छोटे अपराध में दर्ज FIR रद्द होने के बाद नौकरी से इनकार नहीं किया जा सकता: गुजरात हाइकोर्ट

Update: 2026-02-16 10:10 GMT

गुजरात हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि किसी अभ्यर्थी के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला जिसे बाद में रद्द कर दिया गया हो, केवल उसी आधार पर उसे पुलिस बल में नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आपराधिक मामला लंबित होना या पूर्व में दर्ज होना अपने आप में अयोग्यता का आधार नहीं बन सकता।

जस्टिस निरजार एस. देसाई भारतभाई खुमसिंहभाई सांगोद द्वारा दायर विशेष सिविल आवेदन पर सुनवाई कर रहे थे।

याचिकाकर्ता ने 12.10.2023 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत चयनित होने के बावजूद उन्हें अनआर्म्ड लोक रक्षक (पुलिस कांस्टेबल) पद पर ज्वाइन करने की अनुमति नहीं दी गई।

अदालत ने कहा,

“यदि केवल किसी आपराधिक मामले का लंबित होना या FIR दर्ज होना भले ही बाद में उसे रद्द कर दिया गया हो किसी योग्य और चयन सूची में शामिल उम्मीदवार की नियुक्ति में बाधा माना जाए तो दुर्भावनापूर्ण व्यक्ति झूठी FIR दर्ज कराकर उसके अधिकार को छीन सकते हैं। मात्र आपराधिक मामला लंबित होना अपने आप में किसी उम्मीदवार को नियुक्ति से अयोग्य नहीं ठहरा सकता। प्राधिकरण को प्रत्येक मामले का स्वतंत्र और वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन करना चाहिए।”

मामला

याचिकाकर्ता ने वर्ष 2021 में लोक रक्षक भर्ती बोर्ड द्वारा जारी विज्ञापन के तहत आवेदन किया था। चयन प्रक्रिया पूरी करने के बाद उनका नाम चयन सूची में शामिल हुआ।

हालांकि चरित्र सत्यापन के दौरान वर्ष 2018 में धनपुर पुलिस स्टेशन में दर्ज एक FIR सामने आई। इसमें भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराएं गैरकानूनी जमावड़ा, दंगा, घर में घुसना, मारपीट, शरारत और आपराधिक धमकी लगाई गई।

बाद में 15.06.2023 को समन्वय पीठ द्वारा उक्त FIR और उससे संबंधित सभी कार्यवाहियां रद्द कर दी गई। इसके बावजूद पुलिस महानिदेशक कार्यालय से मार्गदर्शन मिलने के बाद अधिकारियों ने नियुक्ति न देने का निर्णय लिया।

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि ऑनलाइन आवेदन पत्र में लंबित आपराधिक मामलों का उल्लेख करने का कोई कॉलम नहीं था। साथ ही उनकी उम्मीदवारी को तथ्यों को छिपाने के आधार पर खारिज नहीं किया गया।

यह भी बताया गया कि आरोप केवल लात-घूंसे मारने और गाली-गलौज तक सीमित थे। FIR आपसी सहमति से रद्द हो चुकी थी और नियुक्ति से इनकार के समय कोई भी आपराधिक कार्यवाही लंबित नहीं थी।

राज्य का पक्ष

राज्य की ओर से तर्क दिया गया कि पुलिस बल में नियुक्ति के लिए उच्च स्तर की ईमानदारी और अनुशासन अपेक्षित है। मात्र चयनित होना नियुक्ति का पूर्ण अधिकार नहीं देता। प्राधिकरण ने चरित्र सत्यापन रिपोर्ट के आधार पर विवेकाधिकार का प्रयोग किया।

हाइकोर्ट का निष्कर्ष

अदालत ने मुख्य प्रश्न यह माना कि क्या FIR रद्द होने के बाद भी उसका साया उम्मीदवार को सार्वजनिक रोजगार से वंचित कर सकता है।

खंडपीठ ने कहा कि नियोक्ता के पास विवेकाधिकार अवश्य है लेकिन उसे कारणयुक्त और वस्तुनिष्ठ ढंग से प्रयोग किया जाना चाहिए। जघन्य अपराधों या संदेह का लाभ मिलने जैसी परिस्थितियों में नियुक्ति से इनकार उचित हो सकता है लेकिन छोटे-मोटे विवाद या मामूली झगड़े जैसे मामलों में संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।

अदालत ने पाया कि संबंधित FIR नियुक्ति से इनकार के आदेश से पहले ही रद्द की जा चुकी थी और आरोप मामूली प्रकृति के थे। ऐसे में बिना समुचित विचार के नियुक्ति से इनकार करना त्रुटिपूर्ण था।

हाइकोर्ट ने 12.10.2023 के आदेश को रद्द करते हुए निरस्त कर दिया। साथ ही प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता के मामले पर पुनः विचार करें और अदालत की टिप्पणियों के आलोक में नियुक्ति के संबंध में नया निर्णय लें जो मेडिकल फिटनेस और अन्य आवश्यक शर्तों के अधीन होगा।

याचिका स्वीकार कर ली गई।

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