पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट ने जबरन वसूली के मामले में "बिना विवेक लगाए" अग्रिम जमानत रद्द करने के लिए हरियाणा पर 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया।

जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने कहा,

"ऐसा प्रतीत होता है कि लोक अभियोजक ने बिना विवेक लगाए प्रतिवादी को दी गई जमानत रद्द करने की मांग करने वाली वर्तमान याचिका दायर करने की सिफारिश की। इस तरह के सनकी और मनमौजी दृष्टिकोण की निंदा की जानी चाहिए।"

अदालत ने कहा,

"ठोस परिस्थितियों का अस्तित्व जमानत रद्द करने के लिए अनिवार्य शर्त है, जो "वर्तमान मामले में पूरी तरह से गायब" हैं।

इसमें आगे कहा गया कि राज्य ने जिस "सतर्क और सरसरी दृष्टिकोण" के साथ जमानत रद्द करने का रुख किया, उसकी सराहना नहीं की जा सकती, क्योंकि इसका आरोपी की स्वतंत्रता पर सीधा और गंभीर प्रभाव पड़ा।

ये टिप्पणियां जून, 2023 में मामले से संबंधित अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायाधीश रोहतक द्वारा प्रतिवादी को दी गई अग्रिम जमानत रद्द करने के लिए सीआरपीसी की धारा 439 (2) सपठित धारा 482 सीआरपीसी के तहत दायर याचिका के जवाब में आईं।

इसमें आरोपी ने कथित तौर पर किसी व्यक्ति को आईपीसी की धारा 387 और 120-बी के तहत जबरन वसूली करने के लिए मौत या गंभीर चोट के डर में डालने के आरोप में गिरफ्तार किया।

राज्य द्वारा यह प्रस्तुत किया गया कि आरोपी अपने सह-अभियुक्त द्वारा दिए गए बयान के आधार पर वर्तमान मामले में शामिल है, जो कथित घटना में उसके शामिल होने का संकेत देता है।

राज्य ने आगे कहा कि अग्रिम जमानत रद्द करने की प्रार्थना इस आधार पर की गई कि प्रतिवादी की उसके सहयोगियों के साथ बातचीत के संबंध में कोई डेटा नहीं है और फोरेंसिक प्रयोगशाला के माध्यम से डेटा पुनर्प्राप्त करने में समय लगेगा।

यह तर्क दिया गया कि उस समय में आरोपी इसी तरह के अन्य अपराध कर सकता है, क्योंकि वह पहले भी हत्या के मामले से संबंधित अन्य एफआईआर में शामिल है।

दलीलों पर विचार करते हुए न्यायालय ने कहा,

''ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान याचिका कमजोर और नाजुक आधार पर दायर की गई।''

यह देखते हुए कि "जिस अपराध के तहत प्रतिवादी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई, उसमें सात साल तक की कैद की सजा हो सकती है,” कोर्ट ने अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) के मामले पर भरोसा किया। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी केवल सात साल या उससे कम सजा वाले अपराधों में ही की जानी चाहिए, यदि आरोपी द्वारा सबूतों के साथ छेड़छाड़ करके या गवाह को धमकी देकर मुकदमे की प्रगति में बाधा डालने की संभावना हो। यह माना गया कि इस तरह के विचारों के अभाव में अभियुक्तों को कैद करने से जेलों में भीड़भाड़ के अलावा कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा।

यह देखते हुए कि न्यायिक पुनर्विचार की प्रैक्टिस में जमानत देने वाले आदेश में हस्तक्षेप का दायरा काफी महीन है। पीठ ने यह स्पष्ट किया कि अदालतें यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य हैं कि सविंधान के अनुच्छेद 21 के तहत निहित आरोपी के बहुमूल्य अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखा जाए।

नतीजतन पीठ ने गरीब रोगी कल्याण कोष (PGIMER) चंडीगढ़ में जमा करने के लिए 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया।

न्यायालय ने आदेश की एक प्रति अभियोजन निदेशक, हरियाणा को भेजने का भी निर्देश दिया, जिससे वह अपने अधिकारियों को संवेदनशील बनाने की दिशा में कदम उठा सकें, "यह सुनिश्चित करने के लिए कि हाइकोर्ट के समक्ष तर्क और न्याय की अपील दायर करना सही तरीके से नहीं किया जाता, जो उद्देश्य मानक को पूरा नहीं करता।”

अपीयरेंस

याचिकाकर्ता की ओर से- गीता शर्मा डीएजी हरियाणा।

साइटेशन- लाइव लॉ (पीएच) 18 2024

केस- हरियाणा राज्य बनाम इंद्राज

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