अनरजिस्टर्ड निकाहनामा, शादी की फोटो या सर्विस रिकॉर्ड में नाम न होना पेंशन से वंचित करने का आधार नहीं: गुजरात हाइकोर्ट
गुजरात हाइकोर्ट ने अहमदाबाद नगर निगम को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि केवल इस आधार पर फैमिली पेंशन से इनकार करना कि निकाह रजिस्टर्ड नहीं था विवाह की तस्वीरें नहीं हैं या कर्मचारी के सर्विस रिकॉर्ड में पत्नी का नाम दर्ज नहीं है, अत्यंत अनुचित और अन्यायपूर्ण है। अदालत ने निगम को याचिकाकर्ता को मृत कर्मचारी की विधिक पत्नी मानते हुए पेंशन लाभ देने का निर्देश दिया।
जस्टिस मौलिक जे. शेलट ने कहा,
“यह समझ से परे है कि केवल इस कारण कि दंपति की तस्वीर प्रस्तुत नहीं की गई, निगम यह निष्कर्ष निकाल ले कि विवाह हुआ ही नहीं। इसी प्रकार यह कहना भी अत्यंत अनुचित और अन्यायपूर्ण है कि यदि कर्मचारी ने जीवनकाल में अपनी दूसरी शादी की सूचना सेवा पुस्तिका में दर्ज नहीं कराई, तो याचिकाकर्ता को विधिक पत्नी नहीं माना जा सकता।”
पूरा मामला
फरजाना बानू मोहम्मद हनीफ शेख ने याचिका दायर कर अहमदाबाद नगर निगम द्वारा फैमिली पेंशन देने से इनकार को चुनौती दी थी। उनके पति निगम में स्थायी कर्मचारी थे और उनके निधन के बाद पेंशन का दावा किया गया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि पहली पत्नी के निधन के बाद 5 दिसंबर, 2007 को उनका निकाह हुआ था। उन्होंने निकाहनामा और निकाह पढ़ाने वाले काजी का हलफनामा भी प्रस्तुत किया। पूर्व में हाइकोर्ट ने निगम को उनके दावे पर पुनर्विचार का निर्देश दिया लेकिन निगम ने निकाह के पंजीकरण, संयुक्त फोटो और सेवा अभिलेख में नाम दर्ज न होने के आधार पर दावा खारिज किया।
याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट आकाश डी. मोदी ने कहा कि निगम ने पर्याप्त दस्तावेजी साक्ष्यों की अनदेखी की। खास तौर पर दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण कार्यवाही में स्वयं मृत कर्मचारी ने लिखित रूप से स्वीकार किया कि निकाह विधिवत संपन्न हुआ।
निगम की ओर से वकील एच.एस. मुंशी ने तर्क दिया कि निकाहनामा रजिस्टर्ड नहीं था और सेवा रिकॉर्ड में याचिकाकर्ता का नाम दर्ज नहीं था। इसलिए उनके वैध पत्नी होने का प्रमाण नहीं मिलता। मृतक की पहली पत्नी से हुए बच्चों की ओर से वकील सिकंदर सैयद ने भी विवाह के पर्याप्त प्रमाण न होने का दावा किया और कहा कि याचिकाकर्ता को पारिवारिक समझौते के तहत दो लाख रुपये मिल चुके हैं, इसलिए वे आगे लाभ की हकदार नहीं हैं।
हाइकोर्ट ने कहा कि मुस्लिम विधि के तहत निकाहनामा का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन आवश्यक होने का कोई प्रमाण अदालत के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया। ऐसे में केवल रजिस्ट्रेशन न होने के आधार पर विवाह को नकारना उचित नहीं है।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि जब मृत कर्मचारी ने स्वयं धारा 125 की कार्यवाही में विवाह स्वीकार किया तो निगम को अतिरिक्त प्रमाण मांगने की आवश्यकता नहीं थी। साथ ही बच्चों और मृतक के बीच हुआ कोई समझौता याचिकाकर्ता के पेंशन के अधिकार को प्रभावित नहीं करता।
अदालत ने निगम के आदेशों को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को विधिक पत्नी मानकर उनके पेंशन दस्तावेज तैयार किए जाएं और 15 मई तक फैमिली पेंशन स्वीकृत की जाए। देरी होने की स्थिति में ब्याज सहित भुगतान करने का भी निर्देश दिया गया।
हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक तकनीकीताओं के आधार पर किसी विधिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।