जांच के आदेश के बाद उसी सामग्री पर समन जारी नहीं कर सकता मजिस्ट्रेट: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

Update: 2026-03-30 11:35 GMT

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि मजिस्ट्रेट प्रारंभिक साक्ष्य से संतुष्ट नहीं होकर दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 202 के तहत जांच का आदेश देता है तो वह बाद में उसी सामग्री के आधार पर आरोपियों को समन जारी नहीं कर सकता।

जस्टिस संजय धर ने कहा,

“जब मजिस्ट्रेट प्रारंभिक साक्ष्य से संतुष्ट नहीं होता और जांच का आदेश देता है तो यह स्पष्ट है कि उपलब्ध सामग्री पर्याप्त नहीं है। ऐसे में बिना किसी नए साक्ष्य के उसी आधार पर समन जारी करना उचित नहीं है।”

मामला सुंदरबनी के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की अदालत में लंबित शिकायत से जुड़ा था, जिसमें आरोप था कि आरोपियों ने जमीन पर कब्जा करने की कोशिश की और विरोध करने पर शिकायतकर्ता के घर में घुसकर मारपीट और गाली-गलौज की।

मजिस्ट्रेट ने शिकायतकर्ता और एक गवाह के बयान दर्ज करने के बाद मामले की सच्चाई जानने के लिए पुलिस से जांच कराई। जांच अधिकारी ने दो बार रिपोर्ट दी और दोनों बार आरोपों को झूठा बताते हुए कहा कि मामला पुरानी दुश्मनी का परिणाम है।

इसके बावजूद मजिस्ट्रेट ने बिना कोई नया साक्ष्य जोड़े, उन्हीं प्रारंभिक बयानों के आधार पर आरोपियों के खिलाफ समन जारी किया।

हाईकोर्ट ने इस प्रक्रिया को गलत ठहराते हुए कहा कि जब दो बार की जांच रिपोर्ट में आरोपों को असत्य बताया गया और कोई नया साक्ष्य सामने नहीं आया तो समन जारी करना कानून का दुरुपयोग है।

अदालत ने यह भी पाया कि दोनों पक्षकारों के बीच जमीन को लेकर विवाद था और यह आपराधिक मामला दरअसल उसी सिविल विवाद को दबाव बनाने के लिए दायर किया गया।

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले की कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

अंततः अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए शिकायत और उससे संबंधित सभी कार्यवाहियों को रद्द कर दिया।

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