मुबारात से हुए तलाक को मान्यता देना फैमिली कोर्ट का दायित्व: गुजरात हाईकोर्ट ने पति-पत्नी का विवाह समाप्त घोषित किया
गुजरात हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि शरीयत कानून के अधीन आने वाले मुस्लिम पति-पत्नी आपसी सहमति से 'मुबारात' के माध्यम से विवाह समाप्त करते हैं तो फैमिली कोर्ट का दायित्व है कि वह उस समझौते को स्वीकार करे और वैवाहिक संबंध समाप्त होने की घोषणा करे।
जस्टिस इलेश जे. वोरा और जस्टिस आर. टी. वच्छाणी की खंडपीठ ने यह टिप्पणी एक पति की अपील पर सुनवाई करते हुए की, जिसने फैमिली कोर्ट द्वारा उसकी याचिका खारिज किए जाने को चुनौती दी थी।
मामले के अनुसार पति और पत्नी का विवाह 21 फरवरी 2015 को अहमदाबाद में शरीयत कानून के तहत हुआ। बाद में दोनों के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए और उन्होंने आपसी सहमति से विवाह समाप्त करने का निर्णय लिया।
तलाक के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से पहले दोनों पक्षों ने 11 मार्च 2024 को एक समझौता पत्र भी तैयार किया, जिसमें पत्नी के सामान और अन्य अधिकारों से जुड़े मुद्दों का निपटारा किया गया। समझौते के तहत पत्नी ने भरण-पोषण के अधिकार का त्याग किया जबकि दंपति का पुत्र मां के साथ रहने पर सहमत हुआ।
इसके बाद पति ने फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 7 के तहत फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर वैवाहिक स्थिति की घोषणा करने का अनुरोध किया। पत्नी ने भी अदालत में प्रस्तुत लिखित बयान के माध्यम से याचिका का समर्थन किया।
हालांकि, फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज की कि इसमें कोई वैध कारण नहीं बताया गया। अदालत का मत था कि मुस्लिम कानून के तहत विधिवत संपन्न तलाक की केवल पुष्टि कराने के लिए फैमिली कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटाया जा सकता।
इस आदेश को चुनौती देते हुए पति हाईकोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट ने पाया कि दोनों पक्षों ने स्वेच्छा और आपसी सहमति से 'मुबारात' समझौते के जरिए विवाह समाप्त किया। पत्नी ने तलाक को स्वीकार किया और स्थायी गुजारा भत्ते के रूप में 25 लाख रुपये भी प्राप्त किए।
अदालत ने कहा कि 'मुबारात' मुस्लिम कानून में आपसी सहमति से होने वाले गैर-न्यायिक तलाक का एक मान्य स्वरूप है और मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम से इसकी वैधता प्रभावित नहीं होती।
खंडपीठ ने कहा कि फैमिली कोर्ट यह मानने में गलत था कि जब तक दूसरा पक्ष तलाक से इनकार न करे, तब तक वैवाहिक स्थिति की घोषणा के लिए याचिका दायर नहीं की जा सकती।
अदालत ने स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 7(1) की व्याख्या (ख) फैमिली कोर्ट को विवाह की वैधता अथवा किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति के संबंध में घोषणा करने का अधिकार देती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में पक्षकारों ने अदालत से विवाह विच्छेद का आदेश देने की मांग नहीं की, बल्कि केवल 'मुबारात' के आधार पर अपनी वैवाहिक स्थिति की आधिकारिक घोषणा चाही थी। चूंकि पत्नी ने भी तलाक को स्वीकार कर लिया, इसलिए फैमिली कोर्ट द्वारा याचिका खारिज किया जाना विधिसम्मत नहीं था।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया और घोषणा की कि दोनों पक्षों का विवाह 'मुबारात' समझौते की तिथि से समाप्त माना जाएगा।