2002 गुजरात दंगे: शव बरामदगी साबित न कर पाने पर दो आरोपियों की बरी बरकरार

Update: 2026-02-24 09:38 GMT

गुजरात हाइकोर्ट ने वर्ष 2002 के गोधरा कांड के बाद हुए सांप्रदायिक दंगों से जुड़े एक हत्या मामले में दो आरोपियों को सत्र अदालत द्वारा दी गई बरी बरकरार रखी।

अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि शव कहां से बरामद हुआ। साथ ही गवाहियों में गंभीर विरोधाभास और सुनी-सुनाई बातों पर आधारित साक्ष्य थे।

जस्टिस एम.आर. मेंगदेय और जस्टिस मूल चंद त्यागी की खंडपीठ ने कहा,

“जांच अधिकारी ने जिरह में स्वीकार किया कि उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि शव कहां से बरामद हुआ। पंचनामा सिविल अस्पताल में तैयार किया गया और FIR 11 से 12 दिन की देरी से दर्ज की गई, जिसकी कोई संतोषजनक व्याख्या रिकॉर्ड पर नहीं है। घटनास्थल के पंचनामा में कोई आपत्तिजनक सामग्री दर्ज नहीं मिली।”

अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन द्वारा पेश किए गए गवाहों में से दो प्रत्यक्षदर्शी नहीं थे बल्कि उन्होंने जो कहा वह सुनी-सुनाई बातों पर आधारित था। एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी बताए गए गवाह की गवाही में भी मुख्य परीक्षा और जिरह के दौरान महत्वपूर्ण विरोधाभास पाए गए।

अदालत ने कहा,

“गवाह की घटनास्थल पर उपस्थिति ही संदिग्ध प्रतीत होती है और उसकी गवाही भरोसा उत्पन्न नहीं करती। उसका बाद का आचरण भी अस्वाभाविक है, क्योंकि उसने न तो तुरंत पुलिस को सूचना दी और न ही कथित चोटों के लिए चिकित्सा सहायता ली।”

यह आपराधिक अपील राज्य सरकार द्वारा दायर की गई, जिसमें अहमदाबाद सेशन कोर्ट द्वारा गुलाबचंद जोहरीलाल जायसवाल और एक अन्य आरोपी को बरी किए जाने के आदेश को चुनौती दी गई।

अभियोजन का आरोप था कि मार्च 2002 के दंगों के दौरान ईदगाह मस्जिद के पास भीड़ ने यासीन नामक व्यक्ति पर हमला कर उसे आग के हवाले कर दिया।

हालांकि हाइकोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता स्वयं घटनास्थल पर मौजूद नहीं था और उसकी शिकायत अन्य लोगों से मिली जानकारी पर आधारित थी।

अदालत ने कहा कि FIR दर्ज करने में 11–12 दिन की देरी हुई और उसका कोई उचित कारण नहीं बताया गया।

अदालत ने यह भी दोहराया कि अपीलीय अदालत केवल इस आधार पर निचली अदालत के निर्णय में हस्तक्षेप नहीं कर सकती कि दो संभावित दृष्टिकोण मौजूद हैं। जब तक ट्रायल कोर्ट का निर्णय विकृत या स्पष्ट रूप से गलत न हो, तब तक उसमें दखल उचित नहीं है।

पीठ ने कहा कि जिन आरोपियों को ट्रायल कोर्ट ने बरी किया, उनके पक्ष में निर्दोषता का दोहरा अनुमान लागू होता है। राज्य कोई ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका, जो संदेह से परे आरोपियों को अपराध से जोड़ सके।

इन परिस्थितियों में हाइकोर्ट ने राज्य की अपील खारिज करते हुए सेशन कोर्ट के बरी करने के आदेश को बरकरार रखा।

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