इलाहाबाद हाईकोर्ट की फटकार के बाद प्रयागराज ADM ने मुस्लिम व्यक्ति के 'अपनी मर्ज़ी से' हिंदू धर्म अपनाने को दी मंज़ूरी
इस महीने की शुरुआत में इलाहाबाद हाईकोर्ट की कड़ी फटकार के बाद प्रयागराज के अपर ज़िला मजिस्ट्रेट (प्रशासन) ने औपचारिक रूप से मुस्लिम व्यक्ति के धर्म परिवर्तन के आवेदन को मंज़ूरी दी। इस व्यक्ति ने 2022 में अपनी मर्ज़ी से सनातन धर्म/हिंदू धर्म अपना लिया था।
संबंधित अधिकारी द्वारा 14 मई को पारित आदेश का संज्ञान लेते हुए जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की डिवीज़न बेंच ने बुधवार को उस रिट याचिका का निपटारा किया, जिसे अनिल पंडित (पहले मोहम्मद अहसान) नामक व्यक्ति ने दायर किया था। अनिल पंडित इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के एक संस्थान में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।
पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता ने 2024 में हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था, जब UP के धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत उसके खिलाफ बेवजह और बार-बार पुलिस जांच शुरू की गई थी।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि शुरुआती दो पुलिस रिपोर्टों में यह पुष्टि होने के बावजूद कि धर्मांतरण अपनी मर्ज़ी से और बिना किसी अनुचित दबाव के हुआ था, ADM ने उसके ससुर द्वारा दर्ज कराई गई FIR के आधार पर बाद में एक और जांच का निर्देश दिया। याचिकाकर्ता के ससुर इस बात से नाराज़ थे कि याचिकाकर्ता ने उनकी बेटी से शादी कर ली थी।
इस बाद वाली रिपोर्ट पर भरोसा करते हुए, जिसमें याचिकाकर्ता के खिलाफ चार्जशीट दायर होने का ज़िक्र था, ADM ने अगस्त 2024 में धर्मांतरण का आवेदन यह मानकर खारिज कर दिया था कि धर्मांतरण केवल शादी के मकसद से किया गया था।
ADM ने अप्रैल 2021 में इस जोड़े के बीच हुए 1 लाख रुपये के लेन-देन को भी 'लालच' या अनुचित दबाव का पुख्ता सबूत माना था।
हालांकि, इस महीने की शुरुआत में हाईकोर्ट ने इस रवैये की कड़ी निंदा की।
बेंच ने याचिकाकर्ता और उसकी पत्नी से बातचीत की और पाया कि शादी अपनी मर्ज़ी से हुई थी।
याचिकाकर्ता की पत्नी ने यह भी स्पष्ट किया कि वह आर्थिक लेन-देन केवल एक अच्छे दोस्त से मिली आर्थिक मदद थी, जो परिवार में एक गंभीर मेडिकल इमरजेंसी के दौरान ली गई।
इस पृष्ठभूमि में 5 मई को एक कड़े शब्दों वाले आदेश में, डिवीज़न बेंच ने टिप्पणी की कि ADM ने ऐसी शक्तियों का इस्तेमाल किया जो उन्हें प्राप्त नहीं थीं। उन्होंने एक असंबंधित आपराधिक मामले में बार-बार पुलिस जांच के आदेश दिए, जबकि याचिकाकर्ता के पक्ष में आई शुरुआती रिपोर्टों को नज़रअंदाज़ कर दिया।
कोर्ट ने यह टिप्पणी की थी,
"हम एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के इस काम और रवैये को सही नहीं मानते, क्योंकि क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन के मामले से एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट का कोई लेना-देना नहीं था। फिर भी उन्होंने पुलिस को बार-बार रिपोर्ट जमा करने के लिए मजबूर किया।"
इसके अलावा, यह पाते हुए कि याचिकाकर्ता ने कानूनी प्रक्रिया के हर कदम का सख्ती से पालन किया, कोर्ट ने ADM के रिजेक्शन ऑर्डर को भी रोक दिया और संबंधित अधिकारी को निर्देश दिया कि वे मामले पर व्यावहारिक नज़र डालते हुए एक नया आदेश जारी करें।
अब 27 मई को हुई सुनवाई के दौरान, बेंच को बताया गया कि कोर्ट के आदेशों के पालन में ADM ने एक अंतिम आदेश जारी किया, जिसमें UP Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act, 2021 की धारा 9(4) के तहत याचिकाकर्ता द्वारा दायर आवेदन को आधिकारिक तौर पर मंज़ूरी दी गई।
बता दें, इस प्रावधान के तहत, ऐसे धर्मांतरणों की प्रक्रियात्मक वैधता को आधिकारिक प्राधिकारी द्वारा सत्यापित किया जाना आवश्यक है। विशेष रूप से, धारा 9(4) के अनुसार, धर्मांतरित व्यक्ति को अपनी पहचान स्थापित करने और धर्मांतरण के बाद दिए गए अपने घोषणा-पत्र की सामग्री की औपचारिक पुष्टि करने के लिए प्राधिकारी के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना अनिवार्य है।
संबंधित आदेश का अवलोकन करने के बाद डिवीज़न बेंच ने निर्धारित प्राधिकारी को निर्देश दिया कि वे 2021 के अधिनियम की धारा 9(6) के तहत परिणामी आदेश, 4 सप्ताह की निर्धारित समय-सीमा के भीतर जारी करें।
इसके अतिरिक्त, याचिका का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को उस वचन का पालन करते रहना होगा, जो उसने 5 मई को पारित पिछले आदेश में दर्ज अपने बयान के दौरान बेंच के समक्ष दिया था।
मामले का समापन करते हुए बेंच ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह अपने सभी आधिकारिक अभिलेखों, जिसमें उसकी शैक्षणिक प्रमाण-पत्र भी शामिल हैं, में नाम परिवर्तन के लिए आवेदन करे।
Case title - Anil Pandit @ Mohammad Ahashan vs. State Of U.P. And 2 Others 2026 LiveLaw (AB) 300