तलाक के समय पिता को सौंपे गए बेटे की कस्टडी पर बाद में 'श्रेष्ठ अधिकार' का दावा नहीं कर सकती मां: गुजरात हाइकोर्ट

Update: 2026-01-14 06:30 GMT

गुजरात हाइकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें नाबालिग बेटे की कस्टडी की मांग कर रही मां की याचिका को खारिज कर दिया गया था।

हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाक के समय मां ने अपनी पूरी सहमति और समझ के साथ बेटे की कस्टडी पिता को सौंपी थी, ऐसे में वह बाद में यह कहकर “श्रेष्ठ कस्टडी अधिकार” का दावा नहीं कर सकती कि बच्चा कम उम्र का है और उसे मां के साथ ही रहना चाहिए।

यह अपील उस फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर की गई, जिसमें मां की स्थायी कस्टडी की मांग अस्वीकार करते हुए उसे केवल मुलाकात के अधिकार दिए गए।

फैमिली कोर्ट ने मां को हर महीने के पहले और तीसरे रविवार को सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक अहमदाबाद के किसी सार्वजनिक स्थान या बच्चे की सुविधा के अनुसार किसी अन्य स्थान पर बच्चे से मिलने की अनुमति दी थी।

इसके अलावा, सप्ताह में एक बार 30 मिनट के लिए वीडियो कॉल या वॉयस कॉल पर बातचीत की भी अनुमति दी गई।

मामले की पृष्ठभूमि

यह तथ्य सामने आया कि अक्टूबर 2022 में पति-पत्नी के बीच एक पारंपरिक तलाक समझौता हुआ था। इस समझौते की एक शर्त यह थी कि पांच वर्ष से कम उम्र के नाबालिग बेटे की स्थायी कस्टडी पिता के पास रहेगी। इसी समझौते के आधार पर पिता के पास बच्चे की कस्टडी रही।

जस्टिस संगीता के. विशेन और जस्टिस निशा एम. ठाकोर की खंडपीठ ने तलाक समझौते का हवाला देते हुए कहा कि इसमें स्पष्ट रूप से यह दर्ज है कि बच्चे की स्थायी कस्टडी पिता को दी गई।

अदालत ने कहा कि अब यह तर्क देना कि समझौता दबाव या ज़बरदस्ती में किया गया, स्वीकार्य नहीं है। यदि वास्तव में ऐसा होता तो मां को सबसे पहले उसी समझौते को चुनौती देनी चाहिए, लेकिन लगभग एक साल से अधिक समय तक उसने इसे चुनौती नहीं दी और बाद में कस्टडी की मांग लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया।

मां की इस दलील पर कि बच्चा पांच साल से कम उम्र का है और इसलिए उसे मां के साथ ही रहना चाहिए, हाइकोर्ट ने कहा कि यह सही है कि मां प्राकृतिक अभिभावक होती है, लेकिन पिता भी समान रूप से प्राकृतिक अभिभावक होता है।

अदालत ने बच्चे से बातचीत और रिकॉर्ड के अवलोकन के बाद पाया कि बच्चे की देखभाल पिता द्वारा ठीक, संतोषजनक और शालीन तरीके से की जा रही है। बच्चा सेंट्रल बोर्ड से संबद्ध स्कूल में पढ़ रहा है, उसके व्यवहार, अनुशासन और शिष्टाचार में कोई कमी नहीं पाई गई और वह अपने पिता के साथ मजबूत भावनात्मक जुड़ाव रखता है।

अदालत ने यह भी नोट किया कि मां ने एक सचेत निर्णय लेते हुए तलाक के समय बच्चे की कस्टडी पिता को सौंपी थी, इसलिए अब वह श्रेष्ठ कस्टडी अधिकार का दावा नहीं कर सकती।

खंडपीठ ने कहा कि फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि या विकृति नहीं पाई गई, जो हस्तक्षेप को उचित ठहराए।

मां की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि उसकी आय पिता से अधिक है और वह बड़े फ्लैट में रहती है।

इस पर हाइकोर्ट ने कहा कि पिता एक नियमित और पर्याप्त वेतन अर्जित कर रहा है, जबकि मां के 2025 के बैंक रिकॉर्ड उसकी आय के दावे को पूरी तरह पुष्ट नहीं करते।

अदालत ने यह भी कहा कि पिता का घर भले ही छोटा हो, लेकिन वह उसका अपना और सम्मानजनक आवास है, जबकि मां किराए के मकान में रह रही है, जिसे नकारात्मक कारक नहीं माना जा रहा, परंतु पिता को किराया नहीं देना पड़ता।

इसके अलावा, मां द्वारा यह कहे जाने पर कि तलाक समझौता दबाव या ज़बरदस्ती में कराया गया, अदालत ने ध्यान दिलाया कि इस संबंध में न तो कोई आपराधिक शिकायत दर्ज कराई गई और न ही अब तक उस समझौते को औपचारिक रूप से चुनौती दी गई।

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए गुजरात हाइकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराया और मां की अपील को खारिज कर दिया।

Tags:    

Similar News