विवाह के बाद स्थानांतरण की आशंका के आधार पर अविवाहित महिला को नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता: गुजरात हाईकोर्ट

Update: 2026-02-23 12:15 GMT

गुजरात हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी अविवाहित महिला को इस आशंका के आधार पर सरकारी नौकरी से वंचित करना कि वह भविष्य में विवाह कर अन्य स्थान पर चली जाएगी, मनमाना और असंवैधानिक है तथा समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। जस्टिस मौलिक जे. शेलत ने नियुक्ति प्राधिकारी की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि ऐसा तर्क स्पष्ट पक्षपात (फेवरिटिज़्म) दर्शाता है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करता है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई आधार नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि किसी अविवाहित ग्रामीण युवती को केवल संभावित विवाह के कारण नियुक्त नहीं किया जा सकता।

अदालत संगाडा हंसाबेन मालाभाई द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें दाहोद जिले के झालोद में प्रशासक-सह-रसोइया पद पर अन्य उम्मीदवार की नियुक्ति को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता के वकील जापान वी. दवे ने बताया कि याचिकाकर्ता ने स्नातक में 68% अंक प्राप्त किए थे, जो नियुक्त उम्मीदवार (प्रतिवादी संख्या 3 शिवानी जे. बारोट) के 48.94% अंकों से अधिक थे, फिर भी उन्हें मेरिट सूची में नीचे रखकर नियुक्त नहीं किया गया। यह भी कहा गया कि मेरिट सूची में बारोट के अंकों को वास्तविक आवेदन से अधिक दर्शाया गया था।

राज्य की ओर से सहायक सरकारी वकील सिद्धार्थ रामी ने तर्क दिया कि चयन के समय याचिकाकर्ता ने अपना स्नातक प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किया था, इसलिए अन्य उम्मीदवार का चयन किया गया। प्रतिवादी संख्या 3 की ओर से वकील पृथ्वीराज जडेजा ने कहा कि याचिकाकर्ता की डिग्री संदिग्ध है और वह आठ वर्षों से पद पर कार्यरत हैं, इसलिए उनकी नियुक्ति रद्द नहीं की जानी चाहिए।

रिकॉर्ड की जांच के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि कई अधिक योग्य उम्मीदवारों को असंगत और भेदभावपूर्ण कारणों से अस्वीकार किया गया। अदालत ने कहा कि अविवाहित उम्मीदवारों को भविष्य में विवाह कर स्थान परिवर्तन की आशंका के आधार पर अस्वीकार करना पूर्णतः मनमाना और असंवैधानिक है।

हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की डिग्री की प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाए गए हैं, इसलिए नियुक्ति देने से पहले इसकी सत्यता की जांच आवश्यक है। अदालत ने प्रतिवादी संख्या 3 की नियुक्ति रद्द करते हुए अधिकारियों को संबंधित विश्वविद्यालय से याचिकाकर्ता की डिग्री की पुष्टि करने का निर्देश दिया। यदि प्रमाणपत्र सही पाया जाता है तो याचिकाकर्ता को नियुक्त किया जाए, और यदि फर्जी पाया जाता है तो मेरिट सूची में क्रम संख्या 2 पर मौजूद उम्मीदवार को नियुक्त किया जाए। साथ ही यह पूरी प्रक्रिया एक महीने के भीतर पूरी करने और भविष्य में सार्वजनिक रोजगार में ऐसी अनियमितताओं को रोकने के लिए आवश्यक सुरक्षा उपाय लागू करने के निर्देश दिए गए।

याचिका आंशिक रूप से स्वीकार कर ली गई।

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