मालाफाइड या पक्षपात साबित न हो तो कोर्ट इंटरव्यू के अंक और चयन मेरिट की दोबारा जांच नहीं कर सकता: हिमाचल हाईकोर्ट
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि विधिवत गठित चयन समिति की ओर से दिए गए इंटरव्यू के अंकों और उम्मीदवारों की तुलनात्मक मेरिट का कोर्ट दोबारा आकलन नहीं कर सकता, जब तक चयन प्रक्रिया में दुर्भावना, पक्षपात, मनमानी या वैधानिक नियमों अथवा लागू नीति का उल्लंघन साबित न हो।
जस्टिस रंजन शर्मा ने कहा कि केवल इस आधार पर कि किसी असफल उम्मीदवार को इंटरव्यू में कम अंक मिले हैं कोर्ट चयन समिति या विशेषज्ञ की भूमिका अपनाकर उम्मीदवारों की योग्यता का फिर से मूल्यांकन नहीं कर सकता।
कोर्ट ने कहा,
“विधिवत गठित चयन समिति द्वारा तुलनात्मक मेरिट, जिसमें इंटरव्यू में दिए गए अंक भी शामिल हैं उसका का न्यायिक पुनर्मूल्यांकन इस कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।”
यह मामला मंजू देवी की याचिका से जुड़ा था। उन्होंने SMC नीति के तहत सोलन के राजकीय सीनियर माध्यमिक विद्यालय, गाई घाट में राजनीतिक विज्ञान विषय के स्नातकोत्तर शिक्षक पद पर गीतांजलि के चयन और नियुक्ति को चुनौती दी।
याचिकाकर्ता का कहना था कि वह स्थानीय और योग्य उम्मीदवार थीं, लेकिन उन्हें इंटरव्यू में केवल 2.33 अंक मिले जबकि चयनित उम्मीदवार गीतांजलि को 9.5 अंक दिए गए। राज्य सरकार ने चयन का बचाव करते हुए कहा कि प्रक्रिया निर्धारित मानदंडों के अनुसार विधिवत गठित चयन समिति ने पूरी की।
राज्य की ओर से बताया गया कि गीतांजलि ने कुल 30.52 अंक हासिल किए, जबकि याचिकाकर्ता के कुल अंक 30.33 थे। चयन समिति ने SMC योजना-नीति के तहत कुल 60 अंकों में सात निर्धारित मानकों के आधार पर उम्मीदवारों को अंक दिए।
हाईकोर्ट ने पाया कि गीतांजलि की कुल मेरिट याचिकाकर्ता से अधिक है। ग्रेजुएट, बीएड और पोस्ट ग्रेजुएट स्तर पर भी चयनित उम्मीदवार के अंक अधिक हैं। कोर्ट ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता के स्थानीय उम्मीदवार होने का लाभ संबंधित पटवार सर्किल के आधार पर पहले ही 10 अंक देकर दिया जा चुका है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब दोनों उम्मीदवार समान मेरिट पर नहीं हों, तब स्थानीय उम्मीदवार होने के आधार पर मिलने वाली प्राथमिकता तुलनात्मक मेरिट को पीछे नहीं छोड़ सकती।
हाईकोर्ट ने कहा कि चयन प्रक्रिया में न तो लागू नीति का उल्लंघन पाया गया और न ही दुर्भावना, पक्षपात या किसी उम्मीदवार के पक्ष में अनुचित लाभ देने का प्रमाण मिला। ऐसे में इंटरव्यू के अंकों या तुलनात्मक मेरिट का दोबारा आकलन करने का कोई आधार नहीं है।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने गीतांजलि का चयन बरकरार रखते हुए मंजू देवी की रिट याचिका खारिज की।