पीड़ित की लापरवाही रेल दुर्घटना में मुआवज़ा देने से मना करने का आधार नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने यह साफ़ कर दिया कि रेल दुर्घटनाओं के मामलों में पीड़ित की लापरवाही मुआवज़ा देने से मना करने का आधार नहीं हो सकती। कोर्ट ने कहा कि एक बार जब कोई "अप्रत्याशित घटना" (Untoward Incident) साबित हो जाती है तो रेलवे अधिनियम, 1989 के तहत रेलवे की ज़िम्मेदारी सख़्त हो जाती है।
जस्टिस मनोज कुमार ओहरी ने यह टिप्पणी एक महिला की अपील मंज़ूरी देते हुए की। इस महिला के मुआवज़े के दावे को रेलवे दावा अधिकरण (Railway Claims Tribunal) ने खारिज कर दिया था।
अधिकरण ने यह माना था कि मृतक न तो एक वास्तविक यात्री था और न ही किसी "अप्रत्याशित घटना" का शिकार हुआ था।
यह मामला अपीलकर्ता के बेटे की मौत से जुड़ा था। आरोप है कि 2018 में तुगलकाबाद से पलवल जाते समय वह चलती ट्रेन से गिर गया और चोटों के कारण उसकी मौत हो गई।
अधिकरण का आदेश रद्द करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि खुद रेलवे के मामले के अनुसार भी मृतक चलती ट्रेन से गिरा था, भले ही इस घटना का कारण उसकी अपनी लापरवाही को बताया गया हो।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"एक बार जब चलती ट्रेन से गिरने की बात स्वीकार कर ली जाती है और घटना की प्रकृति साबित हो जाती है तो यह पूरी तरह से अधिनियम की धारा 123(c) के तहत परिभाषित 'अप्रत्याशित घटना' के दायरे में आ जाती है। मृतक पर लापरवाही का आरोप लगाने से यह स्थिति नहीं बदलती, क्योंकि यह बात अच्छी तरह से स्थापित है कि अधिनियम की धारा 124-A के तहत मुआवज़ा देने से मना करने के लिए पीड़ित की लापरवाही कोई प्रासंगिक आधार नहीं है। ऐसे मामलों में रेलवे की ज़िम्मेदारी सख़्त होती है, जो केवल वैधानिक अपवादों के अधीन होती है। मौजूदा मामले में इनमें से कोई भी अपवाद लागू नहीं होता।"
कोर्ट ने अधिकरण के इस निष्कर्ष को भी खारिज कर दिया कि मृतक वास्तविक यात्री नहीं था, सिर्फ इसलिए क्योंकि उसके शरीर से कोई यात्रा टिकट बरामद नहीं हुआ था। कोर्ट ने कहा कि टिकट बरामद न होना कोई निर्णायक सबूत नहीं है। अपीलकर्ता ने यह पर्याप्त रूप से साबित किया था कि मृतक एक वैध टिकट के साथ यात्रा कर रहा था।
इस प्रकार, कोर्ट ने विवादित आदेश रद्द किया और मुआवज़े की राशि तय करने के लिए मामले को वापस अधिकरण के पास भेज दिया।
Case title: Dharamawati v. Union of India