अपील लंबित रहते पति ने की दूसरी शादी: गुजरात हाईकोर्ट ने तलाक की डिक्री पर लगाई रोक
गुजरात हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में फैमिली कोर्ट द्वारा पति को दिए गए तलाक के फैसले के अमल पर रोक लगाई।
कोर्ट ने पाया कि पत्नी की अपील लंबित रहने के दौरान पति ने दूसरी शादी कर ली, जिससे पत्नी अपने वैधानिक अपीलीय अधिकार का प्रभावी ढंग से उपयोग करने से वंचित हो गई।
जस्टिस इलेश जे. वोरा और जस्टिस आर. टी. वच्छाणी की खंडपीठ ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 15 का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि तलाक के खिलाफ दायर अपील दूसरी शादी के कारण निष्प्रभावी न हो जाए।.
मामले में फैमिली कोर्ट ने पति की तलाक याचिका स्वीकार करते हुए विवाह विच्छेद का आदेश पारित किया। साथ ही पत्नी को स्थायी भरण-पोषण और चिकित्सा खर्च देने का भी निर्देश दिया गया।
इस आदेश के खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की और तलाक के फैसले पर रोक लगाने की मांग की। पत्नी का कहना था कि अपील लंबित रहते हुए पति ने दूसरी शादी कर ली, जिससे उसके वैधानिक अधिकार प्रभावित हुए।
वहीं, पति की ओर से कहा गया कि फैमिली कोर्ट ने 15 मई, 2024 को तलाक का फैसला सुनाया। इसके बाद उसने 11 जुलाई, 2024 को दूसरी शादी कर ली, जिसका पंजीकरण 15 जुलाई, 2024 को हुआ।
उसका तर्क था कि पत्नी ने भी 15 जुलाई, 2024 को ही हाईकोर्ट में अपील दायर की, जबकि दूसरी शादी उससे पहले हो चुकी थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 15 का उद्देश्य अपील करने वाले पक्ष के अधिकारों की रक्षा करना है, ताकि अपील लंबित रहने के दौरान दूसरी शादी से उत्पन्न कानूनी और तथ्यात्मक जटिलताओं से बचा जा सके।
कोर्ट ने कहा,
"पति ने तलाक की डिक्री के तुरंत बाद दूसरी शादी कर ली। उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि पत्नी ने अपील दायर की है, या नहीं। इस जल्दबाजी में की गई दूसरी शादी ने पत्नी को अपना पक्ष प्रभावी ढंग से रखने के वैधानिक अधिकार से वंचित कर दिया।"
हाईकोर्ट ने माना कि इस मामले में सुविधा का संतुलन पत्नी के पक्ष में है और यदि अंतरिम राहत नहीं दी जाती, तो उसे अपूरणीय क्षति होगी। विशेष रूप से, तलाक की डिक्री लागू रहने से पत्नी के वैवाहिक दर्जे पर असर पड़ेगा और इससे उसके अन्य वैधानिक दावों तथा लंबित कानूनी कार्यवाहियों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के तलाक संबंधी आदेश के क्रियान्वयन, प्रभाव और अमल पर अपील के अंतिम निर्णय तक रोक लगाई।
हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस आदेश में की गई टिप्पणियां प्रथम दृष्टया हैं और केवल इस मामले के तथ्यों के आधार पर की गई हैं। इन्हें भविष्य के मामलों में नज़ीर के रूप में नहीं माना जाएगा।