कोर्ट मार्शल प्रक्रिया में फाइनल ऑर्डर से पहले रिट याचिका स्वीकार्य नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-04-01 04:53 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि अनुशासनात्मक और कोर्ट मार्शल की कार्यवाही को चुनौती देने वाली रिट याचिका, अंतिम आदेश पारित होने से पहले स्वीकार्य नहीं है।

जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की एक डिवीज़न बेंच ने यह टिप्पणी की,

“यह कानून की एक स्थापित स्थिति है कि जब तक इस तरह की कार्यवाही में कोई अंतिम आदेश पारित नहीं हो जाता, तब तक हाई कोर्ट द्वारा रिट याचिका में कार्यवाही पर अंतिम निर्णय का इंतज़ार किए बिना कोई भी हस्तक्षेप अनुचित है।”

इसके लिए 'यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम एल.डी. बालम सिंह (2002)' मामले का हवाला दिया गया, जिसमें हाईकोर्ट के समक्ष आरोप पत्र, जनरल कोर्ट मार्शल की सज़ा, जनरल ऑफिसर कमांडिंग द्वारा पुष्टि का आदेश रद्द करने और साथ ही जनरल कोर्ट मार्शल का ट्रायल रद्द करने की चुनौती दी गई।

हालांकि, मौजूदा मामले में पुष्टि का कोई आदेश नहीं था।

कोर्ट ने कहा,

“ठीक इसी वजह से हमने यह माना है कि मौजूदा याचिका समय से पहले दायर की गई। निश्चित रूप से, जब भी GSFC के निष्कर्षों की पुष्टि हो जाएगी, तब याचिकाकर्ता को अपनी सभी दलीलें पेश करने की पूरी आज़ादी होगी।”

इस प्रकार, कोर्ट ने BSF के एक सब-इंस्पेक्टर द्वारा दायर याचिका खारिज की, जिसमें आंतरिक शिकायत समिति (ICC) के गठन, उसके निष्कर्षों और उसके बाद की कार्यवाही—जिसमें जनरल सिक्योरिटी फ़ोर्स कोर्ट (GSFC) का गठन भी शामिल था—को चुनौती दी गई।

याचिकाकर्ता ने ICC के निष्कर्षों, आरोप पत्र और साथ ही GSFC की कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी। उसने 'कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013' के तहत ICC की संरचना को भी चुनौती दी थी। साथ ही आरोप लगाया कि इसमें वैधानिक प्रावधानों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ।

हालांकि, कोर्ट ने यह पाया कि याचिकाकर्ता पहले ही 'सीमा सुरक्षा बल अधिनियम' के तहत पुष्टि से पहले की एक याचिका दायर कर चुका था, जो सक्षम प्राधिकारी के समक्ष विचाराधीन थी।

इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने कहा,

“यह उम्मीद की जाती है कि पुष्टि से पहले की याचिका पर विचार करने वाला प्राधिकारी उन सभी दलीलों पर विचार करेगा, जो याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में पेश की हैं। तदनुसार एक तर्कसंगत आदेश पारित करेगा।”

इस तरह याचिका को समय से पहले दायर की गई याचिका मानते हुए खारिज कर दिया गया।

Case title: Ajit Kumar Singh Through Smt. Poonam Singh Wife And Pairokar v. UoI

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