पत्नी को प्रेमी के साथ अंतरंग अवस्था में देखना गंभीर और अचानक उकसावा: गुजरात हाईकोर्ट ने 2001 की गैर-इरादतन हत्या की सज़ा बरकरार रखी
गुजरात हाईकोर्ट ने 2001 का ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रखा, जिसमें एक पति को गैर-इरादतन हत्या (जो हत्या की श्रेणी में नहीं आती) का दोषी ठहराया गया। इस पति ने अपनी पत्नी पर तब हमला किया, जब उसने उसे अपने ही घर में किसी दूसरे आदमी के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखा था। कोर्ट ने टिप्पणी की कि इसे "गंभीर और अचानक उकसावा" माना जा सकता है।
ऐसा करते हुए कोर्ट ने कहा कि यह मामला IPC की धारा 304-भाग II के अंतर्गत आता है, क्योंकि पति पर अपनी पत्नी की मौत का इरादा या जानकारी होने का आरोप नहीं लगाया जा सकता।
संदर्भ के लिए, धारा 304-भाग II गैर-इरादतन हत्या से संबंधित है (जो हत्या की श्रेणी में नहीं आती)। इसके तहत किसी व्यक्ति को 10 साल तक की कैद, जुर्माना, या दोनों की सज़ा हो सकती है, यदि उसने कोई ऐसा काम किया हो जिसकी जानकारी उसे हो कि उससे मौत होने की संभावना है, लेकिन उसका इरादा मौत करने का न हो, या ऐसी शारीरिक चोट पहुंचाने का न हो जिससे मौत होने की संभावना हो।
जस्टिस गीता गोपी ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी ने बचाव में यह दलील दी थी कि उसने अपनी पत्नी को गंभीर और अचानक उकसावे में आकर पीटा था, क्योंकि उसने अपनी पत्नी और उसके प्रेमी को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया था।
कोर्ट ने IPC की धारा 300 के अपवाद-1 की जांच करते हुए कहा कि 'गंभीर और अचानक उकसावा' उसी व्यक्ति की ओर से होना चाहिए जिसकी मौत हुई; हर तरह का उकसावा किसी अपराध को 'हत्या' से घटाकर 'गैर-इरादतन हत्या' (जो हत्या की श्रेणी में नहीं आती) में नहीं बदल सकता।
कोर्ट ने कहा,
"उकसावा 'गंभीर' और 'अचानक' दोनों होना चाहिए। यदि उकसावा 'गंभीर' है, लेकिन 'अचानक' नहीं तो आरोपी को इस अपवाद का लाभ नहीं मिल सकता। इसी तरह यदि उकसावा 'अचानक' तो है, लेकिन 'गंभीर' नहीं, तब भी उसे यह लाभ नहीं मिल सकता। यह साबित होना चाहिए कि आरोपी द्वारा किया गया कृत्य गंभीर और अचानक उकसावे की तत्काल प्रतिक्रिया थी, जिसने उसे अपने आत्म-नियंत्रण की शक्ति से वंचित कर दिया था। शिकायत के अनुसार, घटना से एक हफ़्ता पहले ही उसे शक होने लगा था। शिकायत 31.07.1997 को दर्ज कराई गई। आरोपी ने बताया कि 30.07.1997 की रात को टी.वी. देखने के बाद वह उसकी पत्नी और बेटा—तीनों एक ही कमरे में सो रहे थे। चूंकि उसे अपनी पत्नी की वफ़ादारी पर शक था, इसलिए उसने सोने का नाटक किया।"
कोर्ट ने आगे कहा,
इसी दौरान, 31.07.1997 की रात 00:30 बजे उसकी पत्नी उठी और बगल वाले कमरे में चली गई। ठीक उसी समय, शर्मा पिछले दरवाज़े से उसके घर में घुसा और उसने उन दोनों को आपत्तिजनक हालत में पाया। यह देखकर वह बिस्तर से उठा, और जब वह बगल वाले कमरे में गया तो उसने अपनी मृत पत्नी और उस दूसरे व्यक्ति को आपत्तिजनक स्थिति में देखा। यह देखकर उसे गुस्सा आ गया और जब उसने अचानक उन्हें रंगे हाथों पकड़ा तो उसकी पत्नी ने उससे कहा कि अगर वह उन दोनों के बीच आया तो उसे ज़िंदा नहीं छोड़ा जाएगा। इस बात से वह और भी ज़्यादा भड़क गया। शर्मा वहां से भाग निकला। हमारी भारतीय समाज व्यवस्था और कानून को ध्यान में रखते हुए, आरोपी ने अपनी पत्नी और उसके प्रेमी को जिस आपत्तिजनक स्थिति में देखा, उसे 'गंभीर और अचानक उकसावा' (Grave and Sudden Provocation) माना जा सकता है।'"
अदालत ने यह भी कहा कि शिकायत के अनुसार, जब आरोपी ने अपनी पत्नी का सामना किया तो उसने "अपनी ओर से और अपने प्रेमी की ओर से पति को जान से मारने की धमकी दी—यह कहते हुए कि अगर उसने उन दोनों के बीच आने की हिम्मत की तो उसे मार दिया जाएगा।"
अदालत ने कहा कि पत्नी के इन शब्दों ने "पति को और भी ज़्यादा उकसा दिया।" इसके बाद उसने अपनी पत्नी को घूंसे मारने शुरू कर दिए, उसे दीवार से दे मारा और फिर एक लकड़ी के टुकड़े (Chock) से उसके सिर पर ज़ोरदार वार किया। आरोपी ने बताया कि इसके बाद वह और उसकी पत्नी साथ ही बिस्तर पर सो गए। उसके अनुसार, जब वह दोबारा पानी पीने के लिए जागा तो उसने अपनी पत्नी को हिलाकर दो-तीन बार जगाने की कोशिश की, लेकिन पाया कि उसकी पत्नी की मौत हो चुकी थी।
अदालत ने कहा,
"जब 31.07.1997 को तड़के उसने अपनी पत्नी को उसके प्रेमी के साथ देखा तो उसने अपना आपा खो दिया। इसलिए यह कहा जा सकता है कि यह मामला धारा 300 के अपवाद-I के तहत साबित होता है। नतीजतन, यह मामला हत्या का नहीं, बल्कि 'आपराधिक मानव-वध जो हत्या की श्रेणी में नहीं आता' (Culpable Homicide not Amounting to Murder) का माना जाएगा, जिसके लिए IPC की धारा 304 के तहत सज़ा का प्रावधान है। आरोपी को IPC की धारा 304 के भाग-II के तहत सज़ा सुनाई जाती है। यदि कृत्य में 'इरादा' और 'जानकारी' (Knowledge) दोनों शामिल हों तो यह मामला धारा 304 के भाग-I के अंतर्गत आएगा। वहीं, यदि कृत्य में केवल 'जानकारी' हो, लेकिन हत्या करने या शारीरिक चोट पहुंचाने का कोई 'इरादा' न हो तो यह मामला धारा 304 के भाग-II के अंतर्गत आएगा। प्रस्तुत मामले में आरोपी के कृत्य के साथ-साथ 'इरादा' और 'जानकारी' दोनों को एक साथ जोड़कर नहीं देखा जा सकता। उसे अपनी पत्नी की वफ़ादारी पर शक तो था, लेकिन शायद उसने यह कल्पना भी नहीं की होगी कि उसकी पत्नी अपने ही घर में अपने पड़ोसी के साथ (जिसे उसने प्रेमी बना रखा था) शारीरिक संबंध स्थापित कर लेगी। इस मामले में यह नहीं कहा जा सकता कि आरोपी ने अपनी पत्नी की हत्या करने या उसे नुकसान पहुँचाने के बहाने के तौर पर जान-बूझकर (स्वेच्छा से) ऐसी उत्तेजना पैदा की हो। इसलिए धारा 300 का अपवाद-I उस शर्त (proviso) के अंतर्गत नहीं आएगा, जिसके आधार पर पत्नी की हत्या के इस कृत्य को एक 'सोचा-समझा' (deliberate) कृत्य माना जा सके।"
CrPC की धारा 313 के तहत अपने बयान में आरोपी द्वारा किए गए आत्मरक्षा के दावे पर अदालत ने यह टिप्पणी की कि यह न तो आरोपी का मामला था और न ही इसे रिकॉर्ड पर लाया जा सकता था, कि आरोपी ने अपनी पत्नी की हत्या आत्मरक्षा में की हो, क्योंकि उसे अपनी पत्नी द्वारा किसी शारीरिक हमले से अपनी जान जाने का कोई डर नहीं था।
अदालत ने कहा,
"इसलिए अपीलकर्ता-आरोपी के मामले को केवल IPC की धारा 300 के अपवाद-1 के तहत ही परखा जा सकता है - जिसमें 'गंभीर और अचानक उकसावे' के कारण पत्नी की मृत्यु कारित करना शामिल है, जब व्यक्ति अपना आत्म-नियंत्रण खो देता है; अतः आरोपी IPC की धारा 100 के तहत मिलने वाले लाभ का दावा नहीं कर सकता। इस प्रकार, चूंकि यह मामला 'गैर-इरादतन हत्या' (Culpable Homicide) का है, जो 'हत्या' (Murder) की श्रेणी में नहीं आता, इसलिए सज़ा IPC की धारा 304 के तहत दी जाएगी। पत्नी की मृत्यु कारित करने का इरादा आरोपी के साथ नहीं जोड़ा जा सकता, इसलिए यह मामला IPC की धारा 304 के भाग-I के अंतर्गत नहीं आएगा। नतीजतन, IPC की धारा 304 भाग-II के तहत दी गई दोषसिद्धि और सज़ा के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है। माननीय ट्रायल कोर्ट के न्यायाधीश ने मामले के गुण-दोष पर विचार किया है और कानून के प्रावधानों के अनुसार ही फैसला सुनाया।"
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता को वर्ष 2001 में सेशन कोर्ट द्वारा IPC की धारा 304 भाग-II के तहत दोषी ठहराया गया और उसे 5 वर्ष के कठोर कारावास के साथ-साथ 3,000 रुपये के जुर्माने की सज़ा सुनाई गई।
अपीलकर्ता के वकील ने यह तर्क दिया कि यह कोई पूर्व-नियोजित अपराध नहीं था, बल्कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के अनुसार, यह 'गंभीर और अचानक उकसावे' का परिणाम था, क्योंकि आरोपी ने अपनी पत्नी को किसी अन्य पुरुष के साथ आपत्तिजनक स्थिति में पाया था। यह तर्क दिया गया कि जब उसने अपनी पत्नी का सामना किया तो उसने अपीलकर्ता को धमकी दी कि यदि वह उन दोनों के बीच आया तो उसे जीवित नहीं रहने दिया जाएगा; इस बात से अपीलकर्ता अत्यधिक क्रोधित हो गया, जिसके परिणामस्वरूप उसने अपना आत्म-नियंत्रण खो दिया।
यह दलील दी गई कि आरोपी का अपराध करने का कोई 'दुराशय' (mens-rea) नहीं था, और न ही घटना के बाद उसका आचरण किसी भी प्रकार से संदिग्ध था।
राज्य पक्ष ने यह दलील दी कि अपीलकर्ता ने अपनी पत्नी की हत्या करने के अवसर का इंतज़ार किया था। इस प्रकार, पत्नी के कथित अनैतिक आचरण के झूठे आरोप की आड़ लेकर उसने अपनी पत्नी को मार डाला।
अपील खारिज करते हुए अदालत ने ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रखा।
Case title: HASMUKHBHAI BHURABHAI VASAVA v/s STATE OF GUJARAT