1956 से पहले हिंदू कानून में बेटी को गोद लेने की मान्यता नहीं थी, इसलिए संपत्ति पर दावा नहीं बनता: गुजरात हाईकोर्ट
गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 लागू होने से पहले प्राचीन हिंदू कानून में केवल पुत्र को गोद लेने की मान्यता थी। इसलिए उस दौर में किसी बेटी को गोद लिया गया माना नहीं जा सकता और वह दत्तक पिता की संपत्ति पर उत्तराधिकार का दावा नहीं कर सकती।
जस्टिस जे. सी. दोशी ने एक महिला की अपील खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। महिला ने अपने दत्तक पिता की अचल संपत्तियों पर स्वामित्व का दावा किया था, जिसे ट्रायल कोर्ट पहले ही खारिज कर चुकी थी।
महिला का कहना था कि उसके जैविक पिता की मृत्यु के बाद उसकी मां ने वर्ष 1949 में दूसरी शादी की थी। उसने दावा किया कि विवाह की शर्त यह थी कि उसे भी मां के दूसरे पति द्वारा विधिवत गोद लिया जाएगा। इसके बाद वह अपनी मां के साथ दत्तक पिता के घर रहने लगी और उन्होंने ही उसका पालन-पोषण किया तथा उसकी शादी भी कराई।
महिला का दावा था कि वह अपने दत्तक पिता की वैध उत्तराधिकारी है। वहीं, दत्तक पिता के भाई और उनके बेटों ने इस दावे का विरोध करते हुए संपत्ति पर अपना अधिकार जताया।
हाईकोर्ट ने प्राचीन हिंदू कानून, विभिन्न ग्रंथों और उस समय लागू विधिक सिद्धांतों का अध्ययन करने के बाद कहा कि 1956 से पहले प्राचीन हिंदू कानून में किसी लड़की को गोद लेने की कानूनी मान्यता नहीं थी।
कोर्ट ने कहा,
"प्राचीन हिंदू कानून में लड़की को दत्तक संतान के रूप में मान्यता नहीं दी गई।"
महिला ने यह भी तर्क दिया कि वह अपनी मां के साथ 'अंगलियात' के रूप में अपने सौतेले पिता के घर गई थी और उसे बाद में गोद लिया जाना था।
इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि गुजरात के कुछ समुदायों में अंगलियात उस पुत्र या पुत्री को कहा जाता है जो मां के पहले विवाह से जन्मा हो और मां के पुनर्विवाह के बाद उसके साथ नए परिवार में रहने लगे। ऐसे बच्चों को सामाजिक रूप से सौतेले पिता के परिवार का सदस्य माना जाता है।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी सामाजिक परंपरा दत्तक ग्रहण के बराबर नहीं मानी जा सकती। जब तक प्राचीन हिंदू कानून या किसी मान्य प्रथा में लड़की को गोद लेने की अनुमति न हो, तब तक उसे कानूनी रूप से दत्तक संतान नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में महिला को अधिक से अधिक पालित पुत्री या अंगलियात पुत्री माना जा सकता है, लेकिन दत्तक पुत्री नहीं।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि 1956 में हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम लागू होने के बाद कानून में बड़ा बदलाव हुआ और उसके बाद बेटियों को भी गोद लेने की कानूनी मान्यता मिल गई। लेकिन यह प्रावधान वर्ष 1949 की घटनाओं पर लागू नहीं हो सकता।
इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने महिला की अपील खारिज की।