समुदाय के लिए कब्रिस्तान होने के बावजूद मुस्लिम परिवार विवादित ज़मीन पर शव नहीं दफ़ना सकता: गुजरात हाई कोर्ट ने राहत देने से किया इनकार

Update: 2026-07-23 14:27 GMT

गुजरात हाईकोर्ट ने एक गाँव के मुस्लिम निवासियों की याचिका खारिज की, जिसमें उन्हें एक नोटिस के खिलाफ चुनौती दी गई। इस नोटिस में उनसे पूछा गया कि समुदाय के लिए अलग से कब्रिस्तान होने के बावजूद उन्होंने विवादित ज़मीन पर शव क्यों दफ़नाया। [2026 LiveLaw (Guj) 201]

विवादित ज़मीन के साइट इंस्पेक्शन (मौके की जाँच) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए, जिसमें मुस्लिम समुदाय के लिए कब्रिस्तान होने की बात कही गई, कोर्ट ने कहा कि जब पहले से ही दफ़नाने के लिए एक जगह तय थी, तो याचिकाकर्ताओं के लिए उस ज़मीन पर शव दफ़नाना सही नहीं था।

कोर्ट उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें गाँव के मुस्लिम निवासियों को ज़मीन का इस्तेमाल कब्रिस्तान के तौर पर करने को लेकर भेजे गए नोटिस को चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि भावनगर ज़िले की रूपवती ग्राम पंचायत के सरपंच ने उन्हें नोटिस जारी कर बताया कि उन्होंने गाँव में हिंदुओं के श्मशान घाट के पास शव दफ़नाया।

नोटिस के अनुसार, याचिकाकर्ताओं से पूछा गया कि किन हालात में उन्होंने उस जगह पर शव दफ़नाया; कारण न बताने पर अधिकारियों ने उन्हें सूचित किया कि दफ़नाए गए शव को उचित धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ बाहर निकाला जाएगा और फिर से उस कब्रिस्तान में दफ़नाया जाएगा जो इस काम के लिए तय किया गया।

सरपंच ने याचिकाकर्ताओं को यह भी बताया कि जब ऊपर बताई गई कार्रवाई की जाएगी, तो उन्हें कानून-व्यवस्था की कोई समस्या पैदा नहीं करनी चाहिए।

याचिकाकर्ताओं ने पालिताना के डिप्टी कलेक्टर के 16.06.2026 के उस आदेश को भी चुनौती दी, जिसमें विवादित जगह को मुस्लिम कब्रिस्तान का हिस्सा मानने के उनके अनुरोध को खारिज कर दिया गया।

जस्टिस निखिल एस. करियल ने अपने आदेश में कहा कि मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए कोर्ट ने पहले राज्य के वकील को निर्देश दिया था कि वे राजस्व विभाग और पंचायत विभाग के उचित अधिकारियों से मौके की जांच करवाएं और रिपोर्ट मांगें।

इसके बाद मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए तय कब्रिस्तान के साइट विज़िट के संबंध में रिपोर्ट दाखिल की गई।

रिपोर्ट के बारे में कोर्ट ने कहा:

"ऐसा लगता है कि वह कब्रिस्तान लगभग 700 वर्ग मीटर का है। इसके चारों ओर बाड़ लगी है और एक गेट भी है। साथ ही यह भी बताया गया कि ज़मीन का लगभग आधा हिस्सा दफ़नाने के काम में लाया गया और बाकी आधा हिस्सा पूरी तरह खाली है। इस स्थिति को देखते हुए, कोर्ट को लगता है कि जब मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए उनके समुदाय के मृतकों को दफ़नाने के लिए एक कब्रिस्तान तय है तो याचिकाकर्ताओं के लिए यह सही नहीं था कि वे अपने परिवार के मृतक व्यक्ति को विवादित 27 गुंठा ज़मीन पर दफ़नाने का फ़ैसला करते।

कोर्ट को लगता है कि मामला अलग हो सकता था अगर मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए कब्रिस्तान बहुत दूर होता, जिससे मृतक के परिवार वालों को परेशानी होती और ऐसी ज़रूरत की वजह से विवादित जगह का इस्तेमाल कब्रिस्तान के तौर पर किया जाता; लेकिन कोर्ट को लगता है कि यहाँ ऐसा मामला नहीं है।"

कोर्ट ने कहा कि 2021-2022 में याचिकाकर्ताओं द्वारा दफ़नाए गए एक शव को उस जगह से निकालना पड़ा था; बाद में उसे समुदाय के कब्रिस्तान में दफ़नाया गया। कोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में चार साल बाद उस फ़ैसले पर सवाल उठाए बिना या उस पर कोई स्पष्टता हुए बिना, याचिकाकर्ताओं के लिए उसी विवादित ज़मीन का इस्तेमाल दफ़नाने के मकसद से करना सही नहीं था।

कोर्ट ने कहा,

"इस कोर्ट को ऐसा लगता है कि जब संबंधित अधिकारियों ने यह स्टैंड लिया था कि जिस ज़मीन की बात हो रही है, उसका इस्तेमाल दफ़नाने के लिए नहीं किया जा सकता तो उस समय याचिकाकर्ताओं के पास उस फ़ैसले पर सवाल उठाने या मुस्लिम समुदाय के लिए कब्रिस्तान के तौर पर तय की गई 27 गुंठा ज़मीन के इस्तेमाल की इजाज़त न मिलने के फ़ैसले पर सवाल उठाने का मौका था। फिर भी ऐसा न करने के बाद चार साल बीत जाने पर याचिकाकर्ता एकतरफ़ा तौर पर यह तय करने के हकदार नहीं हैं कि उक्त ज़मीन का इस्तेमाल मुस्लिम समुदाय के मृतकों को दफ़नाने के लिए किया जा सकता है।

इसके अलावा, जैसा कि ऊपर बताया गया, गाँव में ही उसी समुदाय के लोगों के लिए एक कब्रिस्तान तय है, इसलिए याचिकाकर्ताओं को बिना किसी वजह के यह मुद्दा खड़ा करने की ज़रूरत नहीं थी। कोर्ट ने पाया कि समुदाय के लोग कब्रिस्तान के तौर पर जिस ज़मीन का इस्तेमाल करते हैं, वह काफ़ी है, यानी उसका एरिया लगभग 700 वर्ग मीटर है और सक्षम अधिकारियों ने सर्टिफ़ाई किया कि ज़मीन का लगभग आधा हिस्सा खाली है, जिसका इस्तेमाल दफ़नाने के लिए किया जा सकता है।"

कोर्ट ने कहा कि चूँकि संबंधित समुदाय के लोगों के लिए पहले से ही दफ़नाने की एक सही जगह मौजूद थी, जिसका इस्तेमाल इस मामले में मृतक को दफ़नाने के लिए किया जा सकता था, इसलिए विवादित जगह के बारे में याचिकाकर्ताओं का स्टैंड "पूरी तरह से अनुचित लगता है"।

इस तरह कोर्ट ने कहा कि सरपंच द्वारा याचिकाकर्ताओं को उस ज़मीन के बारे में सही दस्तावेज़ दिखाने के लिए नोटिस जारी करने में कोई गलती नहीं पाई गई, जिसका इस्तेमाल कब्रिस्तान के तौर पर किया गया और/या जिसमें संबंधित शव को निकाला जाना था।

इस स्टेज पर याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता खुद मृतक का शव निकालेंगे और उसे समुदाय के कब्रिस्तान में दफ़नाएंगे।

इस बयान को रिकॉर्ड पर लेते हुए कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता 10 दिनों के भीतर शव को निकालेंगे और उसे तय कब्रिस्तान में दफ़नाएंगे। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर याचिकाकर्ता तय समय में यह प्रक्रिया पूरी नहीं करते हैं तो राज्य/पंचायत अधिकारियों के पास याचिकाकर्ताओं को सूचित करने के बाद आगे की कार्रवाई करने का अधिकार होगा।

कोर्ट ने कहा कि अधिकारी सही धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए शव को निकालेंगे और यह भी पक्का करेंगे कि हर हाल में मृतक की गरिमा बनी रहे।

याचिका खारिज की गई।

Case title: MUBARAK KASAMBHAI PADARSHI v/s STATE OF GUJARAT & ORS

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