गुवाहाटी हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत या जमानतदार बांड में लिखी गई रकम को आरोपी की रिहाई के लिए नकद जमा करने की राशि नहीं माना जा सकता।

अदालत ने कहा कि बांड में किसी रकम का उल्लेख होने मात्र से पुलिस या अदालत आरोपी से उस रकम को नकद जमा करने की मांग नहीं कर सकती।

जस्टिस बुदी हाबुंग ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें दापोरिजो के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा लगाई गई जमानत की शर्तों में बदलाव की मांग की गई।

मामले में अनार अली को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318(2) और 316(2) के तहत दर्ज मामले में गिरफ्तार किया गया। आरोप पत्र दाखिल होने के बाद मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने उसे दो लाख रुपये के जमानत बांड और इतनी ही राशि के एक स्थानीय जमानतदार के बांड पर जमानत दी थी।

याचिका में बताया गया कि आरोपी राजमिस्त्री और दिहाड़ी मजदूर है तथा वह दो लाख रुपये का जमानत बांड पूरा करने की स्थिति में नहीं था। वह असम का निवासी है, इसलिए अरुणाचल प्रदेश में स्थानीय जमानतदार की व्यवस्था करना भी उसके लिए संभव नहीं था।

आरोपी की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि पुलिस अधिकारी जमानत बांड की रकम नकद जमा करने पर जोर दे रहे थे। इसके चलते जमानत मंजूर होने के बावजूद वह जेल से बाहर नहीं आ सका और तीन महीने से अधिक समय तक हिरासत में रहा।

अतिरिक्त लोक अभियोजक ने भी जमानत की शर्तों में बदलाव का विरोध नहीं किया। उन्होंने अदालत से यह स्पष्ट करने का अनुरोध किया कि जमानत बांड या जमानतदार बांड में लिखी रकम को पुलिस या अदालत के समक्ष नकद जमा करने की अनिवार्यता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी जमानत पाने का हकदार पाया गया लेकिन तय शर्तों को पूरा करने में असमर्थ होने के कारण वह जमानत के आदेश का लाभ नहीं उठा सका।

अदालत ने कहा,

“जमानत की सुविधा मिलने के बावजूद आरोपी तीन महीने से अधिक समय से हिरासत में है। यह अपने आप में दर्शाता है कि जमानत बांड और स्थानीय जमानतदार से जुड़ी शर्तें अत्यधिक और कठिन हैं।”

हाईकोर्ट ने स्थानीय जमानतदार की अनिवार्यता को भी मामले की परिस्थितियों में अत्यधिक और अनुचित माना।

अदालत ने कहा कि केवल दूसरे राज्य का निवासी होना स्थानीय जमानतदार की मांग करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकता खासकर तब जब ऐसी शर्त जमानत के आदेश को ही निष्प्रभावी कर दे।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत बांड या जमानतदार बांड का उद्देश्य आरोपी की ओर से अदालत की शर्तों का पालन सुनिश्चित करना और जांच व मुकदमे के दौरान उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करना है। ऐसी शर्त नहीं लगाई जा सकती जिसे आरोपी के लिए पूरा करना ही असंभव हो।

हाईकोर्ट ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की शर्त में बदलाव करते हुए आरोपी को 50 हजार रुपये के निजी बांड और इतनी ही राशि के एक जमानतदार के बांड पर रिहा करने का निर्देश दिया।

जमानतदार का स्थानीय निवासी होना जरूरी नहीं होगा। हालांकि उसकी पहचान और आर्थिक क्षमता का सत्यापन कानून के अनुसार किया जाएगा।

नकद रकम जमा करने के कथित दबाव पर अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट के आदेश में आरोपी को जमानत की रकम नकद जमा करने का कोई निर्देश नहीं था। आदेश में केवल जमानत बांड और स्थानीय जमानतदार के बांड की शर्त रखी गई।

जस्टिस बुदी हाबुंग ने स्पष्ट किया,

“जमानत बांड में किसी रकम का उल्लेख मात्र अपने आप में यह नहीं बनाता कि आरोपी को वह रकम नकद जमा करनी होगी।”

इसी तरह जमानतदार बांड में लिखी रकम भी केवल जमानतदार की कानूनी जिम्मेदारी और दायित्व को दर्शाती है, उसे नकद जमा करना जरूरी नहीं है।

अदालत ने निर्देश दिया कि आवश्यक निजी बांड और जमानतदार बांड स्वीकार होते ही आरोपी को तत्काल रिहा किया जाए, बशर्ते किसी अन्य मामले या कार्यवाही में उसकी हिरासत जरूरी न हो। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा लगाई गई बाकी शर्तें यथावत रहेंगी।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश की प्रति संबंधित पुलिस अधीक्षक को भी भेजने का निर्देश दिया ताकि इसे अधीनस्थ पुलिस अधिकारियों तक पहुंचाया जा सके और जमानत बांड की रकम नकद जमा कराने पर जोर देने जैसी स्थिति दोबारा न हो।

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