारी विश्लेषक ने दवा को मानक गुणवत्ता के अनुरूप नहीं पाया, क्योंकि वह निर्धारित समय में घुलने की जांच में विफल रही थी।
सैंपल के चार हिस्से किए गए। एक हिस्सा खुदरा विक्रेता को दिया गया, दूसरा सरकारी विश्लेषक को भेजा गया और तीसरा हिस्सा स्टॉकिस्ट और वितरक कंपनी को दिया गया। चौथा हिस्सा अदालत में पेश किए जाने के लिए रखा गया। सरकारी विश्लेषक की रिपोर्ट में दवा को मानक गुणवत्ता के अनुरूप नहीं बताया गया।
रिपोर्ट मिलने के बाद ड्रग इंस्पेक्टर ने खुदरा विक्रेता को इसकी जानकारी दी और दवा के डीलर तथा निर्माता का विवरण मांगा। निर्माता की ओर से जवाब दिया गया कि निर्धारित समय में दवा के घुलने की जांच उस पर लागू नहीं हो सकती और जांच को नियमों के अनुरूप मान लिया जाना चाहिए।
हालांकि किसी भी आरोपी ने तय 28 दिन की अवधि के भीतर ड्रग इंस्पेक्टर से नमूने की दोबारा जांच या पुनर्विश्लेषण कराने की मांग नहीं की। इसके बाद शिकायत दर्ज की गई और आपराधिक कार्यवाही शुरू हुई।
हाईकोर्ट ने कहा कि निर्माता की ओर से भेजे गए जवाब में कहीं भी यह नहीं कहा गया कि वह सैंपल की दोबारा जांच कराना चाहता है या धारा 25(3) के तहत मिले अधिकार का इस्तेमाल करना चाहता है। इसके बजाय निर्माता ने यह तर्क दिया था कि दवा पर घुलने की जांच लागू नहीं होती और संभव है कि दवा जिस खुदरा विक्रेता या लाइसेंसधारी के पास रही, उसकी ओर से कोई चूक हुई हो।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल जांच की प्रक्रिया या इस्तेमाल की गई पद्धति पर तकनीकी आपत्ति उठाना सैंपल की दोबारा जांच कराने की वैधानिक मंशा जाहिर करने के बराबर नहीं है।
पीठ ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के 'स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम बृज लाल मित्तल' मामले के फैसले का भी हवाला दिया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर आरोपी 28 दिन के भीतर सरकारी विश्लेषक की रिपोर्ट को चुनौती देने की अपनी मंशा नहीं बताता है तो रिपोर्ट धारा 25(3) के तहत निर्णायक साक्ष्य बन जाती है।
हाईकोर्ट ने ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन फार्मास्यूटिकल लिमिटेड बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी उल्लेख किया। इसमें कहा गया कि जांच की पद्धति को लेकर केवल तकनीकी आपत्ति करना सैंपल की दोबारा जांच की मांग करने की अनिवार्य वैधानिक शर्त को पूरा नहीं करता।
याचिकाकर्ताओं ने ड्रग इंस्पेक्टर और सरकारी विश्लेषक की क्षमता तथा जांच की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि ये ऐसे मुद्दे हैं, जिनका फैसला मुकदमे की सुनवाई के दौरान साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि सरकारी विश्लेषक को अदालत में पेश कर उसका बयान दर्ज होने के बाद ही यह तय किया जा सकता है कि उसके पास जांच करने का जरूरी अधिकार था या नहीं और जांच लागू मानकों के अनुसार की गई या नहीं।
सैंपल निर्माता को सीधे नहीं दिए जाने की दलील पर भी कोर्ट ने राहत देने से इनकार किया। पीठ ने कहा कि सैंपल खुदरा विक्रेता से लिया गया और उसका तीसरा हिस्सा स्टॉकिस्ट व वितरक को सौंप दिया गया। ऐसे में केवल यह तथ्य कि निर्माता को नमूने का हिस्सा सीधे नहीं दिया गया, पूरी प्रक्रिया को गैरकानूनी नहीं बनाता।
सभी तथ्यों और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि आरोपियों ने तय अवधि के भीतर नमूने की दोबारा जांच कराने के अपने अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया। इसलिए सरकारी विश्लेषक की रिपोर्ट अंतिम और निर्णायक साक्ष्य बन चुकी थी।
कोर्ट ने तीनों याचिकाएं खारिज कीं और आरोपियों के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार किया।