हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कोर्ट की कार्यवाही में बाधा डालने की आरोपी महिला के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने कहा कि उस समय कोर्ट की अध्यक्षता कर रहे सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (SDM) सीधे पुलिस के पास नहीं जा सकते।

कोर्ट ने माना कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 215 के तहत शिकायत लिखित रूप में उस उच्च न्यायालय या उस लोक सेवक को की जानी चाहिए, जिसके प्रशासनिक अधीन शिकायतकर्ता हैं।

जस्टिस संदीप शर्मा ने कहा:

"चूंकि शिकायतकर्ता उस समय कोर्ट की अध्यक्षता कर रहा था, जब याचिकाकर्ता द्वारा कथित बाधा डाली गई, इसलिए वह उस कोर्ट को लिखित शिकायत कर सकता था जिसके अधीन उसका कोर्ट आता है... शिकायतकर्ता को या तो सीधे हाईकोर्ट या किसी अन्य लोक सेवक को लिखित शिकायत करनी चाहिए, जिसके वह प्रशासनिक रूप से अधीन है।"

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 24 फरवरी, 2025 को रामपुर बुशहर के सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (SDM) के समक्ष एक मामले की सुनवाई के दौरान हुई घटना से जुड़ा है। SDM ने आरोप लगाया कि पल्लवी रामचैक बिना अनुमति के कोर्ट रूम में दाखिल हुईं, आपत्तियां उठाईं और तर्क दिए और बाहर जाने के निर्देश के बावजूद कार्यवाही में बाधा डालती रहीं।

अपने आधिकारिक कर्तव्यों में बाधा और न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप का आरोप लगाते हुए SDM ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद BNS की धारा 221 और 276 के तहत कलंद्रा (शिकायत रिपोर्ट) दायर की गई।

याचिकाकर्ता ने कलंद्रा और उससे जुड़ी कार्यवाही रद्द करने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और तर्क दिया कि BNSS की धारा 215 के तहत कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

हाईकोर्ट ने पाया कि BNSS की धारा 215 किसी कोर्ट को BNS की धारा 206 से 223 के तहत अपराधों का संज्ञान लेने से रोकती है, जब तक कि संबंधित लोक सेवक, उसके प्रशासनिक वरिष्ठ अधिकारी या अधिकृत लोक सेवक द्वारा लिखित शिकायत न की जाए।

इस मामले में चूंकि कथित बाधा के समय SDM स्वयं कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे थे, इसलिए उन्हें पुलिस में शिकायत दर्ज करने के बजाय हाईकोर्ट या उस लोक सेवक से संपर्क करना चाहिए, जिसके वे प्रशासनिक रूप से अधीन थे। इसलिए बाद में हुई पुलिस जांच और कलंद्रा (Kalandra) दाखिल करने की प्रक्रिया में BNSS की धारा 215 के तहत ज़रूरी नियमों का पालन नहीं किया गया।

कोर्ट ने इस स्थापित सिद्धांत पर भी भरोसा किया कि किसी अपराध का विवरण या लेबल बदलकर अभियोजन (Prosecution) से जुड़े कानूनी सुरक्षा उपायों को दरकिनार नहीं किया जा सकता।

BNSS की धारा 528 के तहत अपनी अंतर्निहित अधिकार-क्षेत्र (Inherent Jurisdiction) का इस्तेमाल करने के लिए पर्याप्त आधार पाते हुए कोर्ट ने माना कि कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और इससे याचिकाकर्ता को बेवजह परेशानी होगी। नतीजतन, कोर्ट ने कलंद्रा और उसके खिलाफ चल रही सभी संबंधित कार्यवाहियों को रद्द किया और याचिकाकर्ता को बरी कर दिया।

Case Name: Pallavi Ramchaik v/s State of H.P. & Ors.

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