अपराध में संलिप्तता साबित किए बिना बैंक खाता फ्रीज करना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन: गुजरात हाईकोर्ट

Update: 2026-06-09 08:47 GMT

गुजरात हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति के बैंक खाते को डी-फ्रीज करने का आदेश देते हुए कहा कि जांच एजेंसियों को बैंक खाते फ्रीज करने का अधिकार है, लेकिन इस शक्ति का प्रयोग उचित, आनुपातिक और कानूनी तरीके से किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि संदिग्ध राशि का स्पष्ट निर्धारण किए बिना या खाताधारक की किसी आपराधिक गतिविधि में संलिप्तता स्थापित किए बिना पूरे बैंक खाते को फ्रीज करना नागरिक के मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है।

जस्टिस निरल आर. मेहता की अदालत एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें साइबर अपराध की शिकायत के आधार पर फ्रीज किए गए बैंक खाते को चालू करने की मांग की गई थी। मामले में केवल ₹500 और ₹600 के दो संदिग्ध लेनदेन, कुल ₹1,100 की जांच की जा रही थी।

याचिकाकर्ता ने बताया कि यह उसका मुख्य बैंक खाता है, जिसका उपयोग वह वेतन प्राप्त करने, घरेलू खर्च, किराया, ईएमआई और अन्य दैनिक वित्तीय जरूरतों के लिए करता है। उसने कहा कि वह किसी भी साइबर अपराध मामले में न तो आरोपी है और न ही संदिग्ध, फिर भी पूरा खाता फ्रीज कर दिया गया, जिससे उसकी वैध आय और बचत तक पहुंच रुक गई।

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी आपराधिक मामले में संलिप्तता का कोई रिकॉर्ड नहीं है और केवल ₹1,100 की संदिग्ध राशि के आधार पर पूरे खाते को फ्रीज करना असंगत और अनुपातहीन कार्रवाई है। इससे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवनयापन और गरिमा के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

हाईकोर्ट ने बैंक को निर्देश दिया कि वह खाते को डी-फ्रीज करे और याचिकाकर्ता को खाते का संचालन करने की अनुमति दे। हालांकि, जांच पूरी होने तक ₹1,100 की राशि पर लियन (Lien) बनाए रखा जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह आदेश जांच के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं है।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली।

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