गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि यदि वकील ने अपने मुवक्किल को फैसले की जानकारी समय पर नहीं दी और इसी वजह से अपील दाखिल करने में देरी हुई, तो केवल इस आधार पर अपील खारिज नहीं की जा सकती, खासकर तब जब मामले में कोई गंभीर लापरवाही या अत्यधिक देरी न हो। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में देरी को माफ करने के आवेदन पर उदार दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।

जस्टिस मौलिक जे. शेलत ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें एक व्यक्ति ने दीवानी मुकदमे में जिला जज के आदेश के खिलाफ अपील दाखिल करने में हुई 27 दिन की देरी को माफ करने से इनकार करने वाले अपीलीय अदालत के आदेश को चुनौती दी थी।

मामले में याचिकाकर्ता का कहना था कि जिला अदालत का फैसला उसके वकील ने उसे समय पर नहीं बताया। इसी कारण वह निर्धारित अवधि में अपील दाखिल नहीं कर सका। यह तथ्य याचिकाकर्ता की ओर से देरी माफ करने के आवेदन में बताया गया था और प्रतिवादी ने इसका कोई लिखित जवाब दाखिल नहीं किया।

हाईकोर्ट ने पाया कि देरी का मुख्य कारण वकील द्वारा याचिकाकर्ता को फैसले की जानकारी समय पर नहीं दिया जाना था। अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि जिस वकील ने निचली अदालत में याचिकाकर्ता का पक्ष रखा था, उसी वकील ने बाद में अपील भी दाखिल की थी।

इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि यह समझना मुश्किल है कि वकील द्वारा फैसले की जानकारी समय पर न दिए जाने का नुकसान याचिकाकर्ता को कैसे पहुंचाया जा सकता है, जब उसी वकील ने उसके आधार पर अपील दाखिल की थी।

अदालत ने कहा कि एक स्थिति यह हो सकती है कि वकील ने फैसले की जानकारी समय पर नहीं दी, लेकिन बाद में किसी अन्य वकील ने अपील दाखिल की। लेकिन इस मामले में उसी वकील ने अपील दायर की थी। इसलिए अपीलीय अदालत का अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण उचित नहीं था।

हाईकोर्ट ने कहा कि देरी माफ करने के आवेदन पर विचार करते समय अदालतों को उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और पर्याप्त कारण की व्याख्या भी उदारता से की जानी चाहिए, ताकि विवाद का फैसला उसके गुण-दोष के आधार पर हो सके।

अदालत ने कहा कि मौजूदा मामले में ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता की ओर से अपील दाखिल करने में गंभीर लापरवाही हुई या अत्यधिक देरी की गई।

हाईकोर्ट ने कहा कि अपील में हुई देरी को माफ नहीं करने से याचिकाकर्ता को गंभीर नुकसान होगा, क्योंकि वह अपील के माध्यम से उपलब्ध अपने कानूनी अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। नियमित दीवानी अपील कानून द्वारा दिया गया वैधानिक उपाय है और केवल अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण अपनाकर किसी व्यक्ति से अपील का यह अधिकार नहीं छीना जाना चाहिए।

अदालत ने कहा कि अपीलीय अदालत को देरी माफ करने के आवेदन पर फैसला करते समय इन तथ्यों और लागू कानूनी सिद्धांतों पर विचार करना चाहिए। प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि अपीलीय अदालत ने इस महत्वपूर्ण पहलू पर ध्यान नहीं दिया।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में 27 दिन की देरी न तो गंभीर थी और न ही अत्यधिक। साथ ही, याचिकाकर्ता की ओर से अपील दाखिल करने में किसी गंभीर लापरवाही का प्रमाण नहीं है।

अदालत ने उस स्थिति पर भी गौर किया कि प्रतिवादी ने देरी माफ करने के आवेदन का कोई लिखित जवाब दाखिल नहीं किया और केवल मौखिक रूप से इसका विरोध किया। इसलिए आवेदन में बताए गए तथ्यों का प्रतिवादी की ओर से कोई प्रभावी खंडन नहीं हुआ।

हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में देरी माफ करने के लिए प्रतिवादी को नोटिस जारी किए बिना भी 27 दिन की देरी माफ की जा सकती है। हालांकि, अदालत ने प्रतिवादी को एक महीने के भीतर आदेश को वापस लेने या उसमें संशोधन की मांग करने के लिए उचित आवेदन दाखिल करने की स्वतंत्रता दी।

हाईकोर्ट ने अपीलीय अदालत का आदेश रद्द करते हुए उसे नियमित दीवानी अपील दर्ज करने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अपील की सुनवाई पक्षकारों को सुनने के बाद उसके गुण-दोष के आधार पर की जाएगी और हाईकोर्ट के इस आदेश से प्रभावित हुए बिना अपीलीय अदालत मामले का फैसला करेगी।

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